Devdutt Pattanaik Arts & Culture: (द इंडियन एक्सप्रेस ने UPSC उम्मीदवारों के लिए इतिहास, राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, कला, संस्कृति और विरासत, पर्यावरण, भूगोल, विज्ञान और टेक्नोलॉजी आदि जैसे मुद्दों और कॉन्सेप्ट्स पर अनुभवी लेखकों और स्कॉलर्स द्वारा लिखे गए लेखों की एक नई सीरीज शुरू की है। सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स के साथ पढ़ें और विचार करें और बहुप्रतीक्षित UPSC CSE को पास करने के अपने चांस को बढ़ाएं। पौराणिक कथाओं और संस्कृति में विशेषज्ञता रखने वाले प्रसिद्ध लेखक देवदत्त पटनायक ने अपने इस लेख में बताया क्या यूनानियों ने भारतीय रंगमंच को प्रभावित किया?)

थिएटर का इतिहास अक्सर दो महान शास्त्रीय परंपराओं, पहला प्राचीन ग्रीस का थिएटर और दूसरा प्राचीन भारत का थिएटर के जरिए बताया जाता है। दोनों ही परंपराओं में कहानी कहने, परफॉर्मेंस, संगीत और मानवीय भावनाओं को लेकर बेहतरीन विचार पनपे।

हालांकि ये दोनों स्वतंत्र रूप से विकसित हुईं, लेकिन इनके बीच जुड़ने के कुछ मौके भी आए, खासकर चौथी सदी BCE में उत्तर-पश्चिमी भारत में सिकंदर महान के अभियान के बाद और यूनानियों के आने के बाद। भारतीय थिएटर पर यूनानी प्रभाव कितना था, इस पर विद्वानों के बीच बहस जारी है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ था।

सांस्कृतिक आदान-प्रदान के उदाहरण

इस आदान-प्रदान का सबसे साफ उदाहरण मंच का पर्दा है। संस्कृत थिएटर में पर्दे को ‘यवनिका’ कहा जाता है। यह शब्द ‘यवन’ से बना है, जो प्राचीन भारत में यूनानियों और हेलेनिस्टिक मूल के लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द था। इसलिए, कई इतिहासकारों का मानना ​​है कि मंच के पीछे के हिस्से को अभिनय वाली जगह से अलग करने वाला यह पर्दा शायद यूनानी थिएटर परंपराओं के संपर्क में आने से आया होगा।

खास बात यह है कि गुजराती वैष्णव हवेली संस्कृति में, देवता के पीछे ‘पिछवाई’ नाम का एक बैकड्रॉप होता है जिस पर वृंदावन के दृश्य बने होते हैं। हो सकता है कि इसकी शुरुआत भी थिएटर से हुई हो, क्योंकि देवताओं को ‘रंग-नाथ’ या ‘थिएटर का स्वामी’ माना जाता है जो ‘लीला’ करते हैं।

बैक्ट्रिया और गांधार जैसे इलाकों में इंडो-ग्रीक राज्यों के बनने और व्यापारिक मार्गों के खुलने के बाद इस तरह के आदान-प्रदान के मौके बढ़े। गांधार कला में ग्रीक और भारतीय शैलियों का अद्भुत मेल दिखता है, और हो सकता है कि थिएटर में भी इसी तरह का मेल-जोल रहा हो।

कैथार्सिस और रस: अलग-अलग दार्शनिक लक्ष्य

इन संपर्कों के बावजूद, ग्रीक और भारतीय थिएटर अपने लक्ष्यों और बनावट के मामले में मूल रूप से अलग-अलग रहे। सबसे बड़ा अंतर इस बात में है कि हर परंपरा अपने दर्शकों के मन में क्या हासिल करना चाहती थी।

ग्रीक थिएटर, खासकर अरस्तू की किताब ‘पोएटिक्स’ में बताए गए थिएटर का मकसद ‘कैथार्सिस’ (भावनात्मक शुद्धि) था। दर्शकों से उम्मीद की जाती थी कि वे दया और डर जैसी गहरी भावनाएं महसूस करें और फिर नाटक के अनुभव से भावनात्मक रूप से शुद्ध हो जाएं। इसलिए, ट्रेजेडी (दुखांत नाटक) ग्रीक ड्रामा के सबसे ऊंचे रूपों में से एक थी।

भारतीय थिएटर, जैसा कि ‘नाट्यशास्त्र’ में बताया गया है, ‘रस’ नाम के एक अलग लक्ष्य पर केंद्रित था। ‘रस’ शब्द का असल मतलब है “स्वाद” या “सार”। दर्शकों से उम्मीद की जाती थी कि वे भावनाओं में बहने के बजाय कलात्मक नजरिए से उनका आनंद लें। एक आदर्श दर्शक शांत और तटस्थ होता था, जो भावनात्मक अनुभव की सराहना वैसे ही करता था जैसे कोई अच्छे से बने खाने का स्वाद लेता है। इसका मकसद भावनाओं को बाहर निकालना नहीं, बल्कि कलात्मक आनंद और समझ पाना था।

इस अंतर से पता चलता है कि ग्रीक थिएटर में त्रासदी (दुखांत नाटक) की भूमिका इतनी अहम क्यों है, जबकि क्लासिकल संस्कृत नाटकों में यह लगभग नदारद है। ओडिपस या एगामेम्नन जैसे ग्रीक नायक अक्सर ऐसी तबाही का सामना करते हैं जिसे टाला नहीं जा सकता। उनका पतन ही कहानी का मुख्य मोड़ या चरमोत्कर्ष होता है।

इसके उलट, संस्कृत नाटकों में आमतौर पर दुखद अंत से बचा जाता है। नाट्यशास्त्र में यह सलाह दी गई है कि नाटक के अंत में सामंजस्य और व्यवस्था बहाल होनी चाहिए। भले ही पात्रों को मुश्किलों का सामना करना पड़े, लेकिन अंत में आमतौर पर धर्म, सामाजिक संतुलन और उम्मीद फिर से कायम हो जाती है। ग्रीक थिएटर बेचैनी पैदा करता है और बदलाव की कोशिश करता है। वहीं, भारतीय थिएटर समझ के साथ-साथ आनंद भी देता है।

अलग-अलग तरह की बनावट और कहानी कहने के तरीके

नाटकों की बनावट में भी बहुत अंतर होता है। ग्रीक नाटकों में अक्सर ‘तीन एकता’ (three unities) के नियम का पालन किया जाता है: समय, स्थान और घटना की एकता। इसमें घटनाएँ आमतौर पर कम समय में और एक ही जगह पर होती हैं और एक ही मुख्य कहानी के इर्द-गिर्द घूमती हैं। संस्कृत नाटक कहीं ज़्यादा लचीले होते हैं। एक नाटक कई सालों तक चल सकता है, अलग-अलग राज्यों, जंगलों, स्वर्ग और महलों तक फैल सकता है और कई कहानियों को एक साथ जोड़ सकता है।

एक और अहम अंतर कहानी कहने के तरीके से जुड़ा है। ग्रीक नाटक ‘कोरस’ (chorus) पर बहुत ज़्यादा निर्भर करते हैं। कोरस कलाकारों का एक समूह होता है जो घटनाओं पर टिप्पणी करता है, किरदारों को सलाह देता है और लोगों की राय बताता है। कोरस दर्शकों और नाटक के बीच एक पुल का काम करता है।

संस्कृत नाटकों में आम तौर पर कोरस का इस्तेमाल नहीं होता है। इसके बजाय, इसमें ‘सूत्रधार’ (Sutradhara) या स्टेज मैनेजर-नैरेटर होता है, जो नाटक की शुरुआत करता है और दर्शकों का मार्गदर्शन करता है। कई नाटकों में ‘विदूषक’ (Vidushaka) भी होता है, जो एक मज़ेदार साथी का किरदार निभाता है और हँसी-मज़ाक के साथ-साथ व्यावहारिक बातें भी बताता है।

भाषा के इस्तेमाल से एक और अंतर पता चलता है। ग्रीक नाटक आम तौर पर एक ही साहित्यिक भाषा में खेले जाते थे। लेकिन संस्कृत नाटक जान-बूझकर कई भाषाओं में रचे जाते थे। राजा, ऋषि और देवता आमतौर पर संस्कृत बोलते थे, जबकि औरतें, नौकर, व्यापारी और आम लोग अक्सर प्राकृत के अलग-अलग रूपों का इस्तेमाल करते थे। भाषाओं की यह विविधता प्राचीन भारत की सामाजिक सच्चाई को दिखाती थी और किरदारों को और गहराई देती थी।

जहाँ दोनों परंपराएँ मिलती हैं और अलग होती हैं

फिर भी, दोनों में कुछ खास समानताएँ भी थीं। दोनों परंपराओं में कविता, संगीत, हाव-भाव, वेशभूषा और खास तरह की चाल-ढाल को अहमियत दी जाती थी। किसी का भी मकसद आज के दौर की तरह एकदम असलियत दिखाना नहीं था। कलाकार भावनाओं और विचारों को बताने के लिए तय हाव-भाव और प्रतीकात्मक हरकतों का इस्तेमाल करते थे। थिएटर सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं था; यह शिक्षा, नैतिकता, धर्म और समाज पर सोचने-समझने का एक माध्यम भी था।

कुल मिलाकर, ग्रीक और इंडियन थिएटर में परफॉर्मेंस की कुछ टेक्नीक एक जैसी थीं और हो सकता है कि उन्होंने कल्चरल कॉन्टैक्ट के ज़रिए एक-दूसरे पर असर डाला हो। हालांकि, वे अपने फिलोसोफिकल लक्ष्यों में अलग रहे। ग्रीक थिएटर ने टकराव और ट्रेजेडी के ज़रिए कैथार्सिस की तलाश की, जबकि इंडियन थिएटर ने एस्थेटिक एक्सपीरियंस और इमोशनल बैलेंस के जरिए रस की तलाश की। साथ मिलकर, वे कहानी कहने और परफॉर्मेंस के लिए इंसानी तरीकों की जबरदस्त वैरायटी दिखाते हैं।

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पारंपरिक रूप से, आर्यावर्त या आर्य लोगों की भूमि हिमालय, गंगा और यमुना से घिरी हुई थी। हमें यह जानकारी अशोक के समय के शुरुआती धर्म-शास्त्र ग्रंथों से मिलती है। जहां अशोक के शिलालेखों में जंबूद्वीप की उस भूमि का जिक्र है जिस पर उसका शासन था और बाद में ओडिशा के खारवेल ने भारत को ओडिशा के उत्तर की भूमि बताया, वहीं ब्राह्मण ग्रंथों में आर्यावर्त का जिक्र मिलता रहा। उन्होंने पंजाब क्षेत्र को ब्रह्मवर्त कहा, जो सरस्वती की पुरानी भूमि थी और जहां कभी ऋषि-मुनि रहते थे। आर्यावर्त गंगा नदी घाटी तक ही सीमित था। समय के साथ इसका विस्तार हुआ। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें