कल्पना कीजिए… किसी वाक्य में एक ही शब्द दो बार आए और दोनों जगह उसका अर्थ अलग-अलग हो। हिंदी की यही खूबसूरती भाषा को रोचक बनाती है। ऐसा ही एक शब्द ‘कनक’ है। कनक का एक अर्थ सोना है। वहीं दूसरा अर्थ धतूरा भी होता है। कविवर बिहारी ने अपने प्रसिद्ध दोहे में ‘कनक’ शब्द का बेहद सुंदर ढंग से प्रयोग किया है- कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। जो खाए बौराय, जो पाए बौराय।।
यमक अलंकार के उदाहरण वाले इस दोहे में ‘कनक’ पहली बार धतूरे के अर्थ में आया है और दूसरी बार सोने के अर्थ में। बिहारी ने इसी अर्थ-भेद के जरिये बताया है कि दोनों ही मनुष्य की बुद्धि पर अलग-अलग तरह से असर डाल सकते हैं। जनसत्ता की सही हिंदी में आइए जानते हैं ‘कनक’ के अलग-अलग अर्थों, प्रयोग और भावार्थ।
कनक का अर्थ क्या है?
- ‘कनक’ के मुख्य रूप से दो प्रचलित अर्थ हैं। एक- स्वर्ण या सोना और दूसरा- धतूरा।
- कनक: सोना। हिंदी और संस्कृत साहित्य में ‘कनक’ का प्रयोग सोने या स्वर्ण के लिए किया जाता है।
- कनक: धतूरा। धतूरा एक ऐसा पौधा है। इसके सेवन से नशे जैसा प्रभाव हो सकता है। इसका अधिक सेवन विषैला भी हो सकता है।
स्वर्ण और धतूरे दोनों में मादकता होती है। स्पष्ट शब्दों में सोना धातु होकर भी मनुष्य को उन्मत्त और पागल बना देता है। लोग धतूरे को खाकर पागल हो सकते हैं। वहीं, सोना मिलने पर उन्मत्त हो जाते हैं। ऐसे में संदर्भानुसार ‘कनक’ का अर्थ समझा जाता है। यही कारण है कि बिहारी के दोहे में एक ही शब्द के दो अलग अर्थ निकलते हैं।
बिहारी के दोहे में ‘कनक’ का सरल भावार्थ
धतूरे को खाने से व्यक्ति पर नशे का असर होता है और वह अपना विवेक खो सकता है। वहीं, सोना यानी धन-संपत्ति भी मनुष्य को इतना आकर्षित कर सकती है कि उसे पाने वाला व्यक्ति कई बार उसके मोह में अपना विवेक खो बैठता है। बिहारी कहते हैं कि धतूरे से भी सौ गुना अधिक मादकता सोने में है, क्योंकि धतूरा खाने पर ही असर करता है, जबकि सोना मिलने मात्र से ही मनुष्य उसके मोह में ‘बौरा’ सकता है।
बिहारी ने इसी अर्थ-भेद का इस्तेमाल करते हुए दोहे में एक गहरा भाव पैदा किया है। ध्यान रहे कि समानार्थी शब्द भी संदर्भ के अनुसार चुना जाना चाहिए। ‘कनक’ को देखकर हर जगह ‘स्वर्ण’ समझ लेना सही नहीं होगा।
‘कनक’ का प्रयोग
‘कनक’ का प्रयोग मुख्यतः साहित्यिक, काव्यात्मक और संस्कृतनिष्ठ हिंदी में अधिक देखने को मिलता है। सामान्य बोलचाल में ‘सोना’ शब्द अधिक प्रचलित है। हालांकि, ‘कनक’ सामान्यतः सोने या स्वर्ण के अर्थ में ही इस्तेमाल होता है।
उदाहरण
- कवि ने कनक के समान चमकते आभूषणों का वर्णन किया।
- प्राचीन साहित्य में कनक शब्द का प्रयोग स्वर्ण के लिए मिलता है।
- बिहारी ने ‘कनक’ शब्द के दो अर्थों का चमत्कारिक प्रयोग किया है।
- जनसत्ता के लेख में जानिए ‘कनक’ और ‘कनक’ में क्या अंतर है?
‘कनक’ यह समझने का अच्छा उदाहरण है कि किसी शब्द का अर्थ केवल शब्द देखकर तय नहीं किया जा सकता। संदर्भ यह तय करता है कि शब्द का अर्थ क्या होगा।
अभिप्राय
‘कनक’ का अर्थ-भेद हिंदी भाषा की उस खूबसूरती को सामने लाता है, जहां एक ही शब्द संदर्भ के अनुसार अलग-अलग अर्थ दे सकता है। बिहारी ने इस विशेषता को केवल शब्दों के खेल के लिए नहीं, बल्कि गहरी बात कहने के लिए इस्तेमाल किया।
दोहा हमें बताता है कि नशा केवल किसी पदार्थ से नहीं होता, बल्कि धन और उसके मोह का प्रभाव भी मनुष्य के विवेक को प्रभावित कर सकता है। धतूरा खाने वाला बौराता है, जबकि सोना पाने वाला उसके आकर्षण में बौराने लगता है। यही कारण है कि वर्षों पुराना यह दोहा आज भी सटीक और प्रभावशाली बना हुआ है।
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