कल्पना कीजिए… जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं, जब इंसान को किसी सहारे की जरूरत होती है। यह सहारा कोई व्यक्ति हो सकता है, कोई विचार, कोई विश्वास या कोई उद्देश्य। वही आधार, जिसके बल पर हम आगे बढ़ते हैं, आलम्बन कहलाता है। ‘आलम्बन’ केवल सहारा नहीं, बल्कि वह आधार है, जिस पर कोई व्यक्ति, विचार या भावना टिकी होती है।
जनसत्ता.कॉम की ‘सही हिंदी’ मुहिम का उद्देश्य हिंदी भाषा की शुद्धता, सुंदरता और व्याकरणिक समझ को आम पाठकों तक सरल रूप में पहुंचाना है। साथ ही ऐसे शब्दों का प्रयोग, जिनका उपयोग हम प्रतिदिन के जीवन में करते हैं, लेकिन उनके सही अर्थ और सही संदर्भ को लेकर स्पष्टता कम होती है। यह पहल बोले और लिखे जाने वाले शब्दों के सही रूप, अर्थ, उच्चारण और व्याकरण को समझाकर भाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास है। आज की कड़ी का शब्द आलम्बन है।
व्युत्पत्ति: आलम्बन
- आलम्बन संस्कृत मूल का शब्द है।
- आलम्बन: आधार, अवलंब, आश्रय, सहारा।
संस्कृत धातु ‘लम्ब्’ का अर्थ है लटकना, टिकना या सहारा लेना। ‘आ’ उपसर्ग जुड़ने पर बना आलम्ब और उससे आलम्बन शब्द बना, जिसका अर्थ है- वह आधार, जिस पर कोई टिका हो। अर्थात जब कोई व्यक्ति, वस्तु या विचार किसी अन्य का सहारा बनता है या जिस पर कोई वस्तु टिकी होती है, उसे ‘आलम्बन’ कहा जाता है।
शब्द का महत्व
‘आलम्बन’ का प्रयोग केवल भौतिक सहारे के लिए नहीं होता, बल्कि भावनात्मक, वैचारिक और साहित्यिक संदर्भों में भी किया जाता है। हिंदी साहित्य और संस्कृत काव्यशास्त्र में आलम्बन का विशेष महत्व है। रस सिद्धांत में आलम्बन विभाव उस व्यक्ति या वस्तु को कहते हैं, जिसके कारण किसी भाव या रस का उदय होता है।
उदाहरण
- कठिन और संकट के समय में उम्मीद और ईश्वर का विश्वास ही मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा आलम्बन होता है।
- काव्यशास्त्र के अनुसार, किसी भी रस या भावना की निष्पत्ति के लिए एक सशक्त आलम्बन का होना अनिवार्य है।
- गुरु का मार्गदर्शन विद्यार्थियों के लिए आलम्बन सिद्ध हुआ। सत्य ही उसके जीवन का आलम्बन था।
- वृद्धावस्था में माता-पिता के लिए उनकी संतान ही जीवन का एकमात्र आलम्बन होती है।
- किसी भी समाज की प्रगति के लिए शिक्षा और नैतिकता ही सबसे मजबूत आलम्बन हैं।
समानार्थी शब्द
सहारा, आधार, अवलंब, आश्रय, संबल।
अभिप्राय
‘आलम्बन’ सिर्फ सहारे का पर्याय नहीं है, बल्कि यह उस आधार का प्रतीक है, जिसके बल पर व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ता है। साहित्य, दर्शन और जीवन- तीनों में यह शब्द गहरी अर्थवत्ता रखता है। हिंदी की यही विशेषता है- एक शब्द और अर्थ की पूरी दुनिया।

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