Stanzin Tsangyang Success Story: लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों और दुर्गम जंस्कार घाटी से निकलकर चेन्नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी के परेड ग्राउंड तक पहुंचने वाली Stanzin Tsangyang ने इतिहास रच दिया है। 5 सितंबर 2026 को OTA में आयोजित पासिंग आउट परेड में कमीशन हासिल करने के साथ वह अपने क्षेत्र से भारतीय सेना में अधिकारी बनने वाली पहली महिला बनीं। उनकी कहानी सिर्फ सेना में नौकरी पाने की नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों, परिवार से लंबे समय तक दूर रहकर पढ़ाई करने, शिक्षा, NCC और लगातार मेहनत के जरिए अपने लिए नई राह बनाने की कहानी है।
कौन हैं Stanzin Tsangyang?
लेफ्टिनेंट स्टैनजिन त्सांगयांग का संबंध लद्दाख की जंस्कार घाटी से है। वह एक ऐसे दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र से आती हैं, जहां कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और कठोर सर्दियां रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। भारतीय सेना के सेना प्रशिक्षण कमान की ओर से साझा की गई उनकी प्रोफाइल के मुताबिक, बचपन से ही पहाड़ों के माहौल ने उनमें धैर्य और मुश्किलों से जूझने की क्षमता विकसित की।
उनके पिता शिक्षक रहे हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं। परिवार में पहले किसी के सेना में होने का इतिहास नहीं था। ऐसे में आर्मी ऑफिसर बनने का उनका फैसला अपने आप में एक अलग रास्ता चुनना था।
14 साल परिवार से दूर रहकर की पढ़ाई
स्टैनजिन त्सांगयांग की कहानी का सबसे खास पहलू उनकी पढ़ाई के लिए किया गया त्याग है। बेहतर शिक्षा हासिल करने के लिए उन्होंने कम उम्र में ही अपना घर और गांव छोड़ दिया था।
उन्होंने लैम्डन मॉडल स्कूल, लेह में पढ़ाई की और करीब 14 साल हॉस्टल में परिवार से दूर रहकर शिक्षा हासिल की। एक छोटे और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र से आने वाली बच्ची के लिए इतने लंबे समय तक घर से दूर रहना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने इसी दौर में अपने भविष्य की नींव मजबूत की।
उनकी पढ़ाई में प्रदर्शन अच्छा रहा और उन्हें उच्च शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप भी मिली। इसके बाद उन्होंने असम की तेजपुर यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।
सेना में जाने का सपना कैसे आया?
स्टैनजिन का सेना से जुड़ाव उनके कॉलेज के दिनों में हुआ। उन्होंने नेशनल कैडेट कोर यानी एनसीसी ज्वाइन किया। यहीं से उन्हें पहली बार भारतीय सेना में अधिकारी बनने के अलग-अलग रास्तों के बारे में जानकारी मिली।
एक ऐसे परिवार और समुदाय से आने वाली स्टैनजिन के लिए सेना में अधिकारी बनने का सपना सामान्य करियर विकल्प नहीं था। लेकिन एनसीसी के अनुभव ने उनके भीतर सेना में जाने की इच्छा को मजबूत किया। इसके बाद उन्होंने इस सपने को सिर्फ ख्याल नहीं रहने दिया, बल्कि उसके लिए तैयारी शुरू कर दी।
स्पोर्ट्स ने भी बनाया मजबूत
स्टैनजिन का जुड़ाव खेलों से भी रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक वह बॉलीवॉल की नेशनल लेवल प्लेयर रह चुकी हैं। खेलों ने उनके भीतर टीम भावना, फिटनेस, अनुशासन और लगातार प्रयास करने की आदत को मजबूत किया। ये गुण बाद में सैन्य प्रशिक्षण के दौरान भी उनके काम आए। यानी इंजीनियरिंग की पढ़ाई, एनसीसी और खेल, इन तीनों ने उनके व्यक्तित्व को अलग-अलग स्तर पर तैयार किया।
कैसे तय हुआ आर्मी ट्रेनिंग एकेडमी का रास्ता
भारतीय सेना में अधिकारी बनने का रास्ता आसान नहीं था क्योंकि स्टैनजिन ने कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज (CDS) परीक्षा पास की और इसके बाद सर्विस सिलेक्शन बोर्ड यानी एसएसबी इंटरव्यू की प्रक्रिया से गुजरीं। उन्होंने चयन प्रक्रिया को पार किया और फिर अफसर प्रशिक्षण अकादमी, चेन्नई में सैन्य प्रशिक्षण लिया।
ओटीए में प्रशिक्षण के दौरान सैन्य अनुशासन, शारीरिक क्षमता, नेतृत्व और मानसिक मजबूती की कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता है। स्टैनजिन ने इस चुनौती को पार करते हुए 5 सितंबर को पासिंग आउट परेड में कमीशन हासिल किया।
5 सितंबर 2026 को रचा इतिहास
5 सितंबर 2026 स्टैनजिन के जीवन का बेहद खास दिन बन गया, जब चेन्नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में आयोजित पासिंग आउट परेड में उन्होंने भारतीय सेना में अधिकारी के तौर पर कमीशन हासिल किया।
इस समारोह में कुल 342 कैडेट्स ने प्रशिक्षण पूरा करके विभिन्न सैन्य सेवाओं में अधिकारी के रूप में कमीशन प्राप्त किया। इनमें 29 महिला कैडेट्स भी शामिल थीं लेकिन स्टैनजिन के लिए यह समारोह इसलिए खास था क्योंकि वह अपने क्षेत्र की पहली महिला आर्मी ऑफिसर बनने की उपलब्धि हासिल कर रही थीं।
माता-पिता के लिए गर्व का पल
स्टैनजिन के माता-पिता उनकी पासिंग आउट परेड में शामिल होने के लिए लद्दाख से चेन्नई पहुंचे। उनके पिता टुंडुप त्सेरिंग शिक्षक रहे हैं और मां रिग्ज़िन लाडोल गृहिणी हैं। बेटी को सेना की वर्दी में अधिकारी बनते देखना उनके लिए बेहद भावुक और गर्व का क्षण था। स्टैनजिन के पिता के मुताबिक वह उनके परिवार की पहली सदस्य हैं, जिन्होंने सेना में कदम रखा है।
जंस्कार की बेटियों के लिए बनीं मिसाल
स्टैनजिन त्सांगयांग की उपलब्धि का महत्व केवल एक सरकारी नौकरी या सैन्य पद तक सीमित नहीं है। उनकी कहानी उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है, जो देश के दूरदराज इलाकों में रहते हैं और बड़े सपने देखते हैं।
जंस्कार जैसे दुर्गम इलाके से निकलकर पहले लेह में शिक्षा हासिल करना, फिर हजारों किलोमीटर दूर असम जाकर इंजीनियरिंग पढ़ना और अंत में चेन्नई में सैन्य प्रशिक्षण पूरा करना बताता है कि भौगोलिक दूरी किसी सपने की सीमा तय नहीं करती। इसके साथ ही आर्मी ट्रेनिंग कमांड ने भी उनकी कहानी को इसी संदेश से जोड़ा है कि देश के दूरदराज इलाकों में जन्मे सपने भी ऊंची मंजिल तक पहुंच सकते हैं।
