नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) की कक्षा 8 की नई सोशल साइंस पाठ्यपुस्तक ‘Exploring Society: India and Beyond’ Part 2 को बिक्री से हटा लिया गया है। शिक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बुधवार को इसकी पुष्टि की। बताया गया कि यह किताब मंगलवार को बिक्री से वापस ली गई। दिल्ली स्थित एनसीईआरटी कैंपस के प्रकाशन विभाग के काउंटर पर सोमवार तक उपलब्ध यह पुस्तक बुधवार को बिक्री के लिए नहीं मिली।

क्या था विवाद?

इस नई किताब के अध्याय ‘The Role of the Judiciary in Our Society’ में न्यायपालिका की भूमिका के साथ-साथ उसकी चुनौतियों का भी उल्लेख किया गया था। इसमें “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” और “मुकदमों के भारी बैकलॉग” जैसे मुद्दों का जिक्र था।

पुस्तक में बताया गया था कि न्यायाधीश आचार संहिता से बंधे होते हैं और शिकायतों के निस्तारण के लिए CPGRAMS (Centralised Public Grievance Redress and Monitoring System) जैसी व्यवस्था मौजूद है। 2017 से 2021 के बीच 1,600 से अधिक शिकायतें मिलने का भी उल्लेख किया गया था। साथ ही, गंभीर आरोपों की स्थिति में संसद द्वारा महाभियोग प्रक्रिया के जरिए न्यायाधीश को हटाने का प्रावधान भी समझाया गया था।

Supreme Court of India के CJI Surya Kant की कड़ी प्रतिक्रिया

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) Surya Kant ने ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ वाले हिस्से पर गंभीर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “मैं किसी को भी संस्था को बदनाम करने की इजाजत नहीं दूंगा। मुझे पता है कि इससे कैसे निपटना है।”

सुप्रीम कोर्ट में यह मुद्दा वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने उठाया था। किताब के बारे में हुई सुनवाई के दौरान सिंहवी ने इसे “चयनात्मक प्रस्तुति” बताया, जबकि सिब्बल ने कहा कि “क्लास 8 के छात्रों को यह पढ़ाया जाना कि न्यायपालिका भ्रष्ट है, बेहद चिंताजनक है।”

CJI सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें इस विषय में कई संदेश मिले हैं और उन्होंने स्वतः संज्ञान लिया है।

पुराने पाठ्यक्रम में नहीं था भ्रष्टाचार का उल्लेख

कक्षा 8 की पुरानी राजनीतिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका की भूमिका, स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा, अदालतों की संरचना और न्याय तक पहुंच जैसे विषय शामिल थे, लेकिन भ्रष्टाचार का कोई जिक्र नहीं था।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

यह मामला शिक्षा सामग्री और संस्थाओं की छवि से जुड़ा है, जिससे स्कूली पाठ्यपुस्तकों में संवेदनशील विषयों की प्रस्तुति पर बहस तेज हो सकती है। इस किताब के चलते फिलहाल न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही बनाम उसकी गरिमा को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।