देश की सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को तमिलनाडु सरकार की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी पर एक अहम टिप्पणी की। कोर्ट की यह टिप्पणी दो दिन पहले ही ‘थ्री लैंग्वेज पॉलिसी’ पर रोक लगाने से इनकार किए जाने से बिल्कुल अलग है। दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय ने 9वीं क्लास में तीसरी भाषा को शामिल करने पर चिंता जताई है।

तमिलनाड सरकार की याचिका किसके खिलाफ थी?

कोर्ट ने कहा कि इससे बोर्ड एग्जाम की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स पर बिना वजह का स्ट्रेस पड़ेगा। तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी जिस पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह टिप्पणी की। तमिलनाडु सरकार की याचिका मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ थी जिसमें हाईकोर्ट ने राज्य के हर जिले में ‘जवाहर नवोदय विद्यालय’ (JNV) खोलने में मदद करने का निर्देश दिया था।

दो दिन पहले SC ने पॉलिसी पर रोक लगाने से किया था इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले ही सीबीएसई की ‘थ्री लैंग्वेज पॉलिसी’ के खिलाफ दाखिल की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए उस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि कोई भी भाषा सीखना कभी बेकार नहीं जाता। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया था कि क्या अंग्रेजी को भारत की स्वदेशी (मूल) भाषा माना जा सकता है? साथ ही इसे लागू करने में आने वाली चुनौतियों को लेकर सरकार और सीबीएसई से 10 दिन में जवाब मांगा था। इस मामले में अगली सुनवाई 29 जुलाई को की जाएगी।

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‘9वीं से नहीं 6वीं से शुरू की जाए तीसरी भाषा’

तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बोर्ड की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर चिंता जाहिर की। कोर्ट ने कहा कि इससे बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों पर बिना वजह का स्ट्रेस पड़ेगा। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि तीसरी भाषा को 9वीं से नहीं बल्कि 6वीं से अनिवार्य करना चाहिए, 9वीं में आप नई भाषा को शुरू नहीं कर सकते, क्योंकि 9वीं कक्षा काफी तनावपूर्ण होती है।

CJI की अगुवाई वाली बेंच ने पॉलिसी पर रोक लगाने से किया था इनकार

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में CBSE की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी की वैलिडिटी पर सीधे तौर पर विचार नहीं किया गया था, लेकिन जस्टिस नागरत्ना ने तीसरी भाषा शुरू करने के समय पर कई बातें कहीं। खास बात यह है कि CBSE की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को अभी चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच के सामने अलग-अलग पब्लिक इंटरेस्ट पिटीशन में चुनौती दी जा रही है। बेंच ने पॉलिसी को लागू करने पर रोक लगाने से मना कर दिया है और मामले की सुनवाई अगले हफ्ते के लिए लिस्ट कर दी है।

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सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने कहा कि राज्य का एतराज मुख्य रूप से तीन-भाषा पॉलिसी से जुड़ा है। जस्टिस नागरत्ना ने साफ किया कि पॉलिसी में हिंदी को तीसरी भाषा के तौर पर जरूरी नहीं बनाया गया है। उन्होंने कहा, “राज्य की भाषा पढ़ाई जानी चाहिए, इंग्लिश पढ़ाई जानी चाहिए और कोई भी तीसरी भाषा पढ़ाई जानी चाहिए, लेकिन इसमें कहीं भी हिंदी नहीं लिखा है।”

हाई कोर्ट में NGO पिटीशनर की ओर से पेश हुए वकील जी. प्रियदर्शिनी ने बताया कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी में साफ तौर पर कहा गया है कि किसी भी राज्य पर कोई भी भाषा नहीं थोपी जानी चाहिए। जवाब में जस्टिस नागरत्ना ने राज्य से पूछा “आप हिंदी नहीं चाहते, लेकिन अगर यह संस्कृत है, तो क्या दिक्कत है?” तमिलनाडु के वकील ने जवाब दिया कि तीसरी भाषा सिर्फ क्लास 9 से ज़रूरी हो जाती है।

जस्टिस नागरत्ना ने अपने जवाब में कहा, “नहीं, यह बहुत बुरा है। 9वीं क्लास से यह स्ट्रेसफुल होगा। आप 9वीं में एक नई भाषा क्यों शुरू करते हैं? आप इसे 6वीं में शुरू करते हैं।”