आमतौर पर हमें यही बताया जाता है कि ग्रीक दार्शनिक पाइथागोरस ने 500 ईसा पूर्व के आसपास पाइथागोरस प्रमेय की खोज की थी। लेकिन इसका वास्तविक इतिहास इससे कहीं अधिक दिलचस्प और जटिल है।
पाइथागोरस प्रमेय कहता है कि समकोण त्रिभुज की सबसे लंबी भुजा पर बना वर्ग अन्य दो भुजाओं पर बने वर्गों के योग के बराबर होता है। इस ज्यामितीय सत्य की खोज कई प्राचीन सभ्यताओं द्वारा स्वतंत्र रूप से की गई थी। प्राचीन भारतीय ग्रंथ ‘शुल्वसूत्र’ में इस खोज के संबंध में सबसे प्रामाणिक और प्रभावशाली है विवरण मिलता है, हालांकि यह सबसे पहला साक्ष्य नहीं था।
इस ज्यामिति के इतिहास को समझने के लिए भारत को पहला या महानतम बताने के बजाय, शुल्वसूत्र और उसके रचयिता बौधायन के योगदान को मेसोपोटामिया, मिस्र, चीन और ग्रीस की गणितीय उपलब्धियों के संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा। इससे ज्यामिति के विकास की एक व्यापक और संतुलित तस्वीर सामने आती है।
मेसोपोटामिया से मिले सबसे पुराने दर्ज साक्ष्य
पाइथागोरस प्रमेय के सबसे पुराने दर्ज साक्ष्य ग्रीस या भारत से नहीं आते हैं। वे मेसोपोटामिया से आते हैं (आधुनिक इराक में दजला और फरात नदियों के बीच की भूमि) जहाँ लिपिकों और लेखाकारों की एक अत्यधिक संगठित सभ्यता ने मिट्टी की हजारों पट्टियाँ (क्ले टेबलेट्स) छोड़ी हैं।
गणित के इतिहास को समझने के लिए इनमें से दो पट्टियाँ खास तौर पर महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। लगभग 1800 ईसा पूर्व की ‘प्लिम्पटन 322’ पट्टी पर संख्याओं की ऐसी सूची है, जिन्हें इस तरह व्यवस्थित किया गया है कि वे समकोण त्रिभुज की तीन भुजाओं से जुड़े खास गणितीय संबंध को दिखाती हैं। इन्हें ‘पाइथागोरियन ट्रिपल्स’ कहा जाता है।
वहीं, ‘YBC 7289’ पट्टी गणित की इससे भी अधिक उन्नत समझ दिखाती है। इसमें एक वर्ग की तिरछी रेखा (विकर्ण) के आधार पर 2 के वर्गमूल का बहुत सटीक मान निकाला गया है। यानी, हजारों साल पहले ही लोग वर्ग की विकर्ण लंबाई निकालने के लिए √2 की गणना करना जानते थे।
ये आकस्मिक परिणाम नहीं हैं। वे दिखाते हैं कि बेबीलोन के गणितज्ञों को पाइथागोरस के जन्म से एक हजार साल से भी अधिक समय पहले इस ज्यामितीय संबंध का गहरा और व्यावहारिक ज्ञान था।
मिस्र के गणितीय योगदान के बारे में जानकारी अपेक्षाकृत कम मिलती है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि मिस्रवासी मिट्टी की पट्टियों के बजाय पैपिरस(भोजपत्र) पर लिखते थे, जो समय के साथ आसानी से नष्ट हो जाता है। मिस्र के दो प्रमुख शुरुआती गणितीय पैपिरस में इस प्रमेय का सीधा उल्लेख नहीं मिलता। हालांकि, लगभग 300 ईसा पूर्व के ‘काहिरा गणितीय पैपिरस’ (Cairo Mathematical Papyrus) में ऐसी नौ समस्याएं हैं, जो सीधे पाइथागोरस के संबंध से जुड़ी हुई हैं।
यह भी माना जाता है, हालांकि इसे पूरी तरह साबित करना मुश्किल है, कि पिरामिड बनाने वाले कारीगर 3-4-5 नियम एक (साधारण पाइथागोरियन ट्रिपल) का इस्तेमाल करते थे। पिरामिड के निर्माता इस ट्रिपल का प्रयोग इसलिए करते थे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पिरामिड के वर्गाकार आधारों के कोने बिल्कुल समकोण हों। विशाल संरचनाओं के निर्माण ने यहाँ गणितीय खोज को प्रेरित किया, जैसा कि कई अन्य प्राचीन संस्कृतियों में भी हुआ था।
चीन का उतना ही उल्लेखनीय योगदान
गणित के इतिहास में अक्सर चीन के योगदान को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि वह उतना ही उल्लेखनीय है। चीन में इस प्रमेय को ‘काउ-कु प्रमेय’ (Kou-ku theorem) के रूप में जाना जाता है, और यह ‘चाउ पेई सुआन चिंग’ (Chou Pei Suan Ching) नामक एक प्राचीन ग्रंथ में दिखाई देता है, जिसे छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास संकलित किया गया था।
चीन के मामले में खास बात यह है कि उन्होंने इस प्रमेय को समझाने के लिए ‘हुआन-थू’ (Hsuan-thu) नाम का एक दृश्य प्रमाण भी दिया। इतिहासकार इसे इस गणितीय संबंध को समझाने वाले सबसे शुरुआती और सुंदर उदाहरणों में गिनते हैं। माना जाता है कि चीनी गणितज्ञ इस निष्कर्ष तक स्वतंत्र रूप से पहुंचे थे और इसका इस्तेमाल भूमि की नाप-जोख, निर्माण और सर्वेक्षण जैसे व्यावहारिक कामों में करते थे।
क्या पाइथागोरस ने इस प्रमेय की खोज की थी?
जहां तक खुद पाइथागोरस की बात है, इतिहासकारों का मानना है कि उनके नाम पर मशहूर इस प्रमेय की खोज उन्होंने खुद नहीं की थी। माना जाता है कि पाइथागोरस ने मिस्र और मेसोपोटामिया की यात्रा की थी, जहां उन्हें पहले से मौजूद गणितीय ज्ञान के बारे में जानकारी मिली होगी।
इस प्रमेय का पहला औपचारिक और सटीक ग्रीक प्रमाण यूक्लिड (Euclid) ने दिया था। पाइथागोरस की मृत्यु के करीब तीन शताब्दियों बाद, यूक्लिड ने ज्यामिति पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एलिमेंट्स’ में इस प्रमेय को दर्ज किया था।
इस प्रमेय का नाम पाइथागोरस के नाम पर पड़ने के पीछे दो प्रमुख कारण माने जाते हैं। पहला, बाद में ग्रीक ज्ञान को खास महत्व मिला। दूसरा, पाइथागोरस के स्कूल ने इन गणितीय विचारों को एक व्यवस्थित गणितीय और दार्शनिक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत का योगदान और शुल्वसूत्र
भारत का गणितीय योगदान ‘शुल्वसूत्रों’ में मिलता है। ये लगभग 800 से 500 ईसा पूर्व के बीच लिखे गए प्राचीन ग्रंथों का संग्रह हैं। ‘शुल्वसूत्र’ का अर्थ है ‘रस्सी या डोरी के नियम’। इन ग्रंथों में यज्ञ की वेदियों को सही आकार और माप में बनाने के तरीके बताए गए हैं। उस समय वेदियों को बाज, कछुए और दूसरी पवित्र आकृतियों के रूप में बनाया जाता था। इन्हें सही आकार देने के लिए सटीक माप और ज्यामिति की जरूरत होती थी।
इसके रचयिता बौधायन ने इस प्रमेय का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था, जिसे इतिहासकार इसके शुरुआती और असंदिग्ध कथनों में से एक मानते हैं। उन्होंने बताया कि आयत के विकर्ण से बनने वाला वर्गफल, उसकी लंबाई और चौड़ाई से बने वर्गफलों के योग के बराबर होता है। सरल शब्दों में, यही वह नियम है जिसे आज हम पाइथागोरस प्रमेय के रूप में जानते हैं।
शुल्वसूत्र में कई पाइथागोरियन ट्रिपल्स का भी उल्लेख है, जिनमें 3-4-5 और 5-12-13 शामिल हैं, और यह दशमलव के पाँचवें स्थान तक सटीक वर्गमूल की गणना करने की प्रक्रिया प्रदान करता है। यह किसी भी मानक से एक उन्नत गणितीय कार्य है।
ऐतिहासिक साक्ष्य मिलकर जो दर्शाते हैं, वह यह है कि पाइथागोरस प्रमेय किसी एक सभ्यता की देन नहीं है। यह पूरी प्राचीन दुनिया में स्वतंत्र रूप से, अलग-अलग रूपों में और अलग-अलग उद्देश्यों के लिए उभरा। इस कहानी में भारत न तो कोई अगुआ था और न ही पिछड़ा। भारत को उसके समकालीन साथियों के बीच रखना उसका दर्जा घटाना नहीं है; यह वास्तविक इतिहास की शुरुआत है।
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महात्मा गांधी सितंबर 1932 में जब आमरण अनशन शुरू करने की तैयारी कर रहे थे, तब डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि गांधी उन्हें “अपने जीवन और मेरे लोगों के अधिकारों में से किसी एक को चुनने की मजबूरी में नहीं डालेंगे। क्योंकि, मैं अपने लोगों की आने वाली पीढ़ियों को हाथ-पैर बांधकर उच्च जातियों के हवाले करने के लिए कभी सहमत नहीं हो सकता।” पूरी खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
