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बस्ते के बोझ से स्कूली बच्चों में बढ़ा पीठ का दर्द

भारतीय बाल्य चिकित्सा पत्रिका में प्रकाशित अध्ययनों के मुताबिक स्कूल जाने वाले 43 फीसद बच्चे भारी बस्ते के चलते पीठ के निचले हिस्से में दर्द से पीड़ित हैं।

Author Published on: March 28, 2017 3:56 AM
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भारतीय बाल्य चिकित्सा पत्रिका में प्रकाशित अध्ययनों के मुताबिक स्कूल जाने वाले 43 फीसद बच्चे भारी बस्ते के चलते पीठ के निचले हिस्से में दर्द से पीड़ित हैं। मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने प्रारंभिक बाल शिक्षा के लिए किसी पाठ्यपुस्तक की सिफारिश नहीं की है। इसने कक्षा एक और दो के लिए सिर्फ दो पुस्तकें(भाषा और गणित) और कक्षा तीन से पांच तक के लिए तीन पुस्तकों (भाषा, पर्यावरण अध्ययन और गणित) की सिफारिश की है। मंत्री ने कहा कि प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल के बच्चों की एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तकों की संख्या और आकार उनकी आयु के अनुसार है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने भी खुद से संबद्ध स्कूलों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि दूसरी कक्षा तक बच्चे बस्ता लेकर न आएं।

निजी प्रकाशकों की पाठ्यपुस्तकों का मूल्यांकन करने की कोई पद्धति नहीं
स्कूलों में निर्धारित पाठ्य पुस्तकों की विषय वस्तु की जांच की जरूरत पर चर्चा के बीच मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने निजी प्रकाशकों की पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने में अपनी अक्षमता जाहिर की है। मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि निजी प्रकाशकों की पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने के लिए कोई तंत्र नहीं है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के पास खुद से संबद्ध स्कूलों में निजी प्रकाशकों की पाठ्यपुस्तकों को निर्धारित करने या सिफारिश करने का कोई अधिकार नहीं है।

उन्होंने कहा कि सरकार सीबीएसई स्कूलों में एनसीईआरटी पुस्तकों को बढ़ावा देने के लिए बहुत ही दृढ़ है। मंत्री का बयान ऐसे वक्त में आया है जब शिक्षा विशेषज्ञ बच्चों को पढ़ाई जा रही विषय वस्तु की छानबीन की कमी के मुद्दे को उठा रहे हैं। चौथी कक्षा की पर्यावरण विज्ञान की पाठ्य पुस्तक में छात्रों को एक प्रयोग के तहत ‘बिल्ली के एक बच्चे को मार डालो’ का दिया गया सुझाव सोशल मीडिया पर फैल गया जिसके चलते प्रकाशक को पिछले महीने बाजार से इस पुस्तक को वापस लेना पड़ा था। वहीं, एक हालिया घटना में 12 वीं कक्षा की समाजशास्त्र की पुस्तक में इस बात का जिक्र किया गया था कि किसी लड़की की कुरूपता और शारीरिक अशक्तता देश में दहेज की एक मुख्य वजह है।

संस्कृत पढ़ाने वाले संस्थानों में साल दर साल बढ़ रहा दाखिला
मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कहा है कि संस्कृत की शिक्षा देने वाले राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान और राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ जैसे संस्थानों में दाखिला साल दर साल बढ़ता जा रहा है। मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी दी। हालांकि, उन्होंने बताया कि संस्कृत भाषा चुनने वाले छात्रों और संस्कृत शिक्षकों के बारे में कोई भी आंकड़ा मंत्रालय ने एकत्र नहीं किया है।
मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नयी दिल्ली, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, तिरूपति और श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली से प्राप्त जानकारी के अनुसार छात्रों का दाखिला साल दर साल बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि संस्कृत शिक्षकों के पदों में कोई कमी नहीं की गई है। शिक्षा शास्त्री (बीएड) और शिक्षा आचार्य (एमएड) की पढ़ाई करने वाले छात्रों को सरकारी एवं निजी शिक्षण संस्थानों में नौकरी पाने के लिए भरपूर अवसर मिल रहे हैं।

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