सीबीएसई बोर्ड की मूल्यांकन प्रक्रिया पर उठे सवालों के बीच एक 12वीं के स्टूडेंट्स ने सॉफ्टवेयर कंपनी COEMPT को मिले कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा जो सनसनीखेज खुलासा किया था उसको लेकर शिक्षा मंत्रालय अब एक्शन मोड में आ गया है। दरअसल, शिक्षा मंत्रालय ने कोएम्प्ट एडुटेक कंपनी का टेंडर रिव्यू किया और अब यह जानकारी सामने आ रही है कि सीबीएसई बोर्ड को तलब कर उनसे रिपोर्ट मांगी गई है।

सीबीएसई बोर्ड पर आरोप लगे हैं कि कोएम्प्ट एडुटेक को टेंडर देने के लिए बोर्ड ने अपने क्वालिफाइंग क्राइटेरिया में बदलाव किए थे। इस कंपनी को लेकर राहुल गांधी ने भी कई बड़े खुलासे किए थे अब शिक्षा मंत्रालय उन सभी आरोपों की जांच में जुट गया है।

जिम्मेदार लोगों पर होगी कार्रवाई

एजुकेशन मिनिस्ट्री ने एक्शन लेते हुए कोएम्पेट एडुटेक कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट देने पर सीबीएसई बोर्ड से रिपोर्ट मांगी है। सूत्रों के मुताबिक, टेंडर प्रोसीजर और उससे जुड़ी फाइलें इकट्ठा कर ली गई हैं। जांच के बाद शिक्षा मंत्रालय ने जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सुधारात्मक कार्रवाई का भी मन बना लिया है।

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COEMPT पर लिया जा सकता है बड़ा एक्शन

टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीएसई बोर्ड COEMPT पर कई फाइनेंशियल पेनल्टी लगा सकता है। इवैल्यूएशन प्रोसेस के दौरान करेक्टिव एक्शन में हर 15 मिनट की देरी पर 1 लाख रुपये का फाइन और रूट कॉज एनालिसिस में हर घंटे की देरी पर 1 लाख रुपये का फाइन लगाया जा सकता है।

इसके अलावा अगर स्टूडेंट्स को आंसर की कॉपी नहीं मिलती है तो हर दिन 50,000 रुपये का फाइन लगाया जा सकता है और डिजिटल इवैल्यूएशन या टेक्निकल दिक्कतों को ठीक करने में देरी होने पर हर दिन 50,000 रुपये का और फाइन लगाया जा सकता है। साथ ही बोर्ड एनालिसिस रिपोर्ट जमा करने में देरी होने पर हर दिन 25,000 रुपये और CBSE को ऑन-साइट सपोर्ट और ट्रेनिंग देने में देरी होने पर हर घंटे 5,000 रुपये का फाइन भी लगा सकता है।

12वीं के स्टूडेंट ने खोली थी इस कंपनी की पोल

हैदराबाद की इस कंपनी की सारी कुंडली रांची के एक स्टूडेंट सार्थक सिद्धांत ने मीडिया के सामने रखी थी। यह मामला 29 मई को सामने आया था। सार्थक ने एक ब्लॉग लिखा था बाद में एक टीवी चैनल को इंटरव्यू देते हुए उन्होंने बताया था कि सीबीएसई बोर्ड ने Coempt कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर के नियम बदले थे।

इस कंपनी को टेंडर देने के लिए क्या किया गया?

सार्थक ने अपने इन आरोपों से जुड़े दस्तावेज भी पेश किए थे। सार्थक का आरोप था कि बोर्ड ने प्रोक्योरमेंट प्रोसेस को इस तरह से बनाया कि एक के बाद एक RFP में एलिजिबिलिटी शर्तों को बदल दिया गया, जिसमें डिसक्वालिफिकेशन क्लॉज़ में बदलाव, फाइनेंशियल थ्रेशहोल्ड को कड़ा या ढीला करना और CMMI लेवल जैसी टेक्निकल जरूरतों को कम करना शामिल था ताकि COEMPT को टेंडर दिया जा सके।