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सिविल इंजीनियरिंग की जमीन पर हौसलों का ढांचा

इंजीनियरिंग को लेकर ये आम धारणा है कि यह पुरुषों का पेशा है, उसमें भी सिविल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग तो पूरी तरह से पुरुषों की ही जमीन मानी जाती है। लेकिन पुरुषों की इस जमीन पर भी महिलाएं अब अपनी इमारतें खड़ी कर रही हैं।

सुमन केशव सिंह

इंजीनियरिंग को लेकर ये आम धारणा है कि यह पुरुषों का पेशा है, उसमें भी सिविल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग तो पूरी तरह से पुरुषों की ही जमीन मानी जाती है। लेकिन पुरुषों की इस जमीन पर भी महिलाएं अब अपनी इमारतें खड़ी कर रही हैं। अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी महिलाओं की भागीदारी धीमी गति से बढ़ रही है। हालांकि पहले जहां इंजीनियरिंग करने के बाद महिलाएं शिक्षण के क्षेत्र में अधिक जाती थीं। वहीं, आज महिलाएं स्मार्ट सिटी से लेकर मेट्रो जैसी बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रही हैं।

पेशे से सिविल इंजीनियर मनप्रीत कौर खनूजा कहती हैं कि इस पेशे की तरफ महिलाओं का रुझान काफी कम है। जिसे न के बराबर कहा जा सकता है लेकिन वे यह भी मानतीं हैं कि इस पेशे में महिलाओं के लिए अपार संभावनाएं हैं। कॉलेज के दिनों को याद करती हुई मनप्रीत बताती हैं कि उनके 60 बच्चों के बैच में केवल दो लड़कियां ही सिविल इंजीनियरिंग की थीं। इसके अलावा दो मैकेनिकल और दो इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट की छात्रा थीं। वह बतातीं हैं कि अक्सर अभिभावकों को लगता है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उनकी लड़कियों को मजदूरों के साथ काम करना होगा। उन्हें कई बार प्रोजेक्ट के सिलसिले में आना-जाना होगा और ये उनकी सुरक्षा को लेकर मुश्किलें खड़ी करेगा।

खनूजा कहती हैं कि यह आधा सच है। पूरा सच यह है कि सिविल इंजीनियरिंग बहुत बड़ा क्षेत्र है। जिसमें महिलाओं के लिए और कई दरवाजे खुलते हैं। वह बतातीं हैं कि इस क्षेत्र में ऑफिस में भी काम होते हैं। उन्होंने बताया कि वे कई बार साइट विजिट के लिए भी जाती हैं। लेकिन सिविल इंजीनियरिंग के बाद प्लानिंग, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट, डिजाइनिंग, आर्किटेक्ट, इंटीरियर, इंडस्ट्रियल डिजाइन जहां महिलाएं ऑफिस वर्क भी कर सकती हैं। उन्होंने विदेशों में काम के तरीके और महिलाओं को मिलने वाली सुविधाओं का भी जिक्र किया। खनूजा बताती हैं कि यह रचनात्मक पेशा है, इसमें महिलाओं की रचनात्मक सोच न केवल खूबसूरत इमारतों का ही निर्माण करती हैं बल्कि वे सुविधाजनक और कम लागत वाली भी होती हैं।

मनप्रीत का कहना है कि बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में डिजाइन की छोटी-छोटी चीजें करोड़ों के लागत को कम कर देतीं हैं। महिलाओं में बचत, सुविधा और सबको साथ लेकर चलने का जो नैसर्गिक गुण है। वह यहां उनके काम में भी नजर आता है। मुमकिन है महिलाएं पुरुषों से बेहतर इमारतें और निर्माण प्रारूप बना पातीं हैं। खनूजा ने दिल्ली एनसीआर में कई ऐसी इमारतों के डिजाइन तैयार किए हैं। मनप्रीत कहती हैं जब आप शहर से गुजर रहे हों और अपनी डिजाइन की गई बिल्डिंग को देखते हैं तो इससे सुखद अनुभूति होती है। कई बार आपका निर्माण शहर का लैंडमार्क होता है। खनूजा ने बताया कि उन्होंने कई बड़े बिल्डर के साथ कई भवनों का निर्माण किया है। इसके अलावा उन्होंने स्कूल भी डिजाइन किए हैं। वह इन दिनों विदेश के कुछ प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं। उन्होंने दोहा में सबवे और मेट्रो स्टेशन तक का प्रारूप तैयार किया है। खनूजा इंदौर के मानिक बाग से हैं लेकिन दिल्ली में सारा काम किया है। उन्होंने बताया कि इस पेशे को चुनने और इस पेशे में आगे बढ़ाने में उनके परिवार उनके परिवार की भी भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। मनप्रीत कहतीं हैं ‘मैंने बाइ च्वाइस तो इंजीनियर नहीं बनी लेकिन पेशेवर तौर पर मैं इंजीनियरिंग में हूं।’

इस पेशे को भी जरूरत है महिलाओं की

सिविल व मैकेनिकल इंजीनियररिंग में लड़कियों की संख्या न के बराबर है। 60 में से 4 या 5 छात्राएं ही इस कोर्स को चुनती हैं। लड़कियां अमूमन ऑफिस में काम करना पसंद करती हैं। अच्छी बात है कि कुछ सालों की अपेक्षा लड़कियों का आना इस पेशे में शुरू हुआ है। – डॉक्टर सुनील वाघ, प्रधानाचार्य, एमजी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी

‘कल्पनाओं से शहर का निर्माण करना चाहती हूं, इसीलिए इंजीनियर हूं’

दिल्ली की आशिमा कंसल का कहना है कि उनका रुझान बचपन से ही इंजीनियरिंग की ओर था। वह कहतीं हैं कि सिविल इंजीनियरिंग सभ्यता के विकास के चरण का सबसे पुराना पेशा है। ये मानव सभ्यता की पहली जरूरत थी लेकिन इस पेशे में अब तक महिलाओं का उनता रुझान नहीं रहा जितना होना चाहिए था। वह बताती हैं कि महिलाओं की क्षमता सिर्फ भवन की आंतरिक सज्जा निखारने तक की सीमित नहीं है बल्कि आधारभूत संरचना की भी उन्हें बेहतर समझ होती है। आशिमा ने बताया कि इंजीनियरिंग में उनके बैच में 40 छात्र थे जिनमें से सिर्फ दो ही लड़कियां थीं। उनके मुताबिक इसे फील्डवर्क मानकर लड़कियां इस पेशे में आने से हिचकती हैं।

दूसरी ओर, अभिभावकों के मन में भी शुरू से चली आ रही धारणा कायम है। उन्हें लगता है लड़कियां कैसे पुरुषों के बीच काम करेंगी। धूल, धूप, मजदूर, सीमेंट, बालू मिट्टी, सरिया, गाटर आदि के बीच लड़कियों की उपस्थिति को आज भी ये समाज स्वीकारने को तैयार नहीं है। लेकिन समय और सोच में बदलाव आ रहा है। सेना और पुलिस में महिलाएं हैं, ये पेशा तो उनसे ज्यादा मुश्किल नहीं है ना! आशिमा कहती हैं कि मैं अपनी पसंद से इंजीनियर हूं। मुझे लगता है कि मैं अपनी कल्पनाओं से किसी शहर का निर्माण करना चाहती हूं। इसीलिए मैंने इस पेशे का चयन किया। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आजकल कम लागत में बेहतर भवन निर्माण की बात होती है, ऐसे में लड़कियां इस काम को बेहतर तरीके से कर सकती हैं।

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