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अनुसंधान की राह के अवरोध

भारत में अनुसंधान की दिशा में हुई प्रगति को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन सच्चाई यह भी है कि ऐसे कई अवरोध हैं, जिन्हें पार करना भारतीय अनुसंधान और विकास के लिए बहुत जरूरी है। कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में उपलब्धियों को छोड़ दें तो वैश्विक संदर्भ में भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास तथा अनुसंधान की स्थिति धरातल पर उतनी मजबूत नहीं, जितनी कि भारत जैसे बड़े देश की होनी चाहिए।

C V Ramanडॉ सी वी रमन।

कुमार विनोद

विज्ञान के जरिए भारत अपने वर्तमान को बदल और अपने भविष्य को सुरक्षित रख पा रहा है। विज्ञान के विविध क्षेत्रों में भारत द्वारा छोड़ी जा रही छाप का एक ताजा उदाहरण कोविड-19 के देश में विकसित किए गए टीके हैं, जो देशव्यापी टीकाकरण में शामिल हो चुके हैं।
विज्ञान और अनुसंधान का जिक्र होते ही भारतीय वैज्ञानिक सीवी रमन की याद आना स्वाभाविक है।

चंद्रशेखर वेंकट रमन का जन्म 7 नवंबर, 1888 को दक्षिण भारत के तिरुचिरापल्ली जिले के उत्तर में तिरुवनैकावल नामक एक छोटे से गांव में हुआ। रमन आगे चल कर वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में भारतीय निश्चयात्मकता और स्वावलंबन की एक शानदान मिसाल बने। इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन आॅफ साइंस में काम करते हुए रमन ने 28 फरवरी, 1928 को प्रकाश के प्रकीर्णन पर कई प्रयोग किए।

उनके कार्यों में एक सहयोगी केएस कृष्णन थे। पारदर्शी पदार्थ से गुजरने पर प्रकाश की किरणों में आने वाले बदलाव पर की गई उनकी महत्त्वपपूर्ण खोज को रमन प्रभाव के नाम से जाना गया, जिसके लिए उन्हें 1930 में नोबल पुरस्कार मिला था। कहा जाता है कि रमन प्रभाव की खोज करने में रमन ने मात्र दो सौ रुपए के संसाधनों का इस्तेमाल किया था। उनकी इस खोज का उपयोग आज पूरी दुनिया में हो रहा है।

भौतिकी में नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे भारत ही नहीं, एशिया के पहले वैज्ञानिक थे। इस पुरस्कार को लेकर विवाद भी हुआ। कई लोग इस प्रभाव को रमन-कृष्णन प्रभाव कहते हैं, क्योंकि इस खोज के दौरान रमन के सहयोगी वैज्ञानिक केएस कृष्णन का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। हालांकि कालांतर में नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद रमन ने कृष्णन के इस योगदान को नकारा।

भारत सरकार ने 1986 में तय किया कि हर वर्ष 28 फरवरी को सीवी रमन की याद में ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के तौर पर मनाया जाएगा। पहला राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 28 फरवरी, 1987 को मनाया गया था। उस बार का विषय था ‘एसटीआई का भविष्य : शिक्षा, कौशल और कार्य पर प्रभाव’।
रमन 1933 में भारतीय विज्ञान संस्थान के पहले भारतीय निदेशक बने।

यह अभूतपूर्व उपलब्धि थी, क्योंकि भारतीय विज्ञान संस्थान में कभी कोई भारतीय निदेशक नहीं था, क्योंकि औपनिवेशिक काल के दौरान पिछले सभी निदेशक ब्रिटिश थे। यह संस्थान जेआरडी टाटा ने 1909 में भारत में वैज्ञानिक प्रतिभा को निखारने के लिए शुरू किया था। रमन एक महान वैज्ञानिक होने के साथ ही भारत में वैज्ञानिक संस्थाओं के प्रणेता भी थे। विज्ञान को लेकर नेहरू और सीवी रमन की जोड़ी बहुत पुरानी थी।

जब 1938 में सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष थे, तब भी नेहरू और रमन ने योजना बनाई थी कि जर्मनी में हिटलर के अत्याचार के कारण वहां से पलायन कर रहे यहूदी वैज्ञानिकों को किसी तरह भारत लाया जाए। उस जमाने में जर्मनी के यहूदी समुदाय में सबसे बड़े वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन भी थे। पर सुभाष चंद्र बोस को यह योजना पसंद नहीं आई और इस पर काम नहीं हो सका।

आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने रमन की वैज्ञानिक क्षमता का पूरा लाभ उठाने की व्यवस्था की। नेहरू रमन और अन्य वैज्ञानिकों का कितना सम्मान करते थे, इसे उस पत्र से समझा जा सकता है, जो नेहरू ने रमन की नियुक्ति के लिए लिखा था। नेहरू के जीवन पर आधारित किताब ‘नेहरू : मिथक और सत्य’ में उस पूरे प्रसंग का जिक्र है।

नेहरू सिर्फ इस बात पर ध्यान नहीं दे रहे थे कि देश विज्ञान के मामले में तरक्की करे, वह इस बात का खयाल भी रख रहे थे कि बड़े वैज्ञानिकों को पूरा सम्मान मिले। शांतिस्वरूप भटनागर और सीवी रमन जैसे महान वैज्ञानिकों की गरिमा के हिसाब से नेहरू ने पदों का सृजन किया। 11 जनवरी, 1949 को नेहरू ने अपने प्रिंसिपल प्राइवेट सेक्रेटरी को नोट लिखा: ‘डॉ सीवी रमन के लिए 1948 में नेशनल प्रोफेसरशिप आॅफ फिजिक्स बनाई गई थी। इसे साफ तौर पर सिर्फ उन्हीं के लिए रचा गया था, क्योंकि डॉ रमन विज्ञान की दुनिया की एक बड़ी हस्ती हैं।

विज्ञान के क्षेत्र में सरकार उनकी सेवाओं का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने को उत्साहित थी और चाहती थी कि वह अपनी मर्जी के मुताबिक रिसर्च कर सकें। उनके जैसे विशिष्ट प्रतिष्ठा वाले वैज्ञानिक को उनके काम के अनुपात में सम्मान मिलना ही चाहिए। यह पद दो साल के लिए ढाई हजार रुपए प्रति माह के वेतन पर बनाया गया था और इसे इंडियन एकेडमी आॅफ साइंस के साथ जोड़ा गया था।’

महान वैज्ञानिकों के लिए पद सृजन की स्वस्थ परंपरा कायम करते हुए नेहरू आगे कहते हैं, ‘तकनीकी दिक्कतों को देखते हुए ऐसी नियुक्तियां स्थायी आधार पर नहीं की जातीं। लेकिन इनके लिए तय किया गया समय, खास महत्त्व नहीं रखता। सबसे अच्छा तो यही होता कि इसके लिए कोई समय सीमा तय न की जाती, बल्कि यह कहा जाता कि कोई भी पक्ष छह महीने का नोटिस देकर काम से अलग हो सकता है।

मैं वित्त मंत्रालय की एप्रोच पसंद नहीं करूंगा, क्योंकि इस समय बहुत सारी दिक्कतें हैं। लेकिन प्रोफेसर रमन को सूचित कर दिया जाए कि सरकार अनंत समय तक उनकी सेवाएं लेना चाहती है। उनकी नियुक्ति निजी तौर पर की जा सकती है और उसे इंडियन एकेडमी आॅफ साइंस से अटैच करने की जरूरत नहीं है।’

अब भारत में अनुसंधान और विकास कार्यों की रफ्तार कई क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रही है। सरकार के सहयोग और समर्थन के साथ, वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, अंतरिक्ष अनुसंधान, विनिर्माण, जैव-ऊर्जा, जल-तकनीक और परमाणु ऊर्जा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश और विकास भी हुआ है। हम धीरे-धीरे परमाणु प्रौद्योगिकी में भी आत्मनिर्भर हो रहे हैं।

शोध के क्षेत्र में सीएसआईआर, डीआरडीओ, आईसीएआर, इसरो, आईसीएमआर, एनडीआरआई, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय विज्ञान संस्थान जैसे कई विश्वविख्यात संस्थान भारत में हैं। 2035 तक तकनीकी और वैज्ञानिक दक्षता हासिल करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने ‘टेक्नोलॉजी विजन 2035’ नाम से एक रूपरेखा भी तैयार की है। इसमें शिक्षा, चिकित्सा और स्वास्थ्य, खाद्य और कृषि, जल, ऊर्जा, पर्यावरण जैसे बारह विभिन्न क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई है।

भारत में अनुसंधान की दिशा में हुई प्रगति को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन सच्चाई यह भी है कि ऐसे कई अवरोध हैं, जिन्हें पार करना भारतीय अनुसंधान और विकास के लिए बहुत जरूरी है। कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में उपलब्धियों को छोड़ दें तो वैश्विक संदर्भ में भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास तथा अनुसंधान की स्थिति धरातल पर उतनी मजबूत नहीं, जितनी कि भारत जैसे बड़े देश की होनी चाहिए।

ऐसे में कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। जैसे, भारत विश्व में वैज्ञानिक प्रतिद्वंद्विता के नजरिए से कहां है? नोबेल पुरस्कार एक प्रतिष्ठित पैमाना है, जो विज्ञान और शोध के क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धियों के जरिए किसी देश की वैज्ञानिक ताकत को बताता है। इस मामले में हमारी उपलब्धि लगभग शून्य है।

वर्ष 1930 में सीवी रमन को मिले नोबेल पुरस्कार के बाद से अब तक कोई भी भारतीय वैज्ञानिक यह उपलब्धि हासिल नहीं कर पाया। आखिर क्यों भारत शोध कार्यों के मामले में चीन, जापान जैसे देशों से पीछे है? ऐसी कौन-सी चुनौतियां हैं जो अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भारत की प्रगति के पहिए को रोक रही हैं? इस दिशा में क्या कुछ समाधान किए जा सकते हैं? राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के बहाने हम इन प्रश्नों पर विचार तो कर ही सकते हैं।

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