School’s Conditions in India: भारत में केवल एक शिक्षक के भरोसे चलने वाले स्कूलों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। UDISE रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024-25 में देश में ऐसे स्कूलों की संख्या 1,04,125 थी, जो 2025-26 में घटकर 1,00,843 रह गई। इस तरह एक साल के भीतर देश भर में एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या में 3,282 की शुद्ध कमी आई है।
ये सारी जानकारी केंद्र सरकार द्वारा शिक्षकों के रिक्त पदों से जुड़े एक सवाल के जवाब में जुलाई के अंत में राज्यसभा में पेश की गई थी। एकल-शिक्षक स्कूल उस व्यवस्था को कहा जाता है, जहां एक ही शिक्षक पर सभी कक्षाओं और विषयों को पढ़ाने की जिम्मेदारी होती है, और इसे शिक्षा संसाधनों की कमी के एक प्रमुख संकेतक के रूप में देखा जाता है।
राष्ट्रीय आंकड़ों के पीछे छिपा राज्यों का विरोधाभास
राष्ट्रीय स्तर पर आई गिरावट सभी राज्यों में एक समान नहीं है। दोनों वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि केवल पांच राज्यों ने मिलकर 11,000 से अधिक एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या कम की है, जो कि देश भर में हुई कुल net कमी से तीन गुना से भी ज्यादा है।
इसके ठीक विपरीत, कई अन्य राज्यों में ऐसे स्कूलों की संख्या में हजारों का इजाफा हुआ है। ऐसे में देश भर में दिख रही 3,282 स्कूलों की कुल गिरावट वास्तव में इन दो परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों का मिला-जुला परिणाम है।
किन राज्यों में घटी एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या
मध्य प्रदेश में ऐसे स्कूलों की संख्या में सबसे तेज गिरावट देखने को मिली है। राज्य में एकल-शिक्षक स्कूल 2024-25 में 7,217 से घटकर 2025-26 में 2,269 रह गए, यानी अकेले मध्य प्रदेश में 4,948 स्कूलों की कमी आई, जो कि देश की कुल net गिरावट से भी अधिक है। इसके बाद छत्तीसगढ़ में यह संख्या 5,973 से घटकर 2,461 रह गई, जिससे 3,512 स्कूलों की कमी दर्ज की गई।
उत्तर प्रदेश की बात करें बड़े राज्यों में सबसे अधिक एकल-शिक्षक स्कूल हैं, ने इस संख्या को 9,508 से घटाकर 7,874 कर लिया, जो 1,634 की कमी दर्शाता है। इसके अलावा पंजाब में 682 और गुजरात में 601 स्कूलों की कमी के साथ ये दोनों राज्य शीर्ष पांच की सूची में शामिल रहे।
किन राज्यों में बढ़ गए एकल-शिक्षक स्कूल
दूसरी ओर, आंध्र प्रदेश में एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या में देश में सबसे बड़ी वृद्धि दर्ज की गई। आंध्र प्रदेश में ऐसे स्कूलों की संख्या 12,912 से बढ़कर 16,357 हो गई, यानी एक ही साल में 3,445 नए एकल-शिक्षक स्कूल जुड़ गए। महाराष्ट्र और राजस्थान में भी ऐसे स्कूलों की संख्या में एक-एक हजार से अधिक का इजाफा हुआ, जहां क्रमश: 1,117 और 1,083 स्कूलों की बढ़ोतरी देखी गई। कर्नाटक में 693 और झारखंड में 655 अतिरिक्त एकल-शिक्षक स्कूल दर्ज किए गए।
सरकार के जवाब में क्या रहा शामिल और क्या छूटा
राज्यसभा में दिए गए सरकार के जवाब में राज्यों के बीच इस बड़े अंतर की वजह स्पष्ट नहीं की गई है। केंद्र सरकार ने शिक्षकों की कमी के लिए सामान्य कारणों जैसे सेवानिवृत्ति, त्यागपत्र, नए पदों के सृजन, शिक्षकों के तर्कसंगत समायोजन और नामांकन में बदलाव को जिम्मेदार ठहराया है, लेकिन इन्हें विशिष्ट रूप से उन राज्यों से नहीं जोड़ा गया है जहां बड़ी वृद्धि या कमी देखी गई है।
सरकार ने मूल सवाल के उस हिस्से का भी स्पष्ट जवाब नहीं दिया जिसमें राज्यवार स्वीकृत पदों, कार्यरत शिक्षकों और खाली पदों का ब्योरा मांगा गया था। इस पर सरकार ने कहा कि यह डेटा राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा रखा जाता है। इसके स्थान पर केवल वर्तमान में तैनात शिक्षकों की संख्या और UDISE+ 2025-26 के अनुसार एकल-शिक्षक स्कूलों के आंकड़े साझा किए गए। स्वीकृत पदों और रिक्तियों की स्पष्ट जानकारी न होने के कारण यह कहना संभव नहीं है कि एकल-शिक्षक स्कूलों में आई कमी नई नियुक्तियों से हुई है या फिर स्कूलों के विलय, बंद होने या पुनर्वगीकरण के कारण।
छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार के संकेत
दोनों वर्षों के डेटा में छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) को अलग-अलग तरीके से मापा गया है, जिससे सीधी तुलना सीमित हो जाती है। UDISE+ 2024-25 में पूरे देश के लिए एक ही PTR आंकड़ा 24 छात्र प्रति शिक्षक दिया गया था। वहीं UDISE+ 2025-26 के आंकड़ों में समग्र संख्या न देकर शिक्षा के स्तर के आधार पर विभाजन किया गया है, जिसके तहत प्राथमिक स्तर पर 19, उच्च प्राथमिक पर 17, माध्यमिक पर 15 और उच्च माध्यमिक स्तर पर PTR 23 दर्ज किया गया है।
वर्ष 2025-26 के लिए ये सभी स्तरवार आंकड़े 2024-25 के समग्र आंकड़े 24 से कम हैं। सरकार के जवाब के अनुसार ये सभी आंकड़े राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 द्वारा तय मानकों के अनुकूल हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर PTR 30 से कम और सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित क्षेत्रों में 25 से कम रखने की सिफारिश करती है। चूंकि दोनों वर्षों में मापदंड अलग रहे हैं, इसलिए यह एक सटीक तुलना के बजाय सुधार की दिशा की ओर इशारा करता है।
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महाराष्ट्र सरकार जल्द ही स्विगी, जोमैटो, ज़ेप्टो और ब्लिंकिट जैसी फूड डिलीवरी और ई-कॉमर्स कंपनियों को राज्य के बाइक-टैक्सी नियमों के दायरे में लाने जा रही है। परिवहन विभाग द्वारा तैयार किए गए नए प्रस्ताव के तहत अब इन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को राज्य सरकार की नीतियों का पालन करना होगा। पढ़िए पूरी खबर…
