Where to go after eighth poor children who are studying in private schools - शिक्षा का अधिकार कानून: आठवीं के बाद कहां जाएंगे निजी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चे - Jansatta
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शिक्षा का अधिकार कानून: आठवीं के बाद कहां जाएंगे निजी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चे

इस हफ्ते दिल्ली हाई कोर्ट ने गैर-सरकारी संगठन सोशल ज्यूरिस्ट की जनहित याचिका पर दिल्ली की सरकारी जमीन पर चलने वाले निजी स्कूलों (लगभग 400 स्कूल) को निर्देश दिया है कि वे ईडब्लूएस के तहत दाखिल बच्चों को 12वीं तक निशुल्क शिक्षा देंगे।

Author नई दिल्ली, 27 मई। | May 28, 2018 6:12 AM
ऐसे में सोशल ज्यूरिस्ट की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल एक और याचिका उम्मीद बंधाती है। इस याचिका के माध्यम से ईडब्लूएस वर्ग के बच्चों को 12वीं तक निशुल्क शिक्षा मुहैया कराने के लिए शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009 में संशोधन करने की मांग की गई है।

शिक्षा का अधिकार कानून, 2009 समाज के आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग (ईडब्लूएस/डीजी) के बच्चों को निजी स्कूलों में प्रवेश स्तर पर 25 फीसद सीटों पर दाखिले के माध्यम से आठवीं तक मुफ्त शिक्षा का अवसर देता है, लेकिन 2010 से लागू इस कानून के तहत उस समय पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले बच्चों के सामने इस साल एक अप्रैल से एक गंभीर समस्या आ गई है कि वे 9वीं में उसी स्कूल में भारी फीस जमा कर पढ़ाई जारी रखें या फिर स्कूल छोड़ने को मजबूर हों। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने दो बार केब (केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड) की बैठक में अध्यादेश के माध्यम से कानून में बदलाव कर इन बच्चों को 12वीं तक मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किए जाने की अनुशंसा की थी, लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं की गई।

इस हफ्ते दिल्ली हाई कोर्ट ने गैर-सरकारी संगठन सोशल ज्यूरिस्ट की जनहित याचिका पर दिल्ली की सरकारी जमीन पर चलने वाले निजी स्कूलों (लगभग 400 स्कूल) को निर्देश दिया है कि वे ईडब्लूएस के तहत दाखिल बच्चों को 12वीं तक निशुल्क शिक्षा देंगे। संगठन की ओर से अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने कहा था कि स्कूल 8वीं से 9वीं कक्षा में आने वाले ईडब्लूएस के छात्रों से फीस मांग रहे हैं और फीस जमा नहीं करने वाले छात्रों को स्कूल से निकाला जा रहा है। हालांकि कोर्ट का यह फैसला दिल्ली की सरकारी जमीन पर बने स्कूलों पर ही लागू है, दिल्ली के ही अन्य निजी स्कूल और देशभर के मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों के ईडब्लूएस/डीजी के बच्चे इस फैसले का लाभ नहीं उठा सकेंगे।

दो साल में और बढ़ेंगे दाखिले

अलगे दो सालों में इन बच्चों की संख्या और बढ़ेगी क्योंकि कई स्कूलों में प्रवेश स्तर पहली कक्षा की जगह नर्सरी और केजी है। ईडब्लूएस कोटे के तहत केजी में दाखिला लेने वाले बच्चों की पहली खेप 2019 में आठवीं पास कर लेगी और नर्सरी में दाखिला लेने वाला ईडब्लूएस बच्चों का पहली खेप 2020 में आठवीं पास कर लेगी। इन बच्चों की संख्या हजारों में होगी। अकेले दिल्ली में राज्य सरकार से संबद्ध 1595 स्कूलों में प्रवेश स्तर पर 127447 सीटें हैं, जिनमें ईडब्लूएस/डीजी की 31862 सीटें बनती हैं। नर्सरी कक्षा से शुरू होने वाले 567 स्कूलों में 17897 सीटें, केजी से शुरू होने वाले 256 स्कूलों में 2962 सीटें और पहली से शुरू होने वाले 772 स्कूलों में लगभग 11005 सीटें बनती हैं।

12वीं तक मुफ्त शिक्षा की सिफारिश

एनसीपीसीआर ने 14 दिसंबर, 2017 को संपन्न केब की बैठक में अनुशंसा की थी कि आरटीई कानून के सेक्शन 12(1)सी में जरूरी बदलाव लाकर ईडब्लूएस/डीजीवर्ग के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त मान्य स्कूलों में दाखिल बच्चों को 12वीं तक मुफ्त शिक्षा का प्रावधान किया जाए। आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा,‘फीस न चुका सकने की दशा में इन बच्चों को स्कूल छोड़ना होगा और ऐसे में जिस मानसिक और सामाजिक तनाव से वे गुजरेंगे, उसे झेल पाना उनके लिए मुश्किल होगा। इस बात की बहुत आशंका होगी कि ये बच्चे अवसादग्रस्त हो जाएं या अपराध का रास्ता अपना लें’। आयोग 25 अक्तूबर 2016 को हुई केब की बैठक में भी आरटीई कानून के सेक्शन 12(1)सी के प्रावधानों को 12वीं कक्षा तक लागू करने की अनुशंसा कर चुका है, लेकिन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय का रुख ठंडा रहा।

शिक्षा के अधिकार कानून में संशोधन की मांग

ऐसे में सोशल ज्यूरिस्ट की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल एक और याचिका उम्मीद बंधाती है। इस याचिका के माध्यम से ईडब्लूएस वर्ग के बच्चों को 12वीं तक निशुल्क शिक्षा मुहैया कराने के लिए शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009 में संशोधन करने की मांग की गई है। अशोक अग्रवाल ने कहा कि कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस भेजा है। वैसे आरटीई के सेक्शन 12(1)सी का सच यह भी है कि तेलंगाना, हरियाणा, महाराष्ट्र जैसे कई राज्य इसे अभी अपने यहां लागू ही नहीं कर सके हैं।

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