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शून्य बजट खेती : क्या है तरीका और कैसी हैं चुनौतियां

दरअसल, शून्य बजट खेती की अवधारणा पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त सुभाष पालेकर की है। हरित क्रांति विरोधी पालेकर हरित क्रांति को पश्चिमी ताकतों के हाथों किसानों की गुलामी बताते हैं।

किसान की प्रतीकात्मक तस्वीर। (Express Photo)

इस बार बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, ‘हम एक विषय पर पुराने तौर-तरीके अपनाएंगे : शून्य बजट खेती। यह कदम वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने में कामयाब रहेगा।’ इससे पहले अप्रैल में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने शून्य बजट प्राकृतिक खेती को लेकर बड़ा आलेख लिखा, जिसमें उन्होंने बताया कि यह पर्यावरण और किसानों की हालत सुधारने के लिए अनोखा और सिद्ध समाधान है।

कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत में शून्य बजट खेती के तौर तरीके गांवों में पहले देखने सुनने में आते थे। लेकिन रासायनिक खेती के मकड़जाल में वह अवधारणा लुप्त होने लगी थी। विकल्प के तौर पर जैविक खेती समेत पर्यावरण हितैषी खेती के कई तौर तरीके सामने आए। मसलन, शाश्वत कृषि, सावयव कृषि, सजीव खेती, सांद्रिय खेती, पंचगव्य, दशगव्य कृषि तथा नडेप कृषि आदि। ऐसे में सवाल पूछे जाने लगे हैं कि यह शून्य बजट खेती क्या है और इससे किसान को कैसे लाभ होगा? कहीं यह महज घोषणा भर तो नहीं होगी।

दरअसल, शून्य बजट खेती की अवधारणा पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त सुभाष पालेकर की है। हरित क्रांति विरोधी पालेकर हरित क्रांति को पश्चिमी ताकतों के हाथों किसानों की गुलामी बताते हैं। उनका आरोप है कि हरित क्रांति ने कैंसर, एड्स, डायबिटीज और दिल का दौरा जैसी गंभीर बीमारियों को बढ़ावा दिया है। उनका मानना है कि पौधों को बाहरी मदद की जरूरत नहीं है। अगर जरूरी जीवाणुओं को बढ़ावा दिया जाए, तो पौधे अपनी सारी जरूरतें अपनी जड़ों से पूरा कर लेते हैं। जीरो बजट प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर एवं गोमूत्र पर आधारित है। एक देसी गाय के गोबर एवं गोमूत्र से एक किसान तीस एकड़ जमीन पर शून्य बजट खेती कर सकता है। देसी प्रजाति के गोवंश के गोबर एवं मूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत तथा जामन बीजामृत बनाया जाता है।

इनका खेत में उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार होता है। जीवामृत का महीने में एक अथवा दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है। जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। फसलों की सिंचाई के लिए पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस फीसद ही खर्च होती है। गाय से प्राप्त सप्ताह भर के गोबर एवं गोमूत्र से निर्मित घोल का छिड़काव खाद का काम करता है। इसके इस्तेमाल से एक ओर जहां गुणवत्तापूर्ण उपज होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत लगभग शून्य रहती है। राजस्थान में सीकर जिले के एक प्रयोगधर्मी किसान कानसिंह कटराथल ने अपने खेत में प्राकृतिक खेती कर सफलता हासिल की है।

सुभाष पालेकर के मुताबिक, 15 साल के गहन अनुसंधान के बाद उन्होंने एक पद्धति विकसित की थी, जिसको शून्य लागत प्राकृतिक कृषि का नाम दिया। इस पद्धति को प्रचार-प्रसार के लिए वह किसानों को प्रशिक्षण देने लगे। वे प्रशिक्षण देने सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी गए। सुभाष पालेकर के इस योगदान पर वर्ष 2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान दिया। आंध्रप्रदेश की चंद्रबाबू नायडू सरकार ने उन्हें अपने राज्य का कृषि सलाहकार बनाया। साथ ही शून्य लागत प्राकृतिक कृषि विश्वविद्यालय बनाने की भी घोषणा की। सुभाष पालेकर द्वारा विकसित भू-पोषक द्रव्य जीवामृत पर आइआइटी दिल्ली के छात्र शोध कर रहे हैं। शून्य बजट खेती कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और अन्य दक्षिण भारत राज्य में काफी प्रसिद्ध हो रहा है।

सुभाष पालेकर का दावा है कि सिर्फ देसी गाय का गोबर उपयोगी है, जर्सी या होल्सटीन गाय का नहीं। 30 एकड़ जमीन के लिए सिर्फ एक गाय का गोबर चाहिए। काले रंग की कपिला गाय का गोबर और मूत्र सबसे फायदेमंद है। गोबर ताजा होना चाहिए, और मूत्र जितना पुराना हो, उतना बेहतर। एक ग्राम गाय के गोबर में 300 करोड़ जीवाणु होते हैं। फर्मेंटेशन के बाद उनकी संख्या में 300 गुना बढ़ोतरी होती है।

आलोचना के सुर

नीति आयोग के सदस्य रमेश चन्द ने कहा, ‘हरित क्रांति कामयाब रही, हम हरित क्रांति की आलोचना करते हैं। देश की आबादी 1971 में 66 करोड़ से बढ़कर 130 करोड़ हो गई। फिर भी अनाज उत्पादन एक किलो प्रति व्यक्ति से बढ़कर 1.74 किलो तक है। मेरा मानना है कि रसायन-मुक्त कृषि हमारे अनुकूल नहीं है। इससे उपज घटेगी। बेशक हम खेती में कम रसायन का उपयोग कर सकते हैं।’

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