आज जब झारखंड के हजारों छात्र JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, तो सवाल सिर्फ एक परीक्षा का नहीं है। यह उन लाखों युवाओं की नाराजगी है, जो पिछले दो दशकों से सरकारी नौकरी का सपना लेकर तैयारी करते रहे, लेकिन समय पर परीक्षा, रिजल्ट और नियुक्ति का इंतजार करते-करते उनकी उम्र और उम्मीदें दोनों बढ़ती चली गईं। हालिया आंदोलन भी इसी लंबे समय से जमा असंतोष का नया अध्याय माना जा रहा है। लेकिन इस संकट को समझने के लिए हमें 2026 से नहीं, बल्कि 15 नवंबर 2000 से शुरुआत करनी होगी।
जब झारखंड बना, तब सबसे बड़ा वादा क्या था?
15 नवंबर 2000 को बिहार पुनर्गठन अधिनियम के तहत झारखंड भारत का 28वां राज्य बना। अलग राज्य की मांग केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं थी। इसके पीछे एक बड़ा आर्थिक और प्रशासनिक तर्क भी था, जिसमें सबसे बड़ा मुद्दा स्थानीय युवाओं को रोजगार, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार और तेज विकास था।
उस समय लोगों को उम्मीद थी कि, सरकारी नौकरियों में स्थानीय युवाओं को अधिक अवसर मिलेंगे क्योंकि अलग राज्य बनने के बाद नए विभाग भी खुलेंगे और लाखों रिक्त पदों पर नियमित भर्तियां होंगी। नए राज्य में प्रशासनिक फैसले तेजी से होंगे और बिहार के मुकाबले भर्ती प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी लेकिन यही उम्मीद बाद में सबसे बड़ी निराशा में बदलती गई।
नया राज्य, लेकिन पुरानी समस्याएं
झारखंड बनने के समय सबसे बड़ी चुनौती थी कि राज्य के पास अपना प्रशासनिक ढांचा लगभग नहीं था। नई सरकार को एक साथ कई काम करने थे, जिसमें सचिवालय बनाना, नए विभाग तैयार करना, अधिकारियों की नियुक्ति, सेवा नियम बनाना, भर्ती प्रक्रिया तय करना और आयोगों का गठन शामिल था। यानी जिस राज्य से युवाओं को तुरंत रोजगार मिलने की उम्मीद थी, उसे पहले खुद अपनी प्रशासनिक व्यवस्था खड़ी करनी थी।
आखिर JPSC की जरूरत क्यों पड़ी?
हर राज्य में उच्च प्रशासनिक अधिकारियों की भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग होता है और झारखंड बनने के बाद झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) का गठन इसी उद्देश्य से किया गया।
JPSC की जिम्मेदारियों में डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी, बीडीओ, वित्त सेवा, प्रशासनिक सेवा सहित विभिन्न राजपत्रित पदों की भर्ती शामिल थीं। युवाओं को लगा कि अब हर साल यूपीएससी की तरह राज्य सेवा परीक्षा होगी लेकिन शुरुआत से ही परीक्षा कैलेंडर नियमित नहीं बन पाया।
JSSC क्यों बनाया गया?
जेपीएससी केवल प्रशासनिक सेवाओं की भर्ती करता था और राज्य में हजारों ऐसे पद थे जिनके लिए अलग चयन एजेंसी की जरूरत थी। इसी उद्देश्य से झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) बनाया गया।
JSSC को मिली जिम्मेदारियों में क्लर्क भर्ती, स्नातक स्तरीय परीक्षा, इंटर स्तरीय परीक्षा, पुलिस भर्ती, तकनीकी भर्ती, लैब असिस्टेंट, फॉरेस्ट गार्ड और अन्य विभागीय नियुक्तियां शामिल थीं। यानी राज्य की अधिकांश सरकारी नौकरियों में जेएसएससी के माध्यम भर्तियां होने लगी थीं।
शुरुआती वर्षों में सबसे बड़ी समस्या क्या थी?
झारखंड बनने के बाद लोगों को लगा था कि हजारों पदों पर भर्ती निकलेगी लेकिन वास्तविकता अलग थी, जिसके कारण इस प्रकार थे।
विभागों के पास रिक्त पदों का सही रिकॉर्ड नहीं: झारखंड में कई विभागों को खुद नहीं पता था कि उनके पास कितने स्वीकृत पद हैं और कितने खाली हैं।
सेवा नियम नहीं थे: झारखंड कर्मचारी चयन आयोग के पास सेवा नियमों की सही जानकारी नहीं थी, जिसमें किस पद पर भर्ती कैसे होगी, योग्यता क्या होगी, आरक्षण कैसे लागू होगा जैसे सवाल महत्वपूर्ण थे। इन सवालों पर कई साल तक नियम बनते रहे।
बिहार से परिसंपत्तियों का बंटवारा: अलग राज्य बनने के बाद बिहार और झारखंड के बीच कर्मचारियों, विभागों और संसाधनों का बंटवारा भी एक लंबी प्रक्रिया रही, जिसका सीधा असर राज्य की भर्ती प्रक्रिया पर पड़ा।
राजनीतिक अस्थिरता: झारखंड ने शुरुआती वर्षों में कई मुख्यमंत्री बदले, सरकारें भी बदलीं और राष्ट्रपति शासन भी लगा। हर नई सरकार भर्ती नीति में बदलाव की बात करती रही, जिसका नतीजा निकला की नीतियां बदलती रहीं लेकिन भर्तियां नियमित नहीं हो सकीं।
क्या उस समय से ही देरी शुरू हो गई थी?
विशेषज्ञों के अनुसार झारखंड की भर्ती व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या कभी केवल भ्रष्टाचार नहीं रही बल्कि सबसे बड़ी समस्या थी अनियमितता, जिसमें परीक्षा कब होगी पता नहीं, रिजल्ट कब आएगा पता नहीं, इंटरव्यू कब होगा पता नहीं और नियुक्ति कब मिलेगी पता नहीं जैसे सवाल हमेशा मुंह उठाए खड़े रहे। यही अनिश्चितता बाद में छात्रों के गुस्से की सबसे बड़ी वजह बनी।
आरक्षण नीति बनी विवाद की वजह
झारखंड में अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग और स्थानीय नीति से जुड़े सवाल लगातार राजनीति के केंद्र में रहे, जिसका सीधा असर भर्ती प्रक्रिया पर पड़ा और कई बार विज्ञापन बदले गए, नियम बदले, कोर्ट में याचिकाएं गईं और भर्ती प्रक्रिया रुक गई। इससे वर्षों तक नियुक्तियां लटकती रहीं।
स्थानीय नीति ने क्यों बढ़ाई मुश्किल?
अलग राज्य बनने के बाद सबसे बड़ा सवाल था कि सरकारी नौकरी में स्थानीय कौन माना जाएगा? सरकार ने इसी मुद्दे पर कई सरकारों ने अलग-अलग नीतियां बनाईं और कई बार संशोधन हुए, तो कई कई फैसले अदालत तक पहुंचे और इस पूरी प्रक्रिया का इसका सीधा असर भर्ती प्रक्रिया पर पड़ा।
क्या केवल सरकार जिम्मेदार थी?
इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है क्योंकि भर्ती में देरी के पीछे कई कारण रहे, जिसमें विभागों की तैयारी का अभाव, रिक्तियों का सही आकलन न होना, नियमों में बार-बार बदलाव, अदालतों में लंबित मामले, प्रशासनिक कमजोरी और राजनीतिक बदलाव प्रमुख थे। बाद के वर्षों में इन समस्याओं के साथ परीक्षा पारदर्शिता और कथित पेपर लीक जैसे आरोप भी जुड़ते गए।
युवाओं का भरोसा क्यों हुआ कमजोर?
2000 से 2010 के बीच युवाओं ने उम्मीद की थी कि अलग राज्य बनने के बाद रोजगार के अवसर तेजी से बढ़ेंगे लेकिन हुआ इसके उलट। कई भर्तियां वर्षों तक नहीं निकलीं और जो निकलीं, वे पूरी होने में लंबा समय लेती रहीं।
लगातार हो रही इस देरी से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं में यह धारणा बनने लगी कि, झारखंड में सरकारी नौकरी मिलना मुश्किल नहीं, बल्कि भर्ती पूरी होना मुश्किल है और यही धारणा आगे चलकर झारखंड की भर्ती व्यवस्था पर भरोसे के संकट की नींव बनी।
Jansatta Education Expert Conclusion
झारखंड की भर्ती व्यवस्था का संकट किसी एक सरकार, एक आयोग या एक परीक्षा से शुरू नहीं हुआ। इसकी जड़ें राज्य गठन के शुरुआती वर्षों में दिखाई देती हैं, जब प्रशासनिक ढांचा विकसित हो रहा था, सेवा नियम बन रहे थे, स्थानीय नीति पर विवाद था और भर्ती प्रक्रिया अभी स्थिर नहीं हो पाई थी। समय के साथ इन संरचनात्मक समस्याओं के साथ देरी, कानूनी विवाद और बाद के वर्षों में पारदर्शिता को लेकर उठे सवाल जुड़ते गए, जिसने आज के व्यापक छात्र असंतोष की पृष्ठभूमि तैयार की। हाल के आंदोलन इसी लंबे भरोसे के संकट की नवीनतम अभिव्यक्ति हैं।
