इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि 10वीं और 12वीं कक्षाओं के लिए पाठ्यपुस्तकें निर्धारित करने का अधिकार उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद के सचिव के पास है। अदालत ने कहा कि यह अधिकार संबंधित प्राधिकरण के क्षेत्राधिकार में आता है और इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। यह आदेश जस्टिस नीरज तिवारी और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने एम/एस राजीव प्रकाशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए 19 फरवरी को पारित किया।

क्या था पूरा मामला?

एम/एस राजीव प्रकाशन ने बोर्ड सचिव द्वारा जारी आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि उनके प्रकाशन की पुस्तकों को लेकर जारी आदेश उचित नहीं है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षाओं के लिए पाठ्यपुस्तक निर्धारित करना संबंधित प्राधिकरण का वैधानिक अधिकार है। इसलिए बोर्ड सचिव के आदेश में किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

कोर्ट ने क्या कहा?

खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि, पाठ्यपुस्तक निर्धारित करना प्राधिकरण की शक्ति और अधिकार क्षेत्र में आता है। यदि याचिकाकर्ता उत्तर प्रदेश पाठ्यपुस्तक अधिनियम, 1979 (UP Act No. 7 of 1979) या किसी अन्य कानून का उल्लंघन करता है, तो राज्य सरकार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।

लेकिन यदि कोई उल्लंघन नहीं है, तो प्रकाशक को अपनी पुस्तकें प्रकाशित करने या खुले बाजार में बेचने से नहीं रोका जा सकता, भले ही वे परिषद द्वारा निर्धारित किताबें न हों। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किताबें परिषद की पुस्तकों के मानक की नहीं हैं या अधिक कीमत पर बेची जा रही हैं, तो उसका परिणाम प्रकाशक को स्वयं भुगतना होगा।

2014 के फैसले का हवाला

अदालत ने 15 अप्रैल 2014 को दिए गए अपने पूर्व निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान मामला उसी निर्णय से पूरी तरह आच्छादित है। इसी आधार पर याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

फैसले का असर क्या होगा?

10वीं और 12वीं की किताबों को लेकर बोर्ड सचिव की भूमिका और अधिकार स्पष्ट हो गए हैं।

निजी प्रकाशकों को बाजार में किताबें बेचने की स्वतंत्रता है, बशर्ते वे कानून का उल्लंघन न करें।

शिक्षा व्यवस्था में बोर्ड की आधिकारिक पुस्तकों की वैधता और प्राथमिकता बरकरार रहेगी।

यह फैसला शिक्षा जगत और प्रकाशन उद्योग दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।