सीबीएसई का ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम इस समय विवादों में है। इस बार सीबीएसई का पास प्रतिशत 85.29 फीसदी रहा है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 88.39 फीसदी था। वर्ष 2019 के बाद से यह सबसे कम परिणाम है।

इंडियन एक्सप्रेस को अपनी पड़ताल में पता चला है कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को लेकर कई तरह की आशंकाएं इसके ट्रायल रन के दौरान ही सामने आ गई थीं, लेकिन इसके बावजूद सीबीएसई ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया।

OSM सिस्टम को लागू करने के लिए चार शर्तों का पूरा होना बेहद जरूरी था-

पहली, मूल्यांकन केंद्र तकनीकी रूप से पूरी तरह सक्षम हों।

दूसरी, कॉपियां जांचने वाले शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण मिले।

तीसरी, पारदर्शी और त्रुटिरहित मूल्यांकन के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।

चौथी, सिस्टम में कोई तकनीकी खराबी आने पर उसे तुरंत ठीक करने की व्यवस्था हो।

ये जरूरतें पहले से स्पष्ट थीं, लेकिन ट्रायल में शामिल लोगों का कहना था कि इन कमियों को दूर नहीं किया गया।

दरअसल, 17 फरवरी से सीबीएसई की कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाएं शुरू होनी थीं। इससे ठीक एक महीने पहले बोर्ड ने OSM सिस्टम का ड्राई रन किया था। परीक्षण के दौरान ही कई समस्याएं सामने आ गई थीं और सीबीएसई को इसकी जानकारी भी दी गई थी। इसके बावजूद बोर्ड ने चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए सिस्टम को लागू कर दिया।

पहले परीक्षक फिजिकल कॉपियों की जांच करते थे। लेकिन नए सिस्टम के तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन किया गया, फिर उन्हें एक सुरक्षित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया गया। इसके बाद परीक्षकों ने कंप्यूटर के माध्यम से डिजिटल तरीके से इन कॉपियों का मूल्यांकन किया।

चूंकि यह व्यवस्था पहली बार बड़े स्तर पर लागू की गई थी, इसलिए परिणाम घोषित होते ही कई खामियां सामने आने लगीं। छात्रों ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की। याचिका में OSM सिस्टम में कथित अनियमितताओं, तकनीकी खामियों और मूल्यांकन संबंधी त्रुटियों का उल्लेख करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की गई।

केंद्र सरकार ने मामले का संज्ञान लेते हुए सीबीएसई चेयरमैन राहुल सिंह को उनके पद से हटा दिया। इसके अलावा सीबीएसई सचिव हिमांशु गुप्ता के खिलाफ भी कार्रवाई की गई और पूरे OSM सिस्टम की विस्तृत जांच के आदेश दिए गए।

OSM सिस्टम का ट्रायल रन क्या था?

जिस ट्रायल रन का सीबीएसई बार-बार जिक्र कर रहा है, वह तीन दिनों तक दिल्ली में आयोजित किया गया था। इसमें राजधानी के पांच प्रमुख स्कूलों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया था। इनमें निजी स्कूल, दिल्ली सरकार के स्कूल, केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय भी शामिल थे।

बड़ी बात यह है कि ट्रायल रन में स्कूलों के प्रिंसिपल, कॉपियां जांचने वाले इवैल्यूएटर, एग्जामिनर और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ भी शामिल थे। सभी को OSM सिस्टम की ट्रेनिंग दी गई थी। इसके बाद उन्होंने मॉक उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन भी किया था।

इंडियन एक्सप्रेस को पता चला है कि ट्रायल रन के दौरान ही कॉपियों की जांच करते समय कई समस्याएं सामने आ रही थीं। मार्किंग स्कीम से लेकर अंकों की गणना तक, कई स्तरों पर दिक्कतें थीं। जानकारी के अनुसार, पहले दिन सामने आई समस्याओं का समाधान अंतिम दिन तक भी नहीं हो पाया था। जांच में कुल आठ प्रमुख समस्याएं सामने आईं।

पहली समस्या यह थी कि कई मामलों में अंक बढ़ाने के बजाय घट रहे थे। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी अतिरिक्त हेड एग्जामिनर ने किसी छात्र के 1.5 अंक बढ़ाए, तो सिस्टम उन्हें बढ़ाने के बजाय 1.5 अंक घटाकर दिखा रहा था।

दूसरी समस्या मार्किंग स्कीम और स्क्रीन पर दिख रहे अंकों के बीच अंतर की थी। सीबीएसई की आधिकारिक मार्किंग स्कीम में कुछ और अंक निर्धारित थे, जबकि सॉफ्टवेयर स्क्रीन पर कुछ और अंक दिखा रहा था।

तीसरी समस्या यह थी कि कुछ प्रश्न कई भागों में विभाजित थे, लेकिन स्क्रीन पर केवल एक भाग के अंक दिखाई देते थे। बाकी भागों के अंक गायब रहते थे।

चौथी समस्या यह थी कि मार्किंग स्कीम में 0.5 अंक देने की अनुमति नहीं थी, लेकिन सिस्टम कई बार स्वतः 0.5 अंक देने की स्थिति बना रहा था।

पांचवीं समस्या यह थी कि सिस्टम लगातार हैंग हो रहा था। खासकर जब कोई एग्जामिनर “Undo” बटन दबाता था, तो पूरा सिस्टम फ्रीज हो जाता था।

छठी समस्या यह थी कि कुछ प्रश्नों के लिए निर्धारित अंक मूल्यांकन स्क्रीन पर दिखाई ही नहीं दे रहे थे।

सातवीं समस्या यह थी कि एग्जामिनरों की प्रगति अपने आप सेव नहीं हो रही थी। कई बार कॉपी जांचने के बाद भी डेटा सेव नहीं होता था, जिससे जानकारी खोने का खतरा बना रहता था।

आठवीं समस्या यह थी कि खाली पन्नों या बिना उत्तर वाले प्रश्नों पर भी अंक दिए जा सकते थे। यदि स्क्रीन पर किसी प्रश्न संख्या पर क्लिक कर दिया जाए, तो सिस्टम ऐसे पन्नों पर भी अंक दर्ज करने की अनुमति दे देता था।

जो समस्याएं ट्रायल रन में सामने आई थीं, परिणाम घोषित होने के बाद छात्रों ने भी लगभग वैसी ही शिकायतें कीं। छात्रों का आरोप था कि कुछ उत्तरों की जांच ही नहीं की गई, जबकि कुछ उत्तरों की अधूरी जांच हुई। कई छात्रों ने यह भी कहा कि स्कैन की गई कॉपियां धुंधली थीं और उन्हें पढ़ना मुश्किल था। कुछ मामलों में उत्तर पुस्तिकाओं के पन्नों के गड़बड़ होने की भी शिकायतें सामने आईं।

इस मामले में इंडियन एक्सप्रेस ने सीबीएसई चेयरमैन और सचिव दोनों से जवाब मांगा था, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। बाद में सरकार ने दोनों अधिकारियों को उनके पदों से हटा दिया।

CBSE को किस बात के लिए चेताया गया?

OSM सिस्टम को लेकर जून 2025 में भी एक अहम बैठक हुई थी। उस बैठक में सीबीएसई की गवर्निंग बॉडी ने सुझाव दिया था कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को तभी लागू किया जाए, जब पहले कुछ विषयों पर पायलट प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूरा कर लिया जाए। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके बजाय दिल्ली के केवल पांच स्कूलों में सीमित ट्रायल के आधार पर पूरे सिस्टम को लागू कर दिया गया।

फिलहाल सीबीएसई अपने बचाव में कई तर्क दे रही है। बोर्ड का कहना है कि उसने पारंपरिक मूल्यांकन प्रणाली को ध्यान में रखते हुए OSM सिस्टम को विकसित किया था। सीबीएसई का दावा है कि सुझाव मिलने के बाद “सेव” बटन जोड़ा गया, मार्क्स डिलीट करने की प्रक्रिया को आसान बनाया गया और स्टैटिक IP से जुड़ी समस्या को दूर किया गया।

इसके अलावा हेड एग्जामिनर, एडिशनल हेड एग्जामिनर और इवैल्यूएटर के लिए अलग-अलग रंगों की व्यवस्था सॉफ्टवेयर में की गई। बोर्ड का यह भी कहना है कि मार्किंग स्कीम और उत्तर पुस्तिकाओं को आपस में लिंक कर दिया गया था।

इंडियन एक्सप्रेस को अपनी पड़ताल में यह भी पता चला है कि OSM सिस्टम को लेकर एक दूसरी रिपोर्ट भी तैयार की गई थी। इस रिपोर्ट में 36 से अधिक तकनीकी, संचालन संबंधी और मूल्यांकन संबंधी चिंताओं का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में “ब्लाइंड चेकिंग” यानी सतही मूल्यांकन का खतरा भी बताया गया था।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि यदि अतिरिक्त हेड एग्जामिनर (AHE) को किसी उत्तर पुस्तिका में कई गलतियां मिलती हैं, तो वह उस कॉपी को दोबारा जांच और सुधार के लिए मूल्यांकनकर्ता के पास वापस नहीं भेज सकता था। यानी त्रुटियों को सुधारने की प्रभावी व्यवस्था मौजूद नहीं थी।

यानी कि सीबीएसई को OSM सिस्टम को लेकर कई चेतावनियां पहले ही मिल चुकी थीं। इसके बावजूद इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया। बाद में जब परिणाम आए तो छात्रों की शिकायतों ने इस सिस्टम की कलई खोलकर रख दी।

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