जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, चार भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) और बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान(बीआइटीएस), पिलानी विभिन्न विषयों के मामले में विश्व के शीर्ष 50 संस्थानों में शामिल हैं। ‘क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग’ ने बुधवार को यह घोषणा की। इस संस्करण में आइआइटी-दिल्ली ने किसी एक संस्थान के तौर पर सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया है। इसने छह विषयों में शीर्ष 50 में जगह बनाई है, चार विषयों में भारत में अग्रणी स्थान हासिल किया है।

विश्वविद्यालय रैंकिंग के लिए प्रसिद्ध लंदन स्थित ‘क्यूएस क्वाक्वेरेली साइमंड्स’ ने विषयवार विश्वविद्यालयों की रैंकिंग का 16वां वार्षिक संस्करण प्रकाशित किया है। यह रैंकिंग 100 से अधिक देशों के 1,900 विश्वविद्यालयों में 21,000 से अधिक शैक्षणिक कार्यक्रमों का मूल्यांकन करती है, जिसमें 55 विषय और पांच व्यापक संकाय क्षेत्र शामिल हैं। रैंकिंग के अनुसार भारत ने विभिन्न विषयों और व्यापक संकाय क्षेत्रों में शीर्ष 50 स्थानों में 27 स्थान हासिल किए हैं, जो 2024 में दर्ज किए गए 12 स्थानों की तुलना में दोगुने से भी अधिक हैं।

भारत की क्या है स्थिति?

ये स्थान 12 संस्थानों द्वारा प्राप्त किए गए हैं। इसके मुताबिक धनबाद स्थित भारतीय खनन विद्यापीठ विश्वविद्यालय ने खनिज एवं खनन अभियांत्रिकी अध्ययन में वैश्विक स्तर पर 21वां स्थान प्राप्त किया है जबकि आइआइएम-अहमदाबाद विश्व के शीर्ष 50 संस्थानों में शामिल है। शीर्ष 50 में आइआइटी-बाम्बे, आइआइटी-खड़गपुर और आइआइटी-मद्रास के अलावा जेएनयू और बीआइटीएस पिलानी शामिल हैं।

‘क्यूएस क्वाक्वेरेली साइमंड्स’ की मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेसिका टर्नर ने कहा कि इस वर्ष भारत की प्रगति केवल पैमाने के बारे में नहीं बल्कि यह गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में गति को भी दर्शाती है। क्यूएस रैंकिंग के अनुसार आइआइटी-दिल्ली ने केमिकल इंजीनियरिंग में 48वां स्थान, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रानिक इंजीनियरिंग में 36वां स्थान, मैकेनिकल, एअरोआटिकल और मैन्युफैक्चरिंग इंजीनियरिंग में 44वां स्थान, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में 36वां स्थान और कंप्यूटर विज्ञान में 45वां स्थान प्राप्त किया है।

भारत में अब 55 विषयों में 99 विश्वविद्यालय शामिल हैं, जिनकी संख्या पिछले वर्ष 79 थीं। 20 संस्थान पहली बार इस सूची में शामिल हुए हैं। कुल मिलाकर, भारतीय विश्वविद्यालय रैंकिंग में 599 बार शामिल हुई हैं, जो 2025 की तुलना में 12 फीसद अधिक है और पांच वर्ष पहले की तुलना में यह संख्या दोगुनी से भी अधिक है। इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी और प्रबंधन के क्षेत्रों में सुधार का व्यापक दायरा एक ऐसे तंत्र का संकेत देता है, जो एक निश्चित उद्देश्य के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है। एजुकेशन से जुड़ी दूसरी खबरों के लिए जनसत्ता के इस पेज का रुख करें