Devdutt Pattanaik Arts & Culture: (द इंडियन एक्सप्रेस ने UPSC उम्मीदवारों के लिए इतिहास, राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, कला, संस्कृति और विरासत, पर्यावरण, भूगोल, विज्ञान और टेक्नोलॉजी आदि जैसे मुद्दों और कॉन्सेप्ट्स पर अनुभवी लेखकों और स्कॉलर्स द्वारा लिखे गए लेखों की एक नई सीरीज शुरू की है। सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स के साथ पढ़ें और विचार करें और बहुप्रतीक्षित UPSC CSE को पास करने के अपने चांस को बढ़ाएं। पौराणिक कथाओं और संस्कृति में विशेषज्ञता रखने वाले प्रसिद्ध लेखक देवदत्त पटनायक ने अपने इस लेख में बताया बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिंदू धर्म का दक्षिण की ओर प्रसार कैसे हुआ।)
पारंपरिक रूप से, आर्यावर्त या आर्य लोगों की भूमि हिमालय, गंगा और यमुना से घिरी हुई थी। हमें यह जानकारी अशोक के समय के शुरुआती धर्म-शास्त्र ग्रंथों से मिलती है।
जहां अशोक के शिलालेखों में जंबूद्वीप की उस भूमि का जिक्र है जिस पर उसका शासन था और बाद में ओडिशा के खारवेल ने भारत को ओडिशा के उत्तर की भूमि बताया, वहीं ब्राह्मण ग्रंथों में आर्यावर्त का जिक्र मिलता रहा। उन्होंने पंजाब क्षेत्र को ब्रह्मवर्त कहा, जो सरस्वती की पुरानी भूमि थी और जहां कभी ऋषि-मुनि रहते थे। आर्यावर्त गंगा नदी घाटी तक ही सीमित था। समय के साथ इसका विस्तार हुआ।
इस शुरुआती आर्यावर्त के पूर्व में, बिहार के तराई इलाके और झारखंड के साल के जंगलों में बौद्ध और जैन धर्म के मठों की शुरुआत हुई। यहां से ये विचार दक्षिण की ओर फैले। सबसे पहले जैन धर्म के लोग आगे बढ़े, फिर बौद्ध और आखिर में हिंदू।
दक्षिण की ओर प्रसार के शिलालेख और पुरातत्व संबंधी सबूत
उत्तर भारत के मुख्य इलाकों से दक्षिण की ओर बौद्ध और जैन धर्म का प्रसार सिर्फ कहानियों तक सीमित नहीं है, पुरातत्व से भी इसकी पक्की पुष्टि होती है। दोनों धर्म छठी सदी ईसा पूर्व में गंगा के मैदानी इलाकों में शुरू हुए थे, फिर भी कुछ ही सदियों में दक्कन और सुदूर दक्षिण में इनके निशान साफ तौर पर दिखाई देने लगे।
सबसे शुरुआती सबूत शिलालेखों से मिलते हैं। आज के कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में येर्रागुडी, मस्की, ब्रह्मगिरि, सिद्धापुरा और जटिंगा-रामेश्वर में अशोक के शिलालेखों पर वही प्राकृत भाषा में ‘धम्म’ के संदेश लिखे हैं जो उत्तर में मिलते हैं और ये ब्राह्मी लिपि में हैं। मस्की का शिलालेख खास तौर पर अहम है क्योंकि इसमें सीधे अशोक का नाम है, जिससे यह पक्का होता है कि मौर्यकालीन बौद्ध धर्म तीसरी सदी ईसा पूर्व तक दक्षिणी पठार तक पहुंच गया था।
स्तूपों की बनावट भी इस बात की पुष्टि करती है। कृष्णा नदी के किनारे अमरावती, नागार्जुनकोंडा, भट्टीप्रोलु और जग्गय्यापेटा के बड़े स्तूप, सांची और भरहुत में सबसे पहले बनी शैली को ही दोहराते हैं।
भट्टीप्रोलु में मिले अवशेष रखने वाले बक्सों पर दक्षिणी ब्राह्मी लिपि में सबसे पुराने शिलालेख मिलते हैं। इनमें स्थानीय संघों द्वारा दिए गए दान का जिक्र है, जो इस बात का सबूत है कि इस धर्म को अपनाया गया था, न कि सिर्फ थोपा गया था। गुंटुपल्ली और संकरम में चट्टानों को काटकर बनाए गए बौद्ध विहार और पश्चिमी घाट की कार्ले, भाजा और कन्हेरी की गुफाएं उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाली मठवासी बस्तियों की एक लगातार कड़ी को दिखाती हैं।
जैन पुरातत्व भी ऐसी ही कहानी बताता है। सिट्टानावासल, कज़ुगुमलाई, अनाइमलाई और मदुरै के आस-पास की पहाड़ियों में मिलीं तमिल-ब्राह्मी गुफाओं के शिलालेख (तीसरी सदी ईसा पूर्व से दूसरी सदी ईस्वी तक के) जैन साधुओं को दिए गए दान का रिकॉर्ड रखते हैं और प्राकृतिक गुफाओं में उनके लिए बनाए गए पत्थर के बिस्तरों का वर्णन करते हैं। परंपरा के अनुसार, मौर्य काल में पड़े अकाल के दौरान भद्रबाहु ने जैनों के दक्षिण की ओर पलायन का नेतृत्व किया था। कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में बाहुबली की विशाल अखंड मूर्ति और चंद्रगिरि के शिलालेख उस याद को पत्थर में संजोए हुए हैं।
कुल मिलाकर, शिलालेख, स्तूप, चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएं और दान के अभिलेख मिलकर उत्तर भारत के दो धर्मों के दक्षिण की जमीन पर जड़ें जमाने का एक अटूट भौतिक रिकॉर्ड बनाते हैं।
दक्षिण में गंगा और यमुना की मूर्तियां क्या बताती हैं?
हिंदू धर्म के बारे में क्या? इसका एक सीधा सबूत 500 ईस्वी के बाद दक्षिण भारत में गंगा और यमुना की मूर्तियों का दिखना है। गंगा और यमुना उत्तर भारत की नदियां हैं जो हिमालय से निकलती हैं। कला में, गंगा को डॉल्फिन की सवारी करते हुए दिखाया जाता है, जबकि यमुना को कछुए की सवारी करते हुए दिखाया जाता है।
500 ईस्वी के बाद, दक्षिण भारत में ऐसे मंदिर बनाए गए जिनके दरवाजों के चौखटों पर ये मूर्तियां दिखाई देती थीं और मंदिर का शिखर हिमालय पर्वत का प्रतीक होता था। दक्षिण के लोग उत्तर भारत के भूगोल को क्यों दोहरा रहे थे? क्योंकि उन्हें बताया गया था कि देवता उत्तर भारत में, गंगा और यमुना के बीच और हिमालय में रहते हैं। यही आर्यावर्त था।
इसी तरह आर्य दक्षिण भारत आए। इसलिए जब लोग आर्यों के प्रवास की थ्योरी के बारे में बात करते हैं, तो हमें उत्तर भारत से दक्षिण भारत की ओर हुए प्रवास का भी जिक्र करना चाहिए। इस समय से पहले भारत में कोई आर्य नहीं थे और इस बात की पुष्टि वाई-डीएनए हैप्लो-ग्रुप आर1 ए-जेड93 से होती है। यह एक ऐसा जीन है जो स्टेपी इलाके से आया है। यह उत्तर भारत के लगभग हर समुदाय में पाया जाता है, लेकिन दक्षिण भारत में सिर्फ ऊंचे दर्जे के समुदायों में ही मिलता है।
दक्षिण की ओर विस्तार से जुड़ी कहानियां
इस प्रवास से कई कहानियां बनीं, जैसे कि कार्तिकेय ने अपने पिता से झगड़ा किया और दक्षिण चले गए या अगस्त्य मुनि ने दक्षिण की यात्रा की और विंध्य पर्वत को झुकने पर मजबूर किया ताकि रास्ता आसान हो सके या परशुराम ने उत्तर भारत के सभी क्षत्रियों को मार डाला और फिर एक नई वैदिक दुनिया बनाने के लिए दक्षिण की ओर चले गए।
मनुस्मृति में एक बड़े आर्यावर्त का जिक्र है, वह जमीन जहां काले हिरण घूमते थे। इसमें मालवा का इलाका भी शामिल था। बाद में विष्णु पुराण में हिमालय और समुद्रों के बीच की जमीन का जिक्र मिलता है। इसमें पश्चिमी समुद्र और पूर्वी समुद्र की बात की गई थी। विंध्य पर्वत के नीचे की जमीनों को दूर का या यहां तक कि विदेशी इलाका माना जाता था, जब तक कि ब्राह्मण वहां बस नहीं गए। वे कन्याकुब्ज और काशी को ही अपना मूल घर मानते रहे।
सरस्वती, जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के उत्तर में बहने वाली एक रहस्यमयी नदी थी, वह भी एक और मूल स्थान थी। इसीलिए आज भी दक्षिण भारत में कई मंदिर वाले शहरों को ‘दक्षिण-काशी’ और कई पवित्र नदियों को ‘दक्षिण-गंगा’ कहा जाता है। यह लगभग 2000 साल पहले उत्तर से दक्षिण की ओर विचारों के साफ बदलाव को दिखाता है, यह समय 80 पीढ़ियों के बराबर है, जो कि बहुत लंबा समय है।
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हिंदी को अक्सर एक ऐसी भाषा के रूप में बताया जाता है जिसका जन्म मुगल छावनियों में हुआ था। मानो यह केवल शाही शिविरों की ही बोली रही हो। यह सुनने में तो आकर्षक लगता है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह बात अधूरी है। हिंदी की कहानी इससे कहीं अधिक पुरानी, कहीं अधिक व्यापक और कहीं अधिक बहुआयामी है। यह समझने के लिए कि हिंदी का विकास कैसे हुआ, विद्यार्थियों को न केवल मुगल-कालीन दुनिया पर, बल्कि उत्तरी भारत की प्राचीन इंडो-आर्यन जड़ों और दक्कन क्षेत्र द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका पर भी दृष्टि डालनी होगी। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…
