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हिंदी, बॉलीवुड और बाजार…

14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया और वर्ष 1953 से हिंदी दिवस मनाने की शुरुआत हुई। देश को मिली नई नई आजादी और राष्ट्रभावना के तहत हिंदी को खूब समर्थन मिला लेकिन 80 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर 21वीं सदी के पहले दशक यानि कि 2010 का एक दौर वह भी था जब देश में हिंदी भाषा के प्रसार में ठहराव सा आ गया था।

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615 मिलियन लोगों के द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली ‘हिंदी’ विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। अंग्रेजी और मैंडरिन का स्थान क्रमशः पहला और दूसरा है। दुनिया भर में एक ओर जहां तमाम भाषाएं विलुप्त हो रही हैं और उनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए अनेक कदम उठाने की जरूरत पड़ रही है वहीं हिंदी का प्रसार दिन दूनी रात चौगुनी गति से हो रहा है। लेकिन ऐसा हमेशा से ही नहीं था। आजादी के पहले व बाद में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर प्रयास किए जाते रहे। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, पं. मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन, काका कालेलकर, सेठ गोविंदनाथ आदि का नाम जहां व्यक्तिगत प्रयास करने वालों की सूची में शीर्ष पर रखा जाता है। वहीं ब्रह्म समाज, आर्य समाज, सनातन धर्म सभा, प्रार्थना सभा, थियोसॉफिकल सोसायटी, भारतेंदु मंडल, नागरी प्रचारिणी सभा (काशी), हिंदी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग), दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (मद्रास), राष्ट्रभाषा प्रचार समिति (वर्धा) आदि ने संस्थागत तौर पर हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया और वर्ष 1953 से हिंदी दिवस मनाने की शुरुआत हुई। देश को मिली नई नई आजादी और राष्ट्रभावना के तहत हिंदी को खूब समर्थन मिला लेकिन 80 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर 21वीं सदी के पहले दशक यानि कि 2010 का एक दौर वह भी था जब देश में हिंदी भाषा के प्रसार में ठहराव सा आ गया था। भाषा के शुभचिंतकों को ऐसा महसूस होने लगा कि हिंदी की बजाए देश में अंग्रेजी को ज्यादा तवज्जो मिल रही है। हालांकि इसका प्रमुख कारण हिंदी को आम बोलचाल की भाषा की बजाए साहित्यिक और भारी भरकम शब्दावलियों को लेकर कट्टरता की भावना अधिक रही। जब हिंग्लिश भाषा महानगरों से निकल कर छोटे छोटे शहरों तक अपनी पैठ बनाने लगी तब हिंदी के झंडाबरदार इसे अंग्रेजी का संक्रमण मान और अधिक हठधर्मिता दिखाते हुए भारी भरकम शब्दों के प्रयोग को जारी रखा। नतीजा बड़े बड़े अखबार, साहित्यिक पत्रिकाएं आदि अपनी लोकप्रियता खोने लगीं और बंद होने लगीं। हिंदी सिर्फ संगोष्ठियों और सभागारों तक सिमटने लगी। फिर इसका ठीकरा 90 के दशक के सुधारों और वैश्विकरण के सिर पर ठीकरा फोड़ा जाने लगा और एक नई शब्दावली ‘एमटीवी कल्चर’ गढ़ी गई। यह शब्दावली आधुनिकता पसंद किशोरों और युवाओं को लजाने और शर्म कराने के लिए इस्तेमाल की जाने लगी।

लेकिन वैश्विकरण जिसे हिंदी सहित अन्य भाषाओं को निगल जाने वाला दानव साबित करने की होड़ मची थी उसी वैश्विकरण ने कम्प्यूटर, इंटरनेट, सैटेलाइट टीवी चैनलों आदि का उपहार दिया। यह उपहार हिंदी के लिए वरदान साबित हुआ। वैश्विकरण ने बाजार और बाजार ने उपभोक्ता संतुष्टि प्रथम के सिद्धांत से परिचय कराया। कहते हैं कि बाजार में ही भाषा के रूप बनते और बिगड़ते हैं और कालांतर में स्थायी हो पाते हैं। बाजार चाहता है कि उसका माल बिके, सात समुंदर पार बिके। माल बाज़ार में बिकेगा तो उत्पादन बढ़ेगा। इस भूमंडलीकृत उपभोक्ता व्यवस्था के तहत एक ओर यदि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, सेवाओं तथा संसाधनों के मुक्त आदान.प्रदान की छूट मिली है तो दूसरी ओर देश की भाषा के विकास का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है। अब यह संबंधित भाषा पर निर्भर है कि वह किस प्रकार इन नई चुनौतियों का सामना करती है। जो भाषा जितनी उदार होगी और समय के साथ.साथ बदलती चली जाएगी वह उतनी ही लोकप्रिय होगी। उसकी जीवन क्षमता उतनी ही अधिक होगी। आज किसी भी देशी.विदेशी कंपनी को अपना कोई उत्पाद बाज़ार में उतारना है, तो उसकी पहली नजर हिन्दी क्षेत्र पर पड़ती है। इन्हें बखूबी पता है कि हिन्दी आम जन के साथ.साथ उपभोक्ता की भी भाषा है। परिणामस्वरूप धीरे.धीरे हिन्दी वैश्विक अथवा ग्लोबल बनती जा रही है। विश्व बाज़ार में हिन्दी यदि बिकती है और यदि उसके प्रयोक्ता है तो भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी का भविष्य काफी उजवल प्रतीत होता है। इस मूलमंत्र के तहत देशी और विदेशी सैटेलाइट टीवी चैनलों ने हिंदी और भारतीयता से ओतप्रोत कार्यक्रमों आदि का निर्माण और प्रसारण शुरु कर दिया।

इस दौरान भारतीय फिल्मों ने भी दुनियाभर में अपनी सृजनात्मकता का डंका बजाया। बाजार के कारण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की पहुंच असीमित निवेश और अत्याधुनिक तकनीकि तक हुई। लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि वे प्रांत और क्षेत्र जो हिंदी के प्रति दोयम भाव रखते थे वहां भी इसे खूब प्रशंसक मिले। लोकप्रियता और यहां मिलने वाले अथाह पैसे ने गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों के अभिनेताओं-अभिनेत्रियों को भी अपने से जोड़ा और इस प्रकार उनके प्रशंसकों तक जुड़ाव और हिंदी के फैलाव का मौका मिला। आश्चर्य नहीं कि गैर हिंदी भाषी राज्य बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के दर्शक भी शाहरुख खान और सलमान खान के भी उतने ही बड़े प्रशंसक हैं जितने कि दिल्ली, पंजाब और अन्य उत्तर भारतीय प्रदेशों के दर्शक। इसी प्रकार रजनीकांत, नागार्जुन और महेश बाबू अब उत्तर भारत में भी खासे लोकप्रिय हैं।

आश्चर्य नहीं कि वर्ष 2011 में मध्यप्रदेश में ड्रामा स्कूल के उद्घाटन के दौरान पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को भी हिंदी के प्रचार प्रसार में बॉलीवुड के योगदान की सराहना करनी पड़ी। उन्होंने कहा था कि बंटवारे के दौरान जब वह भारत आए तब उन्हें सिर्फ अंग्रजी और सिंधी भाषा ही आती थी लेकिन भारतीय फिल्मों के प्रशंसक होने के कारण उन्हें हिंदी समझने में परेशानी नहीं हुई। फिल्मों के कारण ही उन्हें हिंदी भाषा न केवल बोलना आया बल्कि बाद में वे लोकप्रिय वक्ता भी हुए। इसी प्रकार राजकपूर की फिल्मों ने हिंदी को परदेश में भी लोकप्रियता दिलाई। रूस तक उन्हें चाहने वालों की लंबी फेहरिस्त रही है। यह भी गौर करने की बात है कि जब भारत और चीन की सेनाएं डोकलाम में आमने सामने थी और युद्ध की सी स्थिति बनी हुई थी, उस समय आमिर खान की फिल्म दंगल चीन में कमाई और लोकप्रियता के नए आयाम छू रही थी।

इंटरनेट, स्मार्टफोन, गूगल की हिंदी सेवा व लगभग सभी वेबसाइटों व ऐप के हिंदी संस्करण ने भी हिंदी को खूब लोकप्रियता दिलायी है। वैश्विक बाजार में भारत की मजबूत स्थिति ने विदेशों में और विदेशियों से भी हिंदी को उचित आदर और सम्मान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस प्रकार यह कहना अनुचित नहीं कि आधुनिक समय में हिंदी के प्रचार प्रसार में बाजार व बॉलिवुड की अहम भूमिका रही है और हमें उसे इसका श्रेय देना ही चाहिए।

लेखक ‘अविनाश चंद्र’ हिंदी वेबपोर्टल ‘azadi.me’ तथा शिक्षा पर आधारित त्रैमासिक पत्रिका ‘नीसा नमस्‍कार (NISA Namaskar)’ के सम्‍पादक हैं। मीडिया के क्षेत्र में इन्‍हें 12वर्ष से अधिक का अनुभव है तथा वर्तमान में यह सेंटर फॉर सिविल सोसॉयटी (CCS) के पॉलिसी एक्‍सपर्ट हैं।

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