जब कारगिल में गोलाबारी की आवाज रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी, तब मोहम्मद मुस्तफा कमाल स्कूल में पढ़ते थे और अपनी पढ़ाई जारी रखने की कोशिश कर रहे थे। कई साल बाद, 41 साल के यह टीचर उसी सीमावर्ती इलाके में बच्चों की पढ़ाई को ज्यादा दिलचस्प बनाने के लिए सेना के छोड़े गए बंकरों को लैब के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं और क्लासरूम को नकली संसद में बदल रहे हैं।
कारगिल के पास वाखा गांव के स्कूल टीचर मुस्तफा ‘नेशनल टीचर्स अवॉर्ड 2026’ के लिए चुने गए लोगों में शामिल हैं। उन्हें आज नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से यह अवॉर्ड मिलेगा।
उनकी अपनी स्कूली शिक्षा संघर्ष, विस्थापन और अनिश्चितता के माहौल में गुजरी। लेकिन इन अनुभवों ने आगे चलकर उनके पढ़ाने के तरीके को प्रभावित किया। एक ऐसा तरीका जो शिक्षा को सिर्फ किताबों तक सीमित न रखकर उसे छात्रों के आस-पास की दुनिया से जोड़ने की कोशिश करता है।
मुस्तफा ने 2021 से 2026 तक ‘गवर्नमेंट मॉडल मिडिल स्कूल ग्रोंग पाशकुम’ में कक्षा 6 से 8 के छात्रों को पढ़ाया। स्कूल परिसर में सेना के कुछ पुराने बंकर थे, जिन्हें कारगिल युद्ध के दौरान रक्षा बलों ने बनाया था।
उन्होंने कहा, “आमतौर पर बंकर खड़े (वर्टिकल) होते हैं, लेकिन वहां जो बंकर थे, वे असल में लेटे हुए (हॉरिजॉन्टल) रेत के बंकर थे और गुफा जैसे दिखते थे। मेरे मन में एक विचार आया, क्यों न इन खाली बंकरों को लैब में बदल दिया जाए।” मुस्तफा ने एक बंकर को प्रागैतिहासिक काल की लैब में बदल दिया और छात्रों को वहां ले जाना शुरू किया, ताकि वे समझ सकें कि पुराने समय में लोग गुफाओं में कैसे रहते थे और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी कैसी होती थी।
जल्द ही उन्होंने देखा कि छात्रों की भागीदारी बढ़ गई और वे विषय को रटने के बजाय उसमें दिलचस्पी लेने लगे। मुस्तफा ने कहा, “मैं एनईपी के ‘अनुभव-आधारित सीखने’ वाले हिस्से को असलियत में लाना चाहता था।”
क्लासरूम को संसद जैसा बनाना
छात्रों को नागरिक शास्त्र पढ़ाने के लिए मुस्तफा ने क्लासरूम में बैठने की व्यवस्था को संसद जैसा बना दिया। छात्रों को दो पार्टियों सत्ता पक्ष और विपक्ष में बांटा गया, जबकि वे खुद स्पीकर की भूमिका में थे। उनकी कक्षाओं में छात्रों को समकालीन मुद्दों पर बहस करने के लिए एक मंच दिया गया, जिसके माध्यम से उन्होंने समझा कि राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र कैसे कार्य करता है।
उन्होंने ‘ग्रेट बाथ लूडो’ और अन्य एजुकेशनल गेम्स भी शुरू किए। इनके जरिये वे स्टूडेंट्स का मूल्यांकन करते थे और अपने पढ़ाने के तरीके में बिना तनाव वाली परीक्षा का कॉन्सेप्ट लागू करते थे।
मुस्तफा ने छात्रों से प्राचीन इतिहास की झलक पाने के लिए विभिन्न प्रकार के पत्थरों और पुराने बर्तनों का अवलोकन करने को भी कहा। छात्रों ने पुराने बर्तनों की खोज शुरू की और उन्हें चर्चा के लिए मुस्तफा के सामने प्रस्तुत किया। जल्द ही ये प्राचीन बर्तन और मटके कक्षा के कोनों की शोभा बढ़ाने लगे, जो इतिहास में माध्यमिक विद्यालय के छात्रों की बढ़ती रुचि को दर्शाते हैं। छात्रों का प्रदर्शन बेहतर होने लगा और सामाजिक विज्ञान को एक उबाऊ विषय मानने की धारणा को बदलने की मुस्तफा की इच्छा और भी बढ़ गई।
दो छात्रों के साथ हुई मुलाकात का मुस्तफा ने किया जिक्र
मुस्तफा ने अपने छात्रों के साथ हुई दो मुलाकातों को याद किया जो उनके दिल के बेहद करीब हैं। उन्होंने कहा कि जब वे एक शिक्षक के तौर पर अपने सफर को याद करते हैं, तो ये पल उन्हें हिम्मत और शुक्रगुजारी का एहसास दिलाते हैं।
पहला वाकया तब हुआ जब मिडिल स्कूल के एक छात्र ने इतिहास को प्रैक्टिकल विषय बताया। यह शब्द आमतौर पर विज्ञान और कॉमर्स जैसे विषयों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मुस्तफा के लिए यह बात बहुत मायने रखती थी। कई मायनों में, यह इस बात का सबूत था कि वे अपना मकसद पूरा कर चुके थे, छात्रों को यह दिखाना कि इतिहास को सिर्फ रटा नहीं जा सकता, बल्कि इसे महसूस भी किया जा सकता है।
उन्होंने याद करते हुए कहा, “यह पहली बार था जब मेरे विषय को ‘प्रैक्टिकल’ कहा गया और वह भी मिडिल स्कूल के एक छात्र द्वारा। इससे पता चला कि छात्र इस विषय को किस नजरिये से देखने लगे थे।”
दूसरी घटना बंकर से बनी लैब के अंदर घटी। जब मुस्तफा एक क्लास को पढ़ा रहे थे, तभी हाल ही में दाखिला लेने वाला एक बच्चा उत्साह से उनके पास दौड़ता हुआ आया और अपने हाथों में एक प्याले के आकार का पत्थर पकड़े हुए था। बच्चे ने उन्हें बताया कि उसने एक अनोखा पत्थर खोजा है। उन्होंने कहा, “वह पत्थर आज भी मेरे घर में है। यह इस बात की एक अनमोल स्मृति है कि उनके जैसा युवा छात्र कितना जिज्ञासु हो सकता है।”
मुस्तफा ने अपने पिता का शुक्रिया अदा किया
मुस्तफा ने अपने पिता, हाजी मोहम्मद अली का शुक्रिया अदा किया। जब मुस्तफ़ा श्रीनगर में अपनी आगे की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनके पिता ही परिवार का खर्च उठाने वाले अकेले व्यक्ति थे। उन्होंने कहा कि आज वे जो कुछ भी हैं, वह उनके पिता की मेहनत और त्याग की वजह से ही है।
कमल ने बताया कि जब उन्होंने कॉलेज में दाखिला लिया, तब तक उनके पिता हैंडलूम डिपार्टमेंट से रिटायर हो चुके थे। उस समय, मुस्तफा और उनकी तीन बड़ी बहनों और एक छोटी बहन के परिवार के लिए उनके पिता की पेंशन ही कमाई का एकमात्र जरिया थी। हालांकि, उनके पिता ने परिवार को कभी भी आर्थिक तंगी का बोझ महसूस नहीं होने दिया, लेकिन मुस्तफा को पता था कि उनके पिता कितना दबाव झेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसी बात ने उन्हें अपनी पढ़ाई को पूरी लगन से करने के लिए और भी ज्यादा प्रेरित किया। लेकिन एक सपना ऐसा भी था जिसे उन्होंने धीरे-धीरे छोड़ दिया।
मैं हमेशा क्रिकेट खिलाड़ी बनना चाहता था- कमल
कमल ने कहा, “शिक्षा क्षेत्र में आने से पहले, मैं हमेशा क्रिकेट खिलाड़ी बनना चाहता था। जब मैं श्रीनगर गया, तो मैंने लड़कों को नेट पर प्रैक्टिस करते देखा। मैंने पूछा कि क्या मैं उनके साथ प्रैक्टिस कर सकता हूं, लेकिन मुझे बताया गया कि वे उन अकादमियों में नामांकित हैं जो बहुत अधिक फीस लेती हैं। मुझे पता था कि मेरे पिता इसे वहन नहीं कर पाएंगे, इसलिए मैंने उन्हें खेल के प्रति अपने जुनून के बारे में कभी नहीं बताया।”
उन्होंने कहा कि क्रिकेट छोड़ना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं को पढ़ाई और बाद में टीचिंग की ओर मोड़ा। इस तरह उन्होंने एक ऐसा करियर बनाया जिससे वे दूसरे बच्चों को वे मौके दे सकें, जिनकी चाहत उन्हें खुद कभी हुआ करती थी।
सोनम वांगचुक से मुलाकात ने कैसे राज्य पुरस्कार दिलाया
मुस्तफा ने 2016 में एक शपथ ग्रहण समारोह के दौरान लद्दाख के शिक्षाविद सोनम वांगचुक से अपनी मुलाकात को याद किया। यहां पर उन्होंने ‘पायलट प्रोजेक्ट’ का शुभारंभ किया था। उन्होंने शिक्षा विभाग के समान सोच वाले शिक्षकों के संगठन, ‘लद्दाख टीचर्स एसोसिएशन’ के अध्यक्ष के तौर पर 10 साल तक काम किया। संगठन ने लद्दाख के दूर-दराज इलाकों के स्कूलों का दौरा करने और उनकी मुख्य चुनौतियों को हल करने के लिए एक खास शिक्षा व्यवस्था लागू करने की पहल की।
पायलट प्रोजेक्ट के तहत, संगठन को शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार देखने के लिए दो साल तक स्कूल चलाने थे। जब मुस्तफ़ा ने वांगचुक के सामने अपना आइडिया रखा, तो उन्होंने कहा कि यह उनके लिए कोई नई बात नहीं है। मुस्तफा ने वांगचुक के हवाले से कहा, “यह ऐसी चीज है जो हर सरकारी दस्तावेज में होती है, यह मेरे लिए नई नहीं है। लेकिन यह पहली बार है जब मैं जमीनी स्तर से ऊपर की ओर बढ़ने का तरीका देख रहा हूं।”
वांगचुक ने बड़े-बड़े प्रस्तावों के बजाय छोटे, व्यावहारिक परियोजनाओं के महत्व पर जोर दिया, जो सुनने में तो शानदार लगते हैं लेकिन लागू करने में मुश्किल होते हैं। उन्होंने लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद से इस पहल का समर्थन करने का आग्रह किया।
परिषद ने इस आइडिया को मंजूरी दे दी और संगठन ने लद्दाख के दो मिडिल स्कूलों पर काम किया। इसमें काफी सुधार देखने को मिला। करगिल स्कूल ने दो राष्ट्रीय पुरस्कार जीते, जबकि मुस्तफा को गवर्नमेंट मिडिल स्कूल लैंगकारचे थांग में उनके काम के लिए टीचिंग और एकेडमिक्स के क्षेत्र में ‘लद्दाख स्टेट अवॉर्ड 2021’ मिला।
मुस्तफा ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षकों और शिक्षाविदों को प्रैक्टिकल अनुभव दिया जाए और उन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सही समझ हो। उनका मानना है कि आज तेजी से बदलते तकनीक के दौर में शिक्षकों को छात्रों से ज्यादा इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि मॉडर्न टेक्नोलॉजी और एआई टूल्स का सही और नैतिक इस्तेमाल कैसे किया जाए।
मुस्तफा ने शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम विकास और एनसीईआरटी से संबंधित शैक्षणिक कार्यों में भी योगदान दिया है। उन्होंने कारगिल के ग्रामीण सरकारी स्कूलों को मजबूत करने के लिए स्थानीय समुदायों और स्कूल प्रबंधन समितियों के साथ मिलकर काम किया है।
भारत सरकार का आभार व्यक्त किया
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के बारे में बात करते हुए, मुस्तफा ने इस सम्मान के लिए भारत सरकार का आभार व्यक्त किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इस सम्मान ने उन पर एक बड़ी जिम्मेदारी भी डाल दी है। उन्होंने कहा, “इस पुरस्कार ने देश के लिए आत्मविश्वास से भरे छात्र तैयार करने की मेरी जिम्मेदारी को दोगुना कर दिया है।” उन्होंने आगे कहा कि इस सम्मान ने शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने के उनके संकल्प को और मजबूत किया है।
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