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Engineer’s Day 2020: यूनिवर्सिटी, बैंक से लेकर फैक्ट्री तक बनाने में योगदान है इनका, इसलिए आज के दिन मनाते हैं इंजीनियर्स डे

Engineer's Day 2020: सन् 1955 में एम. विश्वेश्वरैया को भारत रत्न प्रदान किया गया। उनके द्वारा किए गए असाधारण कार्यों में कृष्णराज सागर बांध का निर्माण, भद्रावती आइरन ऐंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑइल ऐंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत कई संस्थान की स्थापना अहम हैं।

engineers day importance, engineers day historyयह दिन प्रख्यात इंजीनियर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के इंजीनियरिंग की दुनिया में सराहनीय योगदान को याद करने के लिए मनाया जाता है।

Engineer’s Day 2020: आज 15 सितंबर को देशभर में इंजीनियर दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन प्रख्यात इंजीनियर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के इंजीनियरिंग की दुनिया में सराहनीय योगदान को याद करने के लिए मनाया जाता है। मोक्षगुंडम का जन्म 15 सितंबर, 1861 को कर्नाटक के मुड्डनहल्ली नामक गाँव में हुआ था। उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ आर्ट्स (बीए) की पढ़ाई की थी और पुणे में कॉलेज ऑफ साइंस में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।विश्वेश्वरैया का करियर बॉम्बे सरकार के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता के रूप में शुरू हुआ। बाद में वह मुख्य अभियंता के रूप में मैसूर सेवा में शामिल हो गए और उन्होंने हैदराबाद, मैसूर, महाराष्ट्र और ओडिशा में कई तकनीकी परियोजनाओं में योगदान दिया।

सन् 1955 में एम. विश्वेश्वरैया को भारत रत्न प्रदान किया गया। उनके द्वारा किए गए असाधारण कार्यों में कृष्णराज सागर बांध का निर्माण, भद्रावती आइरन ऐंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑइल ऐंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत कई संस्थान की स्थापना अहम हैं।

सर विश्वेश्वरैया ने 102 वर्षों का जीवन पाया। और अंत तक सक्रिय जीवन ही जीते रहे। उनसे जुड़ा एक किस्सा काफी मशहूर है कि एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, ‘आपके दीर्घायु का रहस्य क्या है?’ तब डॉ. विश्वेश्वरैया ने उत्तर दिया, ‘जब बुढ़ापा मेरा दरवाज़ा खटखटाता है तो मैं भीतर से जवाब देता हूं कि विश्वेश्वरैया घर पर नहीं है और वह निराश होकर लौट जाता है। बुढ़ापे से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पाती तो वह मुझ पर हावी कैसे हो सकता है?’

इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स इंडिया (IEI) के अनुसार, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उनके योगदान के अलावा, उन्हें “भारत में आर्थिक नियोजन का अग्रदूत” भी कहा जाता था। उनकी किताबें, “भारत का पुनर्निर्माण” और “भारत की योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था” क्रमशः 1920 और 1934 में प्रकाशित हुईं। उन्हें मैसूर के दीवान के रूप में सेवा करते हुए 1915 में नाइट से सम्मानित किया गया, और 1955 में उन्‍होनें भारत रत्न प्राप्त किया।

 

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