कहते हैं कि सफलता के लिए बड़े कॉलेज की डिग्री, आईआईटी की पढ़ाई या किसी बड़े परिवार का सपोर्ट जरूरी नहीं होता। अगर इरादे मजबूत हों और इंसान लगातार सीखता रहे तो मुश्किल हालात भी उसकी राह नहीं रोक सकते। बिहार के दरभंगा से निकलने वाले सुभाष चौधरी की कहानी इसी बात की मिसाल है।
आज उन्हें दुकान के को-फाउंडर और सीटीओ के तौर पर जाना जाता है। Dukaan एक ऐसा नो-कोड प्लेटफॉर्म है, जिसके जरिए व्यापारी बिना ज्यादा तकनीकी जानकारी के अपना ऑनलाइन स्टोर शुरू कर सकते हैं। कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर सुभाष चौधरी को-फाउंडर एंड सीटीओ के रूप में लिस्ट हैं लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने से पहले उनकी जिंदगी में संघर्ष की ऐसी कई परतें थीं, जिन्हें जानकर शायद आपको यकीन करना मुश्किल हो।
3 साल की उम्र में पिता का साया उठ गया
सुभाष चौधरी की जिंदगी का संघर्ष बहुत कम उम्र में शुरू हो गया था। उन्होंने महज 3 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया। इसके बाद उनकी मां ने अकेले ही परिवार की जिम्मेदारी संभाली।
परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि पढ़ाई के लिए बड़े संसाधन जुटाए जा सकें। उनकी मां कपड़े सिलकर घर चलाती थीं। बेटे को पढ़ाने और आगे बढ़ाने की इच्छा जरूर थी, लेकिन आर्थिक परिस्थितियां लगातार चुनौती बनी हुई थीं। यही मुश्किलें आगे चलकर सुभाष के जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गईं।
17 साल की उम्र में दरभंगा छोड़ मुंबई पहुंच गए
जब सुभाष महज 17 साल के थे, तब उन्होंने अपने गांव और घर को छोड़कर मुंबई जाने का फैसला किया। उनके पास न कोई बड़ी डिग्री थी, न किसी बड़े संस्थान की पहचान और न ही किसी प्रभावशाली व्यक्ति का सहारा।
मुंबई पहुंचने के बाद उन्होंने हार मानने के बजाय खुद को तकनीकी क्षेत्र में तैयार करना शुरू किया। उन्होंने करीब 6 महीने का कंप्यूटर हार्डवेयर और नेटवर्किंग कोर्स किया और इसके बाद एक एमएनसी में नौकरी हासिल कर ली। यह नौकरी उनके लिए सिर्फ कमाई का जरिया नहीं थी। यहीं से उन्होंने तकनीक को गहराई से समझना और समस्याओं का समाधान करना सीखा।
डिग्री नहीं थी, लेकिन सीखने की लगन थी
सुभाष की कहानी का सबसे खास पहलू यह है कि उनके पास पारंपरिक कॉलेज डिग्री नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने अपने काम और अनुभव के जरिए तकनीकी क्षेत्र में अपनी जगह बनाई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नौकरी के करीब छह वर्षों के दौरान उन्होंने सिस्टम, सर्वर और टेक्नोलॉजी से जुड़ी समस्याओं पर लगातार काम किया।
उनका यह अनुभव इतना बढ़ा कि वे बड़ी इंजीनियरिंग टीम को संभालने की स्थिति तक पहुंच गए। यानी जहां कई लोग डिग्री को करियर की पहली सीढ़ी मानते हैं, वहीं सुभाष ने सीखने, काम करने और अनुभव हासिल करने को अपनी सीढ़ी बनाया।
नौकरी करते-करते आया बिजनेस का आइडिया
करीब छह साल नौकरी करने के बाद सुभाष को महसूस होने लगा कि वह सिर्फ सिस्टम संभालने तक सीमित नहीं रहना चाहते। वह खुद कुछ ऐसा बनाना चाहते थे, जिसका इस्तेमाल बड़ी संख्या में लोग कर सकें। इसी दौरान उनकी मुलाकात सुमित शाह से हुई। दोनों ने मिलकर डिजिटल क्षेत्र में काम करना शुरू किया और आगे चलकर Dukaan की नींव रखी।
Dukaan की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, कंपनी की स्थापना 2020 में सुमित शाह और सुभाष चौधरी ने की थी। कंपनी का उद्देश्य ऐसा नो-कोड प्लेटफॉर्म तैयार करना था, जिससे व्यापारी आसानी से ऑनलाइन बिजनेस शुरू कर सकें।
कोरोना काल में छोटे दुकानदारों की परेशानी ने बदली कहानी
साल 2020 में कोरोना महामारी और लॉकडाउन ने छोटे कारोबारियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। दुकानें बंद थीं और कई दुकानदारों के सामने ग्राहकों तक पहुंचने का कोई आसान डिजिटल माध्यम नहीं था। यहीं से दुकान का आइडिया तेजी से आगे बढ़ा। सुभाष और सुमित ने ऐसा प्लेटफॉर्म बनाने पर काम किया, जिसके जरिए किसी दुकान को ऑनलाइन लाने के लिए तकनीकी विशेषज्ञ या लंबी-चौड़ी वेबसाइट डेवलपमेंट की जरूरत न पड़े।
रिपोर्ट्स के अनुसार, मई 2020 में दोनों ने दुकान का शुरुआती वर्जन तैयार किया। हालांकि कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर स्थापना वर्ष 2020 बताया गया है और दुकान के आधिकारिक ब्लॉग में भी कंपनी की स्थापना जून 2020 बताई गई है।
30 सेकंड में ऑनलाइन स्टोर का आइडिया बना पहचान
दुकान की खासियत उसका आसान इस्तेमाल था। इसका मकसद ऐसे व्यापारियों को भी ऑनलाइन लाना था, जिन्हें कोडिंग या वेबसाइट बनाने की जानकारी नहीं थी। दुकान ने व्यापारियों को अपने मोबाइल से ऑनलाइन स्टोर तैयार करने की सुविधा दी। कंपनी के मुताबिक इसका नो-कोड मॉडल व्यापारियों को ई-कॉमर्स वेबसाइट बनाने और उसे ऑनलाइन चलाने में मदद करता है।
यानी जिस समय लाखों छोटे दुकानदारों के सामने कारोबार बचाने की चुनौती थी, उस समय एक टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म ने उन्हें डिजिटल बाजार से जोड़ने का रास्ता दिया।
आज करोड़ों की वैल्यूएशन वाली कंपनी का हिस्सा
सुभाष चौधरी की कहानी अब उस मुकाम पर पहुंच चुकी है जहां कभी आर्थिक परेशानियों से जूझने वाला एक युवा टेक स्टार्टअप की दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है।
मीडिया रिपोर्ट्स में दुकान की वैल्यूएशन करीब 800 करोड़ और सुभाष चौधरी की व्यक्तिगत नेटवर्थ 203 करोड़ से अधिक बताई गई है। इन व्यक्तिगत संपत्ति और मौजूदा वैल्यूएशन के आंकड़ों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी है, इसलिए इन्हें रिपोर्टेड आंकड़े के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
Dukaan ने 2021 में 11 मिलियन की प्री-सीरिज ए फंडिंग भी जुटाई थी। कंपनी के आधिकारिक ब्लॉग के मुताबिक उस दौर में लाइटस्पीड और मैट्रिक्स पार्टनर्स इंडिया समेत कई निवेशकों का समर्थन मिला था।
गरीबी से सफलता तक की कहानी देती है बड़ा सबक
सुभाष चौधरी की जिंदगी की कहानी सिर्फ एक स्टार्टअप के सफल होने की कहानी नहीं है। इसमें गरीबी, संघर्ष, आत्मनिर्भरता, सीखने की लगन और सही समय पर अवसर पहचानने का संदेश भी छिपा है। उन्होंने यह दिखाया कि अगर किसी व्यक्ति के पास पारंपरिक डिग्री नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसके लिए सफलता के रास्ते बंद हो गए हैं।
17 साल की उम्र में घर से निकलने वाला एक युवा, जिसने कंप्यूटर हार्डवेयर और नेटवर्किंग का छोटा-सा कोर्स करके करियर शुरू किया था, आगे चलकर टेक्नोलॉजी कंपनी का सीओ- फाउंडर और सीटीओ बना।
मां के संघर्ष से बेटे की सफलता तक
सुभाष चौधरी की कहानी का सबसे भावुक पहलू उनकी मां का संघर्ष है। जिस मां ने कपड़े सिलकर परिवार चलाया और बेटे को मुश्किल परिस्थितियों में बड़ा किया, उसी बेटे ने आगे चलकर टेक्नोलॉजी की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। यह कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो आर्थिक समस्याओं या सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को छोटा समझने लगते हैं।
सुभाष चौधरी की सफलता का सबसे बड़ा संदेश यही है, कि शुरुआत चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, अगर सीखने की भूख, मेहनत और लगन बनी रहे तो मंजिल बड़ी हो सकती है।
