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कहानीः पीले पत्ते

राजेश्वर की नींद तो न जाने कब की खुल चुकी थी। खिड़की का परदा सरका कर देखा तो बाहर अंधेरा था। आ कर फिर बिस्तर पर लेट गए। लेकिन, नींद नही आ रही थी।

Author March 13, 2016 01:41 am

राजेश्वर की नींद तो न जाने कब की खुल चुकी थी। खिड़की का परदा सरका कर देखा तो बाहर अंधेरा था। आ कर फिर बिस्तर पर लेट गए। लेकिन, नींद नही आ रही थी। बिस्तर पर उन्हें कमरे के अंधकार में भी खुली आंखों से जैसे सब कुछ दिख रहा था। कमरे में चलते पंखे, दीवारों पर टंगे कैलेंडर, दवाइयों की मेज, कोने में रखी आलमारी…सब कुछ। नींद न आने के कारण बार-बार करवट बदलने से बार्इं तरफ लेटी उनकी पत्नी संध्या जग गयीं। संध्या देवी ने अंधेरे में ही टटोल कर उनके हाथों को स्पर्श करते हुए पूछा-जग गए क्या?
-हां, लेकिन बाहर अंधेरा है।
वह अपनी पत्नी को बता देना चाह रहे थे कि वे उठ कर बाहर की आहट ले चुके हैं।
राजेश्वर और उनकी पत्नी की सुबह ऐसी ही होती है। दोनों छह बजे बिस्तर छोड़ देते हैं। संध्या देवी रसोई के कार्यों में व्यस्त हो जाती हैं। राजेश्वर गेट से बाहर झांक कर आस-पास का जायजा लेने के बाद गेट पर पड़ा अखबार उठा कर एक तरफ रख कर गमले में पानी डालने लगते हैं। यही इन दोनों की दिनचर्या है। इस घर में यही दो लोग हैं।
राजेश्वर दो वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त हो चुके हैं। नौकरी में रहते हुए ही उन्होंने यह घर बनवाया था। बनवाते समय इस बात का ध्यान रखा कि दोनों बच्चों के रहने के लिए घर में पर्याप्त स्थान और सुविधा रहे। पढ़ने का कक्ष, शयन कक्ष, बैठक आदि हर सुविधा से युक्त अपेक्षाकृत बड़ा घर बनवाया। उनके दो बच्चे हैं। बड़ी बेटी अक्षिता का विवाह हो चुका है। वह अपनी घर गृहस्थी में रम गई है। अक्षिता के दो बच्चे हैं। बच्चे छोटे हैं इस कारण वह यहां कम आ पाती है। राजेश्वर को स्मरण हैं वे दिन जब अक्षिता की शिक्षा पूरी ही हुई थी और वे उसके लिए योग्य वर की तलाश करने लग गए थे। उन दिनों राजेश्वर और उनकी पत्नी की यही इच्छा होती थी कि शीघ्र ही कोई योग्य लड़का मिले और शीघ्र ही वे अक्षिता का विवाह कर दें। उन दिनों प्रतिदिन वे अक्षिता के विवाह की चर्चा और चिंता करते।…और एक दिन वह समय भी आया जब अक्षिता का विवाह हो गया। प्रारंभ में वह उन लोगों से मिलने खूब आया करती थी। धीरे-धीरे समय व्यतीत होने के साथ ही साथ वह अपनी घर गृहस्थी में व्यस्त होती गई और उसका आना- जाना कम होता गया।
राजेश्वर और उनकी पत्नी संध्या को पुत्री के विवाह के दायित्व से मुक्त हो जाने की प्रसन्नता तो थी, लेकिन पुत्री से विछोह की पीड़ा की अनुभूति प्रसन्नता से कहीं अधिक लगी। उनका पुत्र अक्षय दो वर्ष छोटा है अक्षिता से। बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह बाहर गया तो जैसे बाहर का ही हो कर रह गया। वापस घर नही आया। उसे नौकरी भी मिली तो दूसरे शहर में। घर वह कभी-कभी ही आ पाता है।
अक्षय का विवाह अभी नही हुआ है। खाली क्षणों में उसके विवाह की चर्चा संध्या देवी और राजेश्वर के लिए एक महत्त्वपूर्ण विषय हो जाता है। खाली क्षणों की उनके जीवन में कोई कमी नही है, इसलिए यह चर्चा भी खूब होती है। आज लॉन के गमलों में पानी डालने के बाद घर के अंदर आते ही राजेश्वर ने सामने रसोई में संध्या को चाय बनाते देख पूछा, ‘आज खाने में क्या बनाओगी?’ संध्या जानती हैं कि इस प्रकार के निरर्थक-से प्रश्न पूछना राजेश्वर के स्वभाव में है। वह यह भी जानती हैं कि अभी यह खाना नहीं खाने वाले हैं। अभी यह चाय पीएंगे, नहाना-धोना करेंगे…देर तक अखबार पढ़ेंगे…इन सबमें पर्याप्त समय लगाएंगे। तब तक संध्या अपनी काम वाली के साथ खाना बना कर अन्य सारे कार्य भी समाप्त कर लेंगी, लेकिन राजेश्वर फिर भी खाने के लिए उपलब्ध नहीं होंगे। वह जानती हैं कि सात बजे ही खाने आदि की चर्चा करना खाली समय में व्यस्तता भरने की उनकी नाकाम कोशिश है। प्रयत्न चाहे वह जो भी कर लें उनके पास समय की कोई कमी नही है। व्यस्तता भरने के इस प्रयत्न में उनके प्रश्न बेमौसमी फल, सब्जियों की भांति उनके पास आते रहते हैं जो गुणवत्ता विहीन होते हैं। संध्या देवी उनके इन प्रश्नों की अभ्यस्त हो गई हैं।
राजेश्वर और संध्या के साथ पिछले दो साल से उनके बच्चे नहीं आए हैं। दोनों ही इस बड़े से घर की चीजों के साथ रह रहे हैं। दिन तो कुछ सार्थक और कुछ निरर्थक बातों में व्यतीत हो जाता है। लेकिन शाम काटने को आ जाती है। करवटें बदलते-बदलते रात व्यतीत हो जाती है। आजकल मौसम भी कैसा रूखा-सूखा हो रहा है। सर्दियां समाप्त हाने वाली हैं। मार्च का महीना प्रारंभ हो चुका है। दिन का मौसम सामान्य रहता ह, लेकिन रात्रि में अब भी ठंड विद्यमान है। राजेश्वर रात्रि में कई बार उठ-उठ कर संध्या का हाल लेते हैं कि कहीं उन्हें ठंड तो नहीं लग रही है। संध्या के मना करने के बावजूद भी वह उन्हें कंबल से ढंकते रहते हैं यह सोच कर कि कहीं उन्हें इस परिवर्तित होते ऋतु में ठंड न लग जाए। वैसे भी उम्र के इस पड़ाव पर जब कि शरीर थक गया रहता है, बीमारियां शरीर में आसानी से स्थान बना लेती हैं। संध्या देवी की थोड़ी सी अस्वस्थता भी उन्हें व्याकुल कर देती है। उस पर से डॉक्टर के यहां की भागदौड़ उन्हें अनावश्यक रूप से थकाने वाली लगती है।
उनकी यही इच्छा होती है कि संध्या देवी कभी अस्वस्थ ही न हों लेकिन यह कहां संभव हो पाता है? पूरी सर्दियां घुटने के दर्द और सांस फूलने की समस्या से पीड़ित रहीं। दवाइयां तो जैसे साथ ही नही छोड़तीं। सगे-संबंधियों से अधिक अपनापा दिखाती हैं। घर के कार्यों की व्यस्तता के कारण या आलस्यवश अगर कभी उन्हे दवाइंयां लेने का स्मरण नहीं रहता तो राजेश्वर उन्हें स्मरण दिला कर दवाइयां देना नहीं भूलते।
सर्दियां समाप्त होने वाली हैं। ऋतुएं परिवर्तित हो रही हैं। वसंत का आगमन होने वाला है। नव-पुष्प, नव-पल्लव….। राजेश्वर को शीत ऋतु भाती नहीं है। कारण…? कारण यह कि शीत ऋतु में व्याधियों में वृद्धि हो जाती है और उनकी और संध्या देवी की सुबह की सैर भी बंद हो जाती है। कोहरे में बाहर निकलने से संध्या देवी की सांसों की समस्या बढ़ जाती है। यही कारण है कि राजेश्वर वसंत ऋतु के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जब वह और संध्या कुछ देर के लिए इस बंद घर से बाहर निकलेंगे…खुली हवा में। वैसे उन्होंने सुन रखा है कि युवा बच्चों को जाड़े की ऋतु अच्छी लगती है। क्यों….? यह उन्हें ज्ञात नहीं।
आज सुबह ठंडक कुछ कम थी। राजेश्वर संध्या के साथ भ्रमण पर निकल पड़े। घर के समीप स्थित पार्क में कुछ देर टहलने के बाद वह और संध्या कुछ देर के लिए एक बेंच पर बैठ गए। संध्या थक गई थी। थक तो राजेश्वर भी गए थे। पार्क में थोड़ी चहल-पहल थी। ठंडक कम होने के कारण सुबह भ्रमण करने वाले घर से बाहर निकलने लगे थे। यों तो वसंत ऋतु के आगमन के चिह्नन प्रकृति में दिखाई देने लगे हैं।

पार्क की जमीन पर कालीन सी बिछी नर्म मुलायम हरी दूब, ढाक, पलाश, बुरूंश, गुलमोहर, अमलतास के कतारबद्ध वृक्ष नव-पल्लवों, नव-पुष्पों से सुशोभित हो इतरा-लहरा रहे थे। अनेक प्रकार के पक्षियों के कलरव हवाओं में ऐसे से गूंज रहे थे जैसे वे वसंत गीत गा रहे हों। राजेश्वर ने देखा कि पार्क के एक कोने में कुछ बच्चे खेलने में मग्न थे। यह मौसम का प्रभाव था या सुकून भरे फुर्सत के कुछ पलों का। बड़ी देर तक चुप रहने के बाद राजेश्वर अचानक बोल पड़े- संध्या! तुमने इस बात पर गौर किया है कि पार्क में टहलने वालों में हम जैसे वृ़़द्ध लोगों की संख्या अधिक है।
संध्या समझ गर्इं कि राजेश्वर आज कुछ हास-परिहास के मूड में हैं। वह भी बोल पड़ीं – माना कि वृद्ध अधिक हैं तो क्या…? कुछ युवा भी तो हैं। वह देखो! उस तरफ… छोटे-छोटे बच्चे कैसे गेंदों खेल रहे हैं।
राजेश्वर भी आज पूरी तरह हास्य के मूड में थे। उन्होंने संध्या की ओर देखते हुए कहा-युवा तो शरीर को अर्कषक बनाने के लिए दौड़ रहे हैं…परिश्रम कर रहे है लेकिन वृद्ध तो अस्वस्थतावश विवश हो कर भ्रमण पर निकले हैं।
कुछ क्षण रुककर संध्या की तरफ देख कर वह फिर बोले-जैसे हम!
संध्या की भी आज चुप होने की इच्छा नही थीं। वह बोल पड़ीं-नहीं! ऐसा नहीं है। उस तरफ बच्चे भी तो हैं। जो सैर का आनंद ले रहे हैं। बच्चे तो स्वास्थ्य, व्याधि, आर्कषण जैसी गूढ़ बातों से परे हैं।
राजेश्वर ने बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा-देखो! वृक्षों पर पक्षी कैसे कलरव कर रहे हैं? शीत ऋतु हमने घर में रह कर व्यतीत कर दी। उन दिनों में न तो हमें सुंदर पक्षी दिखाई दिए, न तो उनकी चहचहाहट सुनाई दी। इस खुले वातावरण में सब कुछ है।
संध्या असहमति के स्वर छोड़ उनके समर्थन में बोल पड़ीं-हां! वह देखो…वृक्षों पर नई कोपलें, नए पत्ते निकलने लगे हैं। हरी दूब में से निकलती नन्ही मुलायम…छोटी दूब। कितना मखमली स्पर्श है इनका! सब कुछ नवीन-सा है। वृक्षों पर नई कलियां, नए बौर भी तो आने वाले हैं। कह कर संध्या चुप हो गर्इं।
हां! वसंत ऋतु आने वाली है- राजेश्वर ने बातों का तारतम्य आगे बढ़ाते हुए कहा।
लेकिन उससे पहले पतझर होता है-संध्या ने कहा।
पुराने पत्ते गिर जाएंगे और उनके स्थान पर नए पत्तों से वृक्ष लहलहा उठेंगे। राजेश्वर ने संध्या का समर्थन करते हुए कहा।
राजेश्वर ने संध्या की तरफ देखा। धीरे-धीरे संध्या के चेहरे पर फैल रहे विषाद के भाव उनकी नजर से छिपे न रह सके। वह चुप हो गए। उन्हें यह अनुभूति होने लगी कि बातें प्रकृति से होती हुई गहन जीवन दर्शन की तरफ मुड़ रही हैं। वह जानते हैं कि संध्या एक धीर-गम्भीर स्त्री हैं।
उन्होंने कहो-चलो अब चाय पीने की इच्छा हो रही है। घर चलें।
वह यह भी जानते हैं कि पुराने पत्ते गिरते हैं, तो नए पत्ते उनका स्थान लेते हैं। लेकिन आज प्रकृति के सानिध्य में बैठ कर मानो विस्मृत हो चुका यह पाठ उन्होंने फिर पढ़ डाला हो। वे दोनों घर की तरफ चल पड़े हैं धीरे…धीरे… ०

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