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स्कूल के अजीबोगरीब होमवर्क से त्रस्त हैं बच्चे, ‘मैकबेथ’ पर एक मॉड्यूल के तहत सुसाइड नोट लिखने को कहा गया

स्कूलों की ओर से बच्चों को इस तरह के प्रॉजेक्ट्स से जहां अभिभवकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है, वहीं इसका छात्रों को कोई फायदा नहीं होता।
Author नई दिल्ली | July 2, 2017 23:50 pm
सांकेतिक फोटो

छुट्टी के दिनों में और गृह कार्य के लिए स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले होमवर्क कई बार हास्यास्पद होने के साथ-साथ बच्चों पर एक तरह से बोझ भी हो गए हैं और पहली, दूसरी कक्षा के बच्चे को ऐसे होमवर्क दिए जा रहे हैं जो छठी, सातवीं, आठवीं कक्षा के बच्चों के लायक होते हैं।एक स्कूल में दूसरी कक्षा के बच्चे को अंकुरण (र्जिमनेशन) का र्विकंग मॉडल बनाकर लाने को कहा गया। इसी तरह, चौथी कक्षा की एक बच्ची को घड़ी का र्विकंग मॉडल बनाकर लाने को कहा गया जबकि तीसरी कक्षा के एक बच्चे को एमएस वर्ड पर स्वच्छ भारत अभियान का प्रारूप बनाकर लाने को कहा गया । एनसीइआरटी के पूर्व अध्यक्ष जेएस राजपूत ने कहा कि पिछले एक-दो दशक में देश के अनेक प्रदेशों में स्कूल का संस्थागत स्वरूप समाप्त होने की ओर बढ़ गया है।  स्कूल और कॉलेज बच्चों के नैर्सिगक विकास के केंद्र के रूप में विकसित नहीं हो पा रहे हैं। बच्चों में रचनात्मकता के विकास की बजाय कृत्रिमता थोपी जा रही है। इस प्रवृति में बदलाव लाना सबसे जरूरी है।

पिछले कई वर्षों में मई-जून की छुट्टियां बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए भयावह अनुभव बन जाता है। एक छात्र की मां ने बताया, ‘ बच्चों के होमवर्क के कारण हमारे पास किसी विशेषज्ञ की मदद लेने के बगैर कोई चारा नहीं होता। ऐसे होमवर्क के कारण बच्चों असर पड़ता है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने हाल ही में स्कूलों को परामर्श जारी करते हुए बच्चों पर बस्ते के बोझ को कम करने के साथ उन पर होमवर्क के भार को कम करने का सुझाव दिया गया था । कुछ ही दिन पहले एक रिपोर्ट आई थी कि ब्रिटेन के एक स्कूल में छात्र को बेहद अजीबोगरीब होमवर्क दिया गया। शेक्सपियर के दुखांत नाटक ‘मैकबेथ’ पर एक मॉड्यूल के तहत 60 से अधिक स्टूडेंट्स से होमवर्क के रूप में सुसाइड नोट लिखने को कहा गया। इससे भड़के रोष के बाद स्कूल को माफी मांगनी पड़ी ।स्कूलों की ओर से बच्चों को इस तरह के प्रॉजेक्ट्स से जहां अभिभवकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है, वहीं इसका छात्रों को कोई फायदा नहीं होता। शिक्षाविद के. श्रीनिवास का कहना है कि प्रॉजेक्ट्स देने का मतलब होता है कि छात्रों का विभिन्न विषयों को लेकर ज्ञान और समझ बढ़े लेकिन जिस तरह के प्रॉजेक्ट्स दिए जाते हैं, उससे बच्चों को कोई फायदा नहीं होता। ज्यादातर बच्चे प्रॉजेक्ट्स को बाहर से करवाते हैं। इस तरह के प्रोजेक्टस और होमवर्क देने के पीछे यह तर्क है कि इस तरह के होमवर्क से बच्चों को प्रोत्साहन मिलता है और उनकी रचनात्मकता बढ़ती है। लेकिन कुछ अभिभावकों का कहना है कि बच्चों का होमवर्क कराना एक कारोबार बन चुका है ।
अभिभावकों का कहना है किआम दिनों में भी में जब बच्चे जब स्कूल से घर पहुंचते हैं तो दिनभर भारी भरकम बस्ते को उठाकर थकान से बेहाल होते हैं। स्कूल में उन्हें काफी होमवर्क दिया होता है जिसे करवाना भी आसान नहीं होता है। ऐसे में शारीरिक एवं मानसिक परेशानी से जूझ रहे बच्चों का विकास कैसे हो पाएगा।

दिल्ली के स्कूल के एक शिक्षक का कहना है कि बच्चों के मानसिक विकास के लिए होमवर्क जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा देना सही नहीं है। इससे बच्चे मानसिक रूप से प्रभावित होना ही शुरू हो जाते हैं। बस्तों का भार भी जरूरत से ज्यादा न हो। होमवर्क से ज्यादा क्लास वर्क को प्रमुखता दी जानी चाहिए।बच्चों को मिलने वाली अजीबोगरीब होमवर्क की शृृंंखला में छठी कक्षा में पढ़ने वाली संस्कृति से गणित के फार्मूलों का शब्दकोष बनाने को कहा गया है तो दसवीं की छात्रा नंदनी को 20 पेज की साइंस मैगजीन डिजाइन करने को दिया गया। आठवीं कक्षा की एक छात्रा को थर्माकोल का एफलि टॉवर बनाने को कहा गया। अभिभावक कहते हैं कि ‘बच्चों को ऐसे प्रोजेक्ट दे देते हैं कि मां-बाप को पसीना आ जाए। सोचिए, एफलि टॉवर बच्चा कैसे बनाएगा और बना भी लेगा तो ए किस काम आएगा?’

 

 

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