दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) के चुनाव में कांग्रेस ने अध्यक्ष पद पर अपने छात्र संगठन एनएसयूआई के नेता विजय शंकर मीणा को टिकट दिया है। विजय शंकर मीणा आदिवासी समुदाय से आते हैं।
विजय शंकर मीणा को अध्यक्ष पद पर टिकट दिए जाने की चर्चा दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में इसलिए हुई है क्योंकि पिछले कुछ सालों में आदिवासी समुदाय के किसी नेता को एनएसयूआई या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा समर्थित छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने टिकट नहीं दिया था।
एबीवीपी ने इस बार जाट समुदाय से आने वाले यश डबास को अध्यक्ष पद पर उम्मीदवार बनाया है। विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव के लिए मतदान 18 सितंबर को होगा।
विजय शंकर मीणा को टिकट दिया जाना क्यों अहम है?
जाट-गुर्जर समुदाय का वर्चस्व
पिछले 15 सालों में (2010-11 से) दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में जाट या गुर्जर समुदाय के छात्र ही अध्यक्ष पद पर जीत हासिल करते रहे हैं। 2018-19 में पूर्वांचल से आने वाले छात्र शक्ति सिंह डूसू के अध्यक्ष बने थे लेकिन इसके पीछे वजह एबीवीपी के टिकट पर जीते अंकिव बसोया का प्रवेश रद्द किया जाना था। शक्ति सिंह उस साल डूसू के उपाध्यक्ष पद पर चुनाव जीते थे लेकिन बसोया का प्रवेश रद्द होने के बाद उन्हें अध्यक्ष पद पर प्रमोट किया गया था।
| क्रम संख्या | अध्यक्ष | जाति |
|---|---|---|
| 2010–11 | जितेंद्र चौधरी (ABVP) | गुर्जर |
| 2011–12 | अजय छिकारा (NSUI) | जाट |
| 2012–13 | अरुण हुड्डा (NSUI) | जाट |
| 2013–14 | अमन अवाना (ABVP) | गुर्जर |
| 2014–15 | मोहित नागर (ABVP) | गुर्जर |
| 2015–16 | सतेंद्र अवाना (ABVP) | गुर्जर |
| 2016–17 | अमित तंवर (ABVP) | गुर्जर |
| 2017–18 | रॉकी तुसीद (NSUI) | जाट |
| 2018–19 | अंकिव बैसोया (ABVP) | गुर्जर |
| 2019–20 | अक्षत दहिया (ABVP) | जाट |
| 2020–21 | चुनाव रद्द | – |
| 2021–22 | कोई चुनाव नहीं | – |
| 2022–23 | कोई चुनाव नहीं | – |
| 2023–24 | तुषार डेढ़ा (ABVP) | गुर्जर |
| 2024–25 | रौनक खत्री (NSUI) | जाट |
| 2025–26 | आर्यन मान (ABVP) | जाट |
दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव को देशभर में काफी प्रतिष्ठित चुनाव माना जाता है। उत्तर भारत के ही नहीं, इससे बाहर के भी राज्यों के छात्र और छात्राएं यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए आते हैं। डूसू अध्यक्ष का चुनाव धनबल और बाहुबल के दम पर लड़ा जाता है और कांग्रेस, बीजेपी जैसे बड़े राजनीतिक दलों का इसमें सीधा दखल होता है।
कांग्रेस की सामाजिक न्याय की राजनीति
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पिछले कुछ सालों से लगातार सामाजिक न्याय की राजनीति की बात कर रहे हैं। राहुल का कहना है कि एससी-एसटी और ओबीसी समुदाय को उसकी आबादी के हिसाब से राजनीतिक हिस्सेदारी और भागीदारी दी जानी चाहिए और इसके लिए जरूरी है कि नगर पालिका, नगर निगम से लेकर विधानसभाओं और लोकसभा तक में इस समुदाय के लोगों को ज्यादा टिकट दिए जाएं। कांग्रेस ने अब इससे आगे बढ़कर डूसू के चुनाव में एसटी समुदाय को टिकट दिया है।
इसके साथ ही कांग्रेस ने जातीय जनगणना कराए जाने की मांग को भी प्रमुखता से उठाया था। कांग्रेस का कहना है कि जब तक जाति जनगणना नहीं होगी एसएसी-एसटी और ओबीसी वर्गों को सही मायने में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी नहीं मिल पाएगी।
दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पद पर जाट और गुर्जर समुदाय के छात्रों के दबदबे के बीच कांग्रेस ने आदिवासी समुदाय के छात्र को टिकट देकर कोशिश की है कि वह सामाजिक न्याय की राजनीति के फार्मूले को विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में भी लागू करेगी।
आदिवासी समुदाय को संदेश
विजय शंकर मीणा राजस्थान से आते हैं और कांग्रेस के लिए चुनावी लिहाज से राजस्थान एक महत्वपूर्ण प्रदेश है। राजनीति के जानकारों के मुताबिक, कांग्रेस ने आदिवासी समुदाय के साथ ही राजस्थान के छात्रों और कांग्रेस नेताओं के बीच यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह इस राज्य के युवाओं को राज्य के बाहर भी आगे बढ़ाना चाहती है। मीणा समुदाय राजस्थान की राजनीति में कुछ इलाकों में बेहद मजबूत है और देश में कई राज्यों में आदिवासी समुदाय की अच्छी-खासी मौजूदगी है।
कुल मिलाकर राहुल गांधी यह संदेश देना चाहते हैं कि पार्टी सामाजिक न्याय के फॉर्मूले पर तेजी से कदम आगे बढ़ाएगी और एससी-एसटी, ओबीसी समुदाय के लोगों के हक और हिस्सेदारी की बात सिर्फ मंच से ही नहीं होगी बल्कि इसे जमीन पर अमली जामा भी पहनाया जाएगा।
विजय शंकर मीणा कहते हैं कि वह बेहद साधारण परिवार से आते हैं और आम छात्रों की मुश्किलों को बहुत अच्छे ढंग से समझते हैं।
राष्ट्रवाद और छात्र हित प्रथम- एबीवीपी
दूसरी ओर, एबीवीपी का कहना है कि वह राष्ट्रवाद और छात्र हितों के मुद्दे पर राजनीति करती है और इसी वजह से डूसू सहित देश के कई विश्वविद्यालयों में लगातार जीत हासिल करती है। 2013-14 से अब तक डूसू चुनाव में अध्यक्ष के पद पर सिर्फ दो बार छोड़कर (2017–18 और 2024–25) एबीवीपी को ही जीत मिली है।
देखना होगा कि डूसू के चुनाव में कांग्रेस का यह ‘आदिवासी कार्ड’ एबीवीपी के लिए कोई चुनौती खड़ी कर पाएगा? अगर डूसू के चुनाव में विजय शंकर मीणा को जीत मिल जाती है तो कांग्रेस इसे इस तरह दिखा सकती है कि उसके सामाजिक न्याय के एजेंडे को युवाओं और विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं के बीच भी स्वीकार्यता मिलने लगी है।
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