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Lok Sabha Election 2019: चुनाव शुरू होते ही तेलंगाना-महाराष्ट्र के बीच फंस जाते हैं ये 14 गांव, पहले आंध्र प्रदेश में फंसा था पेंच

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): वर्षों से चल रहे महाराष्ट्र और तेलंगाना के सीमा पर क्षेत्रीय विवाद में फंसे 14 गांवों की हालत बहुत खराब है। गांव वालों का कहना है कि दोनों राज्यों विवाद के कारण उन्हें खेती के लिए बीज और उर्वरक खरीदने के लिए कोई ऋण या सब्सिडी भी नहीं दी जाती है।

मधुकर रणवीर (फोटो सोर्स : इंडियन एक्सप्रेस)

Lok Sabha Election 2019: लोकसभा चुनाव के तारीखों के ऐलान के बाद महाराष्ट्र और तेलंगाना के 14 गांव के लोग 2 राज्यों में बंट जाते हैं। गांव वालों के मुताबिक, दोनों राज्यों के सीमा पर बसे 14 गांव के लोगों को हर चुनाव में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को मामला सुलझाने का आदेश भी दिया था, लेकिन दिक्कत जस की तस है। इन्हीं गांवों में से एक में रहने वाले मधुकर रणवीर के परिवार में 2 सदस्यों के पास महाराष्ट्र द्वारा जारी किए गए मतदाता कार्ड हैं। वहीं, परिवार के अन्य सदस्यों के पास तेलंगाना द्वारा जारी किए गए मतदाता कार्ड हैं।

दो राज्यों में बंट जाते हैं 14 गांवः महाराष्ट्र और तेलंगाना के सीमा पर बसे 14 गांवों के लोग रहते तेलंगाना में हैं और वोट महाराष्ट्र में देते हैं। आंकड़ों के अनुसार, इन 14 गांवों में कुल 2960 मतदाता हैं, जो दोनों राज्यों के बीच चल रहे क्षेत्रीय विवाद में पिस रहे हैं। गांव निवासी रोहीदास छवन का कहना है, ‘मेरा घर तेलंगाना में है, लेकिन मेरा खेत महाराष्ट्र में है। चूंकि यह वन भूमि है, इसलिए मैं अपने नाम नहीं कर सकता हूं। यही कारण है कि महाराष्ट्र मुझे बीज और उर्वरक खरीदने के लिए कोई ऋण या सब्सिडी नहीं देता है। वहीं, तेलंगाना ने भी मेरी मदद करने से इंकार कर दिया है।’

सुविधा देते हैं दोनों राज्य, लेकिन कर्ज नहीं : गांव के लोगों ने बताया कि उन्हें महाराष्ट्र और तेलंगाना दोनों राज्यों से सुविधाएं मिलती हैं। इसके तहत तेलंगाना सरकार उन्हें 3 रुपए किलो में चावल और 5 रुपए किलो में गेहूं देती है। वहीं, दोनों राज्यों द्वारा सड़क और अन्य सुविधाओं के मिलने की बात भी सामने आई है। बता दें कि इन 14 गांवों में महाराजगुड़ा के साथ मुकद्मगुड़ा, परमदोली, परमदोली टांडा, कोठा, लेंडीजला, शंकरलोदी, पद्मावती, अंतापुर, इंदिरानगर, यसापुर, पलासगुडा, भोलापाथर और लेंडीगुडा शामिल हैं। गांव वालों का कहना है कि दोनों राज्य उन्हें हर सुविधाएं देते हैं, लेकिन क्षेत्रीय विवाद के कारण खेती के लिए बीज और उर्वरक खरीदने के लिए ऋण या सब्सिडी नहीं देते।

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आंध्र के बाद अब तेलंगाना का दावाः रामदास रणवीर ने बताया कि 1955-56 में भारत में भाषा के आधार पर राज्यों को एक किया गया, तब वे महाराष्ट्र में थे, क्योंकि वे मराठी बोलते हैं। हालांकि, 10 साल बाद दोनों राज्यों ने अपनी सीमाएं अलग कर लीं और तब से यह समस्या शुरू हो गई। ऐसे में गांव वालों ने 1980 और 1994 के चुनाव का विरोध भी किया। गौरतलब है कि 1995 में आंध्र प्रदेश ने हाई कोर्ट में याचिका दायर करके उन 14 गांवों पर अपना दावा किया था। इसके जवाब में महाराष्ट्र ने भी सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटिशन दाखिल कर आंध्र प्रदेश के दावा को अपना बताया था। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी कर हाई कोर्ट को 3 महीने में मामले को सुलझाने के लिए कहा था। इसके बाद आंध्र प्रदेश सरकार ने अपनी याचिका वापस ले ली थी। 2014 में राज्य बनने के बाद तेलंगाना ने इन गांवों पर अपना हक जताया। गांव वालों का कहना है कि यह सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट उल्लंघन है। कुमारम भीम आसिफाबाद के कलेक्टर राजीवगांधी हनुमत ने लोगों से अपील की है कि आने वाले चुनाव में डबल वोटिंग न करें।

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