जनसत्ता से खास बातचीत में नई दिल्ली ग्लोबल यूथ समिट (NDGYS) के संयोजक और सोशल हाउस लर्निंग के फाउंडर साहिल चोपड़ा ने कहा कि युवाओं को नेतृत्व सिखाने का सबसे प्रभावी तरीका उन्हें वास्तविक फैसले और जिम्मेदारियां देना है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था, सोशल मीडिया की लोकप्रियता, ‘Service Before Self’ और युवाओं में वास्तविक बदलाव की जरूरत पर खुलकर बात की।

आज की युवा पीढ़ी के पास अवसर पहले से कहीं ज्यादा हैं। लेकिन इसके साथ ही बढ़ती महत्वाकांक्षा, सोशल मीडिया का दबाव, ध्यान भटकने की समस्या और चिंता भी चर्चा के केंद्र में हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या युवाओं को वास्तव में नेतृत्व के लिए तैयार किया जा रहा है या उन्हें सिर्फ लीडरशिप की भाषा सिखाई जा रही है?

साहिल चोपड़ा मानते हैं कि नेतृत्व किसी क्लासरूम में पूरी तरह नहीं सीखा जा सकता। इसके लिए युवाओं को वास्तविक जिम्मेदारी, निर्णय लेने की आजादी और असफल होने का अवसर देना जरूरी है।NDGYS की कोर टीम में 80 फीसदी से ज्यादा युवा 13 से 22 वर्ष की उम्र के हैं। चोपड़ा के मुताबिक, जब किसी युवा को वास्तव में किसी समस्या को हल करने की जिम्मेदारी दी जाती है, तभी उसमें नेतृत्व की वास्तविक क्षमता विकसित होती है।

सवाल: आज के युवाओं को लीडरशिप की भाषा तो सिखाई जा रही है, लेकिन क्या उन्हें वास्तव में लीडर बनाया जा रहा है?

साहिल चोपड़ा: आज 15 साल का बच्चा तीन लीडरशिप फ्रेमवर्क बता सकता है और TED Talk लगभग शब्दशः सुना सकता है। लेकिन जब उसे पहली बार वास्तविक परिणाम वाले किसी फैसले की जिम्मेदारी दी जाती है, तो वह रुक सकता है।हमने नेतृत्व की भाषा सिखाने में बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन वास्तविक जिम्मेदारी देने में उतने अच्छे नहीं रहे।

NDGYS में हमने इसे बदलने की कोशिश की है। हमारी 80 फीसदी से ज्यादा कोर टीम 13 से 22 साल की है। वे सिर्फ किसी बड़े व्यक्ति के साथ काम नहीं कर रहे, बल्कि खुद जिम्मेदारी उठा रहे हैं।मैंने 17 साल की एक लड़की को रात 11 बजे एक मंत्री के कार्यालय से बात करके कार्यक्रम का स्लॉट बदलवाते देखा है। ऐसी परिस्थितियां किसी क्लासरूम में नहीं सिखाई जा सकतीं। वे अनुभव से आती हैं।

सवाल: NDGYS को आप सिर्फ एक समिट नहीं बल्कि ‘generation-long commitment’ कहते हैं। इसका असली लक्ष्य क्या है?

साहिल चोपड़ा: किसी इवेंट का बज़ करीब 72 घंटे रहता है। उसके बाद सवाल यह होता है कि लोगों ने वास्तव में क्या सीखा और क्या बदला।बड़े नाम लोगों को एक कमरे में ला सकते हैं, लेकिन विचार लंबे समय तक चलते हैं। NDGYS के चार आधार हैं – शिक्षा और स्किलिंग, दुनिया में भारत की भूमिका, संस्कृति एवं विरासत और ‘सर्विस बिफोर सेल्फ’। इसीलिए हमने सिर्फ दो दिन के समिट तक खुद को सीमित नहीं रखा। Founder Network, Ambassador Network और युवा संसद के जरिए हमने साल भर चलने वाला ढांचा बनाया है।

NDGYS 2026 में 3,000 से ज्यादा युवा शामिल हुए। लेकिन मेरे लिए असली सफलता यह संख्या नहीं है। असली सवाल यह है कि छह महीने या एक साल बाद वे क्या कर रहे हैं। जिसने Climate Policy पर बहस की थी, क्या वह उसी क्षेत्र में काम कर रहा है? जिसने कोई बिजनेस आइडिया पेश किया था, क्या उसने कंपनी शुरू की? यही असली स्कोरबोर्ड है।

सवाल: अगर शिक्षा व्यवस्था में सिर्फ एक बदलाव करने का मौका मिले तो आप क्या बदलेंगे?

साहिल चोपड़ा: हमारी शिक्षा व्यवस्था सोचने से ज्यादा याद रखने को पुरस्कृत करती है। अंक यह बताते हैं कि आपने जो पढ़ा, उसे कितनी अच्छी तरह दोहराया। लेकिन यह नहीं बताते कि जब आपके सामने ऐसी समस्या आए जिसका जवाब पहले से नहीं दिया गया है, तब आप क्या करेंगे।

मैं शिक्षा व्यवस्था में ‘mandatory, graded failure’ लाना चाहूंगा। छात्रों को वास्तविक प्रोजेक्ट, वास्तविक डेडलाइन और वास्तविक ऑडियंस दी जाए। उन्हें असफल होने दिया जाए और अंक सिर्फ परिणाम के लिए नहीं, बल्कि असफल होने के बाद अपनी रणनीति बदलने की क्षमता के लिए दिए जाएं।क्योंकि असल जिंदगी का पाठ यही है—पहली योजना हमेशा काम नहीं करती।

सवाल: सोशल मीडिया के दौर में क्या लोकप्रियता और नेतृत्व को अलग किया जा सकता है?

साहिल चोपड़ा: लोकप्रियता और नेतृत्व एक जैसे दिख सकते हैं, लेकिन दोनों बिल्कुल अलग हैं। लोकप्रियता आपको मिलने वाले ध्यान को दिखाती है। नेतृत्व उस जिम्मेदारी को दिखाता है जिसे आप तब भी उठाने को तैयार हैं जब कोई आपको देख नहीं रहा हो। इसीलिए NDGYS में ‘Service Before Self’ को हमने किसी अतिरिक्त गतिविधि की तरह नहीं, बल्कि शुरुआत के तौर पर रखा है।

Chabeel Seva जैसे कार्यक्रमों में युवा बिना कैमरे और बिना किसी सोशल मीडिया पुरस्कार के समुदाय के लिए काम करते हैं।हम प्रभाव के खिलाफ नहीं हैं। Influence सिर्फ amplification है। सवाल यह है कि आप किस चीज को amplify कर रहे हैं। पहले substance कमाइए, visibility उसके बाद आए।

सवाल: किसी 18 साल के युवा को अगर वास्तविक impact पैदा करना हो तो आप क्या सलाह देंगे?

साहिल चोपड़ा: किसी बड़े platform की तलाश बंद कीजिए। अपने स्कूल, सड़क या WhatsApp ग्रुप में कोई छोटा, स्पष्ट और अनग्लैमरस समस्या खोजिए और उसे ठीक कीजिए।उसे launch मत कीजिए। उसका ऐलान मत कीजिए। बस उसे पूरा कीजिए। Impact कोई personality trait नहीं है। यह एक muscle की तरह है। यह ambition से नहीं, repetition से मजबूत होती है। एक छोटा काम पूरा कीजिए और फिर दूसरा।

सवाल: शुरू करने की प्रेरणा कहां से मिली?

साहिल चोपड़ा: इसकी शुरुआत 16 साल के उस लड़के से हुई जो जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहता था, लेकिन उसे लगता था कि जिस कमरे में वह है, वह उसकी महत्वाकांक्षा के लिए बहुत छोटा है। वह लड़का मैं था।मुझे महसूस हुआ कि मेरे जैसे हजारों युवा हैं – कलाकार, कोडर, डिबेटर, ट्रेडर, संगीतकार और भविष्य के फाउंडर – जिनके पास कहने के लिए कुछ है, लेकिन उन्हें गंभीरता से सुनने वाला मंच नहीं है।

मैं ऐसा मंच बनाना चाहता था जहां एक Classical Dancer, स्टार्ट अप फाउंडर और पॉलिसी डिबेटर को बराबर गंभीरता से लिया जाए। यही सोच NDGYS की नींव बनी।और शुरुआत से मैंने एक बात तय की – युवाओं के लिए मंच बनाकर steering wheel अपने हाथ में नहीं रखूंगा। NDGYS की कोर टीम में 13 से 22 वर्ष के युवा बड़ी भूमिका निभाते हैं।

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