आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे समय में एक व्यक्ति ने अपने संकल्प और आम लोगों के सहयोग से पर्यावरण संरक्षण की ऐसी मिसाल पेश की है, जो हर छात्र और युवा के लिए प्रेरणा बन सकती है।
यह कहानी है पीपल बाबा उर्फ स्वामी प्रेम परिवर्तन की, जिन्होंने पिछले लगभग पांच दशकों में ढाई करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाकर 2.70 लाख हेक्टेयर भूमि को फिर से हरा-भरा बना दिया। उनकी यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि इच्छा मजबूत हो तो साधारण लोग मिलकर असाधारण परिवर्तन ला सकते हैं।
आम लोगों की मदद से खड़ा हुआ हरित आंदोलन
पीपल बाबा बताते हैं कि उनके इस अभियान के पीछे किसी बड़े उद्योगपति या कॉर्पोरेट फंडिंग का हाथ नहीं था। उनकी ताकत बने देश के आम नागरिक, जिसमें ऑटो-रिक्शा चालक, टैक्सी ड्राइवर, डिलीवरी बॉय, बैंक कर्मचारी, शिक्षक, किसान, दुकानदार, सरकारी कर्मचारी और स्वयंसेवक शामिल रहे।
किसी ने 10 रुपये दिए, किसी ने पौधों को ढोने के लिए पुरानी साइकिल दान की, तो किसी ने रविवार का समय देकर पौधारोपण किया। यही छोटे-छोटे योगदान मिलकर एक विशाल पर्यावरणीय आंदोलन बन गए।
‘पीपल की छांव’ समझाती है पेड़ों का अर्थशास्त्र
अपनी चर्चित किताब ‘पीपल की छांव’ में पीपल बाबा ने पेड़ों की छाया का आर्थिक महत्व भी समझाया है। उनके अनुसार, सड़क किनारे लगा एक बड़ा पेड़ रेहड़ी-पटरी वालों के लिए मुफ्त कार्यस्थल जैसा होता है। यदि किसी विक्रेता को रोजाना 200 रुपये किराया देना पड़े, तो सालभर में लगभग 72,000 रुपये खर्च होंगे। लेकिन एक पेड़ की छांव उसे यह सुविधा मुफ्त में देती है।
यह उदाहरण छात्रों को सिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति बचाने का नहीं, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का भी माध्यम है।
कचरे को बनाया जंगल उगाने का साधन
पीपल बाबा ने प्राकृतिक संसाधनों का बेहतरीन उपयोग किया, जिसमें लोगों द्वारा दान में मिली गायों के गोबर, कृषि अपशिष्ट, रसोई कचरे और बगीचे के जैविक कचरे को वैज्ञानिक तरीके से खाद में बदलकर उन्होंने बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया। इससे यह संदेश मिलता है कि कचरा भी सही उपयोग से प्रकृति का संसाधन बन सकता है।
नानी से मिला जंगलों से प्रेम
पीपल बाबा का बचपन उत्तराखंड के जंगलों कॉर्बेट, राजाजी, हरिद्वार, ऋषिकेश, टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल और अल्मोड़ा के बीच बीता और यहीं से उन्हें प्रकृति से जुड़ाव मिला। बाद में हिमाचल प्रदेश के डलहौजी स्थित कैंब्रियन हॉल स्कूल में उनकी पढ़ाई हुई। बचपन के इन्हीं अनुभवों ने उन्हें जीवनभर पर्यावरण संरक्षण के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी।
छात्रों के लिए बड़ा संदेश
पीपल बाबा का मानना है कि पर्यावरणीय बदलाव केवल सरकारों या बड़ी संस्थाओं से नहीं आता, बल्कि सामान्य नागरिकों के छोटे-छोटे प्रयासों से शुरू होता है।
छात्र क्या सीख सकते हैं?
हर वर्ष कम से कम एक पौधा लगाएं और स्कूल-कॉलेज में वृक्षारोपण अभियान चलाएं। प्लास्टिक का कम इस्तेमाल करें और जैविक कचरे से खाद बनाना सीखें। इसके अलावा छात्र दूसरों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करें।
