उच्च शिक्षण संस्थानों के करीब 15 फीसद विद्यार्थियों ने स्वीकार किया है कि पिछले छह महीनों में वे ऐसे दौर से गुजरे, जब उन्होंने खुद को बेहद परेशान या तनावग्रस्त महसूस किया, जबकि नौ फीसद विद्यार्थियों ने मन में आत्महत्या के विचार आने की बात कही। छात्रों में आत्महत्या के बढ़ते मामलों के विश्लेषण के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति के राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में यह जानकारी सामने आई है।
ऐसी संभावना है कि ये निष्कर्ष उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआइ) में विद्यार्थियों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने और आत्महत्याओं को रोकने के लिए मार्च में गठित राष्ट्रीय कार्यबल (एनटीएफ) की अंतिम रिपोर्ट का हिस्सा होंगे। यह रिपोर्ट 31 अक्तूबर तक सौंपे जाने की संभावना है। इस सर्वेक्षण को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) दिल्ली और आइआइटी मुंबई में दो छात्रों की मौत के बाद आत्महत्या को लेकर बहस फिर तेज हो गई है और व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति ने इस साल की शुरुआत में अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा पाना गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक भेदभाव की भावना, मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में व्यापक यौन उत्पीड़न के अनुभव से भरा था।
छात्रों ने हॉस्टल की पाबंदियों और लैंगिक भेदभाव की शिकायत की
साथ ही, विद्यार्थियों ने मेडिकल, कानून और राज्यों के विश्वविद्यालयों में अकादमिक सहायता, छात्रावास में पाबंदियों एवं नैतिक ‘पुलिसिंग’ के मामले में संकाय सदस्यों द्वारा लैंगिक भेदभाव का अनुभव किया। इसके अलावा, राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्रातक (नीट-यूजी) और राष्ट्रीय संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) रैंक के आधार पर जाति की पहचान तथा दाखिले, अंक निर्धारण, भाषा की दिक्कत और शिक्षकों के ध्यान देने के स्तर पर भेदभाव तथा जातिगत अपमान जैसी बातें भी सामने आई हैं।
एनटीएफ द्वारा किए गए छात्र सर्वेक्षण में 2.43 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया, जिनमें से 67 फीसद छात्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी से थे। सर्वेक्षण के अनुसार, करीब 34 फीसद विद्यार्थियों ने किसी न किसी स्तर पर परिसर में खुद को बाहरी व्यक्ति जैसा महसूस करने की बात कही।
सर्वेक्षण में कहा गया, ‘करीब 15 फीसद विद्यार्थियों ने पिछले छह महीनों में ऐसे समय को याद किया, जब वे कई हफ्तों तक लगातार बहुत अधिक तनाव, परेशानी में थे या कई हफ्तों तक उदास या बेचैनी महसूस करते रहे। नौ फीसद विद्यार्थियों ने बताया कि पिछले एक साल में उन्हें अक्सर या बार-बार आत्महत्या के विचार आए।’ सर्वेक्षण में पाया गया कि 56 फीसद विद्यार्थियों ने गंभीर मुद्दों को निष्पक्ष तरीके से निपटने में संस्थान के प्रशासन की क्षमता पर भरोसा जताया, जबकि 32 फीसद विद्यार्थियों ने कहा कि उनके यहां काउंसलिंग की सुविधा नहीं है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि छात्रों की मानसिक सेहत से जुड़ी समस्याओं को हल करने के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है। इस कार्यबल की अध्यक्षता न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट कर रहे हैं।
इसमें प्रसिद्ध मनोचिकित्सक आलोक सरीन, सेंटर फार वीमेन्स डेवलपमेंट स्टडीज की पूर्व निदेशक मैरी ई जान, नेशनल सेंटर फार प्रमोशन आफ एम्प्लायमेंट फार डिसेबल्ड पीपल के कार्यकारी निदेशक अरमान अली, अमन सत्य कछरू न्यास के संस्थापक राजेंद्र कछरू और निमहंस की क्लीनिकल मनोविज्ञान की प्रोफेसर सीमा मेहरोत्रा समेत कई विशेषज्ञ शामिल हैं।
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भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। यह बात अक्सर गर्व के साथ दोहराई जाती है कि देश की बड़ी आबादी कार्यशील आयु वर्ग में है और यही भारत के विकास की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन जब यही युवा, खासकर शिक्षित युवा रोजगार के लिए भटकते नजर आते हैं, तब यह ‘जनसांख्यिकीय लाभ’ एक कठिन सवाल बन कर सामने खड़ा हो जाता है। हाल ही में जारी ‘भारत में कामकाज की स्थिति-2026’ रपट ने इस जटिल वास्तविकता को ठोस तथ्यों के साथ सामने रखा है और देश के युवाओं की शिक्षा, रोजगार और श्रम बाजार से जुड़े कई अहम रुझानों को रेखांकित किया है।
