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सीमा कुमारी : हार्वर्ड में वजीफे के साथ दाखिला लेने वाली आदिवासी लड़की

सीमा के पिता सिकंदर महतो (44) ने सिर्फ दूसरी कक्षा तक और उनकी मां सरस्वती देवी (40) ने पहली कक्षा की ही पढ़ाई की है। सीमा गांव के ही सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ती थी। फिर वह एक स्वयंसेवी संगठन से जुड़ गई। उसी संस्था ने उसे पढ़ाना शुरू किया। युवा नामक उस संस्था में एनआइओएस के सिलेबस के आधार पर बच्चियों को पढ़ाया जाता है।

झारखंड के रांची के पास ओरमांझी ब्लॉक के दाहो गांव की आदिवासी बच्ची सीमा कुमारी को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने वजीफा देकर अपने यहां एडमिशन दिया है।

रांची से 28 किलोमीटर दूर ओरमांझी ब्लॉक के दाहो गांव की आदिवासी बच्ची सीमा कुमारी ने इतिहास रच दिया है। प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में उसे वजीफे के साथ दाखिला मिला है। वह वहां चार साल स्नातक की पढ़ाई करेगी। सीमा अभी बारहवीं की छात्रा है। वह नेशनल स्कूल ऑफ ओपन स्कूलिंग (एनआइओएस) से पढ़ाई कर रही है और परीक्षा का इंतजार कर रही है।

सीमा के पिता सिकंदर महतो (44) ने सिर्फ दूसरी कक्षा तक और उनकी मां सरस्वती देवी (40) ने पहली कक्षा की ही पढ़ाई की है। सीमा गांव के ही सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ती थी। फिर वह एक स्वयंसेवी संगठन से जुड़ गई। उसी संस्था ने उसे पढ़ाना शुरू किया। युवा नामक उस संस्था में एनआइओएस के सिलेबस के आधार पर बच्चियों को पढ़ाया जाता है। सीमा के मुताबिक, इस वजीफे के लिए पिछले साल ही आवेदन किया था। इसके बाद मेरा इंटरव्यू हुआ। इंटरव्यू में अब तक के कामकाज, पढ़ाई, संस्था में भूमिका, आने वाले समय में वह क्या करना चाहती है- जैसे सवाल पूछे गए। कई लेख लिखवाए गए। पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में भी पूछा गया।

सीमा ने हार्वर्ड के अलावा यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया, कोलंबिया और प्रिंस्टन के लिए भी फार्म भरा था। उनके परिवार वालों को यही समझ में आ सका है कि अमेरिका के किसी अच्छे कॉलेज में उसे दाखिला मिला है। सीमा कहती है, मेरे घर में इस बात को लेकर कोई खास खुशी या हलचल नहीं है। उन्होंने हार्वर्ड के बारे में कुछ नहीं सुना है।

सीमा के परिवार में उनके माता-पिता, बड़ा भाई, छह बहनें और दादी, चाचा और चाची एवं उनके चार बच्चे हैं। पिता पहले धागे की एक फैक्ट्री में काम करते थे। पूर्णबंदी में बंद होने के बाद वे एक बेकरी में मजदूरी करते हैं। वे महीने के सात हजार रुपए कमाते हैं। थोड़ी खेती है, जिसमें वे धान और सब्जियां उगाते हैं।
सीमा ने एक दफा अपने गांव की कई लड़कियों को फुटबॉल खेलते देखा। मां ने उसे भी खेलने की इजाजत दे दी। वह फुटबॉल शिविर एक स्वयंसेवी संगठन युवा ने लगाया था। वह उस संस्था से जुड़ गई। संस्था वालों ने उसे अंग्रेजी सिखाई और पढ़ाई का जिम्मा ले लिया। सीमा स्पेन जाकर फुटबॉल खेल आई है। सीमा के मुताबिक, उसके गांव के अन्य आदिवासी घरों की तरह उसके घर के लोग भी हंडिया (चावल से बनी स्थानीय शराब) बनाकर बेचते हैं। कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।

बहरहाल, सीमा की उपलब्धि पर अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने ट्वीट कर उन्होंने लिखा है कि लड़की को पढ़ाएं। वह दुनिया बदल सकती है। प्रेरणा देने वाली उपलब्धि। शानदार सीमा। सीमा कहती है कि यह बड़ी उपलब्धि है। इस बारे में सीमा ने बताया, मैंने इंस्टाग्राम और ट्विटर पर उनका पोस्ट देखा, पहले तो यकीन ही नहीं हुआ। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बधाई है। मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि उनकी उम्मीदों पर खरा उतरूं। मैं भारत लौटकर आना चाहती हूं। महिलाओं के सशक्तिकरण, विकास के लिए कुछ करने के साथ बच्चों-महिलाओं के लिए किताबें लिखना चाहती हूं। सीमा को बायोकॉम लिमिटेड की चेयरपर्सन किरण मजूमदार शॉ ने भी बधाई दी है।

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