केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (OSM) की चर्चा इन दिनों काफी हो रही है और इस चर्चा की वजह है कि बोर्ड का यह सिस्टम इन दिनों काफी विवादों में है। दरअसल, सीबीएसई बोर्ड 12वीं का रिजल्ट आने के बाद अपने मार्क्स से असंतुष्ट छात्रों ने स्कैन की गई आंसर शीट के लिए रिक्वेस्ट डाली तो बोर्ड की ओर से जो उत्तर पुस्तिकाएं उपलब्ध कराई गईं उनमें गड़बड़ी की बात सामने आई। कई छात्रों ने यह शिकायत दर्ज कराई कि जो कॉपी उन्हें मिली है वह उनकी नहीं है। ऐसे मामले सामने आने के बाद तो हजारों की संख्या में स्टूडेंट्स ने अपनी स्कैन कॉपी के लिए रिक्वेस्ट डाल दी और फिर CBSE के OSM सिस्टम की पोल खोल गई।
छात्रों ने OSM पर लगाए यह आरोप
छात्रों ने आरोप लगाया कि सीबीएसई बोर्ड की ओर से जो कॉपियां उपलब्ध कराई गईं हैं उनकी जांच ठीक से नहीं हुई है। स्टूडेंट्स की ओर से यहां तक कहा गया है कि कई प्रश्न बिना चेक किए ही छोड़ दिए गए जबकि कुछ मामलों में अंकों की गणना में भी गलती पाई गई। छात्रों के इन आरोपों के बीच शिक्षा मंत्रालय और बोर्ड ने भी यह मान लिया था कि हां उनके OSM सिस्टम में गड़बड़ी हुई है। इस पूरे मामले के बीच हम आपको OSM के बारे में विस्तार से बताते हैं कि आखिर यह सिस्टम क्या है? कैसे काम करता है और दुनिया के किन-किन देशों ने इस सिस्टम को अपनाया हुआ है।
CBSE के OSM सिस्टम में कई खामियां, दूसरे देशों में कैसे चेक होती हैं कॉपियां?
OSM क्या है?
OSM यानी ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम एक डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली है जिसमें आंसर शीट का ऑनलाइन मूल्यांकन किया जाता है। इस प्रक्रिया की खास बात यह है कि उत्तर पुस्तिका कागज से हटकर डिजिटली रूप में जांची जाती है। इस प्रोसेस में कॉपियों का मूल्यांकन शिक्षकों के द्वारा ही किया जाता है, लेकिन कॉपी उनके हाथ में न होकर उनके लैपटॉप या फिर कंप्यूटर की स्क्रीन पर होती है। सीबीएसई बोर्ड ने इस प्रक्रिया को इसी साल यानी 2026 से ही कक्षा 12वीं के लिए लागू किया था। हालांकि इसकी अवधारणा 2014 में तैयार हुई थी, लेकिन उपयुक्त तकनीकी उपकरणों की उपलब्धता नहीं होने के कारण इसे लागू नहीं किया गया था।
कैसे काम करता है OSM सिस्टम?
ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम के बारे में हम ऊपर बता चुके हैं और भारत में इसको लेकर क्या विवाद चल रहा है यह भी बता दिया गया है। अब यह सिस्टम काम कैसे करता है इसके बारे में आपको बताते हैं। OSM सिस्टम के तहत सबसे पहले एग्जाम की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन किया जाता है। स्कैन की गई कॉपियों को एक ऑनलाइन सिस्टम में अपलोड किया जाता है, जहां से यह आंसर शीट परीक्षक (Examiner) तक पहुंचती और फिर परीक्षक अपनी स्क्रीन पर इस कॉपी की जांच करता है। साथ ही हर प्रश्न के मार्क्स भी ऑनलाइन ही डिजीटली रूप में दे दिए जाते हैं। स्टूडेंट्स के मार्क्स सीधा सिस्टम में रिकॉर्ड होते रहते हैं। इससे छात्रों के मार्क्स में किसी तरह की गड़बड़ी की संभावना कम होती है।
Exclusive: कमियां पता होने के बाद भी CBSE ने लागू कर दिया था OSM सिस्टम

ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम के क्या है फायदे?
मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ती है और छात्रों में भरोसे का भाव आता है।
इस प्रक्रिया के दौरान मानवीय त्रुटियों की संभावना बहुत कम होती है।
परीक्षा परिणाम जल्दी जारी किए जा सकते हैं।
प्रत्येक प्रश्न का अलग-अलग विशेषज्ञ द्वारा मूल्यांकन संभव होता है।
मॉडरेशन और गुणवत्ता जांच आसान हो जाती है।
किन-किन देशों में लागू है OSM?
वैश्विक स्तर पर ऑन स्क्रीन मार्किंग (OSM) को 150 से अधिक देशों ने अपनाया हुआ है। भारत में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने 2026 से कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम को शुरू किया था। सीबीएसई से पहले दिल्ली और मुंबई की कई यूनिवर्सिटी और ICAI जैसी पेशेवर संस्था भी इस प्रोसेस का इस्तेमाल करती है। भारत के अलावा OSM का इस्तेमाल ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, यूएई और दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रमुख देशों में काफी पहले से हो रहा है। नीचे हम आपको विस्तृत रूप से बता रहे हैं कि इन देशों में यह सिस्टम कैसे काम करता है?
ब्रिटेन में कैसी व्यवस्था?
इंग्लैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में 16 साल तक के छात्रों के लिए जनरल सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (GCSE) परीक्षा आयोजित की जाती है। इस परीक्षा की कॉपियां शिक्षक या पूर्व शिक्षक चेक करते हैं। अधिकांश एग्जामिनर स्कूल या कॉलेज में पढ़ा रहे होते हैं। खास बात यह है कि GCSE परीक्षाओं के लिए एग्जामिनर केवल परीक्षा सीजन के दौरान ही नियुक्त किए जाते हैं।
GCSE स्तर की परीक्षाओं में एक और सामान्य बात देखने को मिलती है। यहां आमतौर पर डबल मार्किंग की व्यवस्था नहीं होती। डबल मार्किंग का मतलब है कि एक ही उत्तर पुस्तिका को दो या उससे अधिक परीक्षक जांचें। ब्रिटेन में डबल मार्किंग न होने की बड़ी वजह परीक्षाओं का विशाल पैमाना है। यहां हर साल करीब 50 लाख GCSE और लगभग 7.5 लाख A-Level परीक्षाएं आयोजित होती हैं। कुल मिलाकर 1.7 करोड़ से अधिक उत्तर पुस्तिकाओं की जांच करनी पड़ती है। यही कारण है कि डबल मार्किंग को व्यावहारिक नहीं माना जाता।
ऑस्ट्रेलिया में कैसी व्यवस्था?
ऑस्ट्रेलिया में हायर स्कूल सर्टिफिकेट (HSC) परीक्षा आयोजित की जाती है। यह भारत की 12वीं बोर्ड परीक्षा की तरह ही होती है। इस परीक्षा में गणित और विज्ञान विषयों में बहुविकल्पीय (MCQ) और छोटे उत्तर वाले प्रश्न पूछे जाते हैं। कॉपियों की जांच अनुभवी शिक्षक करते हैं। परीक्षकों का चयन उनके विषय ज्ञान और अनुभव के आधार पर किया जाता है।
एक महत्वपूर्ण नियम यह भी है कि यदि किसी परीक्षक का कोई रिश्तेदार उसी परीक्षा में शामिल हो रहा है, तो उसे इसकी जानकारी पहले से देनी होती है। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स राज्य में डबल मार्किंग की व्यवस्था लागू है। यहां दो परीक्षक स्वतंत्र रूप से किसी भी छात्र की कॉपी जांचते हैं। दोनों एक-दूसरे के दिए गए अंक नहीं देख सकते।
कनाडा में कैसे काम करता है OSM?
कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में Alberta Diploma नाम की परीक्षा होती है। इसे ग्रेड 12 की अंतिम बोर्ड परीक्षा माना जाता है। इस परीक्षा में गणित और विज्ञान के लिए MCQ और छोटे उत्तर वाले प्रश्न होते हैं, जबकि अंग्रेजी और इतिहास जैसे विषयों में निबंध आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं।
इन परीक्षाओं की जांच करने वाले शिक्षकों के लिए सख्त नियम हैं। शिक्षक को संबंधित विषय पढ़ाने का कम से कम दो वर्ष का अनुभव होना चाहिए। अंग्रेजी भाषा कला (English Language Arts) के लिए कम से कम एक वर्ष का अनुभव आवश्यक है। इसके अलावा, जिस वर्ष परीक्षा हो रही हो, उस वर्ष भी शिक्षक उसी विषय को पढ़ा रहा हो, इसे प्राथमिकता दी जाती है।
शिक्षक के पास स्थायी शिक्षण प्रमाणपत्र होना भी जरूरी है। यहां कोई भी शिक्षक सीधे एग्जामिनर बनने के लिए आवेदन नहीं कर सकता। उसके नाम की सिफारिश स्कूल का सुपरिंटेंडेंट या वरिष्ठ अधिकारी करता है।
न्यूजीलैंड में कैसे चेक होती हैं कॉपियां?
न्यूजीलैंड में National Certificate of Educational Achievement (NCEA) परीक्षा आयोजित की जाती है। इसे स्कूल स्तर की प्रमुख राष्ट्रीय योग्यता परीक्षा माना जाता है और यह भारत की 10वीं एवं 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के समान है। यहां प्रश्न मुख्य रूप से वर्णनात्मक होते हैं और MCQ का उपयोग अपेक्षाकृत कम किया जाता है।
कॉपियों की जांच केवल विषय विशेषज्ञों द्वारा की जाती है। जिस विषय की कॉपी जांचनी हो, उसमें पर्याप्त अनुभव और विशेषज्ञता अनिवार्य होती है। न्यूजीलैंड क्वालिफिकेशंस अथॉरिटी (NZQA) ही परीक्षकों की नियुक्ति करती है। यहां छात्रों का मूल्यांकन केवल अंकों के आधार पर नहीं किया जाता।
