केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) जल्द ही कक्षा 12वीं का रिजल्ट जारी करने वाला है। इस साल 16 लाख से ज्यादा छात्र परीक्षा में शामिल हुए हैं। रिजल्ट जारी होने के बाद छात्र अपना अंक cbse.gov.in, cbseresults.nic.in, DigiLocker और UMANG ऐप पर चेक कर सकते हैं। रिजल्ट जारी होने से पहले छात्रों के मन में जो सबसे पहला सवाल आता है, क्या वह यह है कि अंतिम मार्क्स कैसे तैयार किया जाता है? तो देर न करें आसान भाषा में समझें पूरा सिस्टम।
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CBSE का मॉडरेशन सिस्टम क्या है?
सीबीएसई हर साल मॉडरेशन पॉलिसी लागू करता है ताकि सभी छात्रों के लिए मूल्यांकन निष्पक्ष रहे।
मॉडरेशन क्यों जरूरी है?
इस मॉडरेशन पॉलिसी के जरिए अलग-अलग सेट के प्रश्नपत्रों की कठिनाई में अंतर को संतुलित करने के अलावा गलत या अस्पष्ट प्रश्नों की भरपाई करना, अलग-अलग एग्जामिनर के मूल्यांकन में अंतर कम करना इसका मुख्य उद्देश्य होता है, जो सभी छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करता है। आसान शब्दों में कहें, तो मॉडरेशन एक बैलेंसिंग सिस्टम है जिससे किसी छात्र को नुकसान न नहीं होता है।
ग्रेस मार्क्स क्या होते हैं?
सीबीएसई जरूरत पड़ने पर ग्रेस मार्क्स भी देता है, लेकिन यह सभी को नहीं मिलते।
कब मिलते हैं ग्रेस मार्क्स?
सीबीएसई द्वारा ग्रेस मार्क्स बहुत कठिन प्रश्न होने पर, गलत या आउट-ऑफ-सिलेबस सवाल होने पर या पास होने के लिए थोड़े अंक कम होने पर ही ग्रेस मार्क्स प्रदान करता है। कुछ मामलों में पहले लगभग 15% तक ग्रेस मार्क्स देने की बात सामने आई थी, लेकिन अब यह तय नियम नहीं है क्योंकि यह पूरी तरह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
पास होने के नियम क्या हैं?
सीबीएसई के अनुसार कक्षा 12वीं पास करने के लिए, छात्र को हर विषय में कम से कम 33% अंक जरूरी है और थ्योरी और प्रैक्टिकल दोनों में पास होना जरूरी भी जरूरी है। इसके अलावा सभी विषयों में ‘E’ ग्रेड से ऊपर की ग्रेड होनी चाहिए।
अगर कोई छात्र एक विषय में फेल होता है, तो उसे अपना परिणाम सुधारने के लिए कंपार्टमेंट एग्जाम के रूप में दूसरा मौका दिया जाता है और अतिरिक्त विषय होने पर सब्जेक्ट रिप्लेसमेंट भी संभव हो जाता है। कुल मिलाकर सीबीएसई डिवीजन पर नहीं, बल्कि विषय आधारित प्रदर्शन पर ध्यान देता है।
रिलेटिव ग्रेडिंग सिस्टम कैसे काम करता है?
सीबीएसई का सबसे अलग हिस्सा है इसका रिलेटिव ग्रेडिंग सिस्टम, जिसमें पास हुए सभी छात्रों को उनके अंकों के आधार पर रैंक किया जाता है और फिर उन्हें 8 बराबर समूह में बांटा जाता है।
ग्रेडिंग स्ट्रक्चर:
A1: टॉप 1/8 छात्र
A2: अगला 1/8
B1, B2: अच्छे छात्र
C1, C2: औसत
D1, D2: पासिंग लेवल
E: फेल
क्या मार्क्स ही सब कुछ हैं?
नहीं। सीबीएसई का सिस्टम इस तरह बनाया गया है कि कठिन पेपर होने पर नुकसान न हो और सभी छात्रों को बराबरी का मौका मिले ताकि ग्रेडिंग निष्पक्ष रहे। इसलिए कई बार कम नंबर पर भी अच्छी ग्रेड मिल सकती है, और ज्यादा नंबर पर अपेक्षित ग्रेड न मिले।
