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नृत्यः कलाओं का आमूर्त संसार

संस्कृति मंत्रालय और संगीत नाटक अकादमी अमूर्त सांस्कृतिक व कला धरोहर का संरक्षण कर रहे हैं। यूनेस्को मानता है कि संगीत, नृत्य और नाट्य के विविध आयामों के अलावा, हस्तकला, रीति-रिवाज और उत्सव के गीत अमूल्य धरोहर हैं

(File Photo)

संस्कृति मंत्रालय और संगीत नाटक अकादमी अमूर्त सांस्कृतिक व कला धरोहर का संरक्षण कर रहे हैं। यूनेस्को मानता है कि संगीत, नृत्य और नाट्य के विविध आयामों के अलावा, हस्तकला, रीति-रिवाज और उत्सव के गीत अमूल्य धरोहर हैं। इन अमूर्त सांस्कृतिक परंपराओं और धरोहरों के संरक्षण व संवर्द्धन की जरूरत है। इसी के मद्देनजर पिछले दिनों अमूर्त धरोहर उत्सव मेघदूत थिएटर में आयोजित किया गया।

इस उत्सव के दौरान जुगल किशोर मिश्र ने यजुर्वेद और ऋशिराज पाठक ने सामवेद के श्लोकों और श्रुतियों का पाठ व गायन किया। समारोह की पहली शाम ट्रांस हिमालय लद्दाख क्षेत्र के बौद्ध भिक्षुओं ने त्रिरत्न बुद्ध, संघ और धर्म पर आधारित संगीत व नृत्य प्रस्तुत किया। उन्होंने वज्रयान परंपरा में दोरजी, दिल्बो, दुंग और रोल्मो पेश किया। भिक्षुओं के बाएं हाथ में करुणा का प्रतीक लाल कपाल और दाहिने हाथ में पांच अहंकार को नाश करने वाला ड्रैगन प्रतीक रूप में था। इन भिक्षुओं का पद व हस्त संचालन का तालमेल सुंदर था।

उत्सव में मणिपुर का नट संकीर्तन -बसक इशी- प्रस्तुत किया गया। इसे यूलेम्बम गंभिनि देवी और साथी कलाकारों ने पेश किया। भगवान कृष्ण के जीवन और लीलाओं को बसक इशी में पेश किया जाता है। इस पेशकश में राधा को वासकसज्जा नायिका के तौर पर दर्शाया गया। नायिका राधा किशोर कुंज में फूलों की सज्जा करके जाती है।

अगली पेशकश कूटियाट्टम थी। इसे पोथिइल गुरुकुलम के कलाकारों ने पेश किया। उन्होंने नृत्य नाटिका तोरणायुधम प्रस्तुत किया। यह भास की कृति -अभिशेकनाटक का एक अंश था। इस प्रस्तुति में रावण और योद्धा शंकुकर्ण के संवाद को चित्रित किया गया। शंकुकर्ण रावण को बताते हैं कि एक वानर ने अशोक वन को उजाड़ दिया है। यह सुनते रावण क्रोधित हो जाता है। रामायण के इस प्रसंग को श्लोक युधि जगत्राया भीति कृतोपिमे के जरिए कलाकारों ने व्याख्यायित किया। इसमें शिरकत करने वाले कलाकार थे-पीएन चक्यार और कलामंडलम चारू अगरू।

उत्सव की दूसरी संध्या में राजस्थान की लोकनर्तकी गुलाबो देवी व साथियों ने कालबेलिया नृत्य पेश किया। जबकि, उत्सव की अंतिम संध्या में छऊ नृत्य की सम्मोहक प्रस्तुति थी। सरायकेला छऊ शैली में भूपति मनोरंजन और चंद्रभागा की कहानी पेश की गई। भूपति मनोरंजन चौदह मात्रा के ताल में निबद्ध थी। यह राजा के मनोरंजन के लिए किया जाता है। इस पेशकश में नर्तकों ने फरसा, तीर व कमान लेकर लयात्मक अंग व पद संचालन पेश किया। इसमें शिरकत करने वाले कलाकार थे-विश्वनाथ, कुणा, अविनाश और चंद्रनारायण।

दूसरी प्रस्तुति में नायिका चंद्रभागा के सौंदर्य को देख कर सूर्य देवता आकर्षित होते हैं। वह उसकी ओर जाते हैं पर चंद्रभागा समुद्र में समाहित हो जाती है। यह देख कर सूर्य को संताप होता है। इस कथा को सुकांत आचार्य और सतीश मोदक ने मोहक अंदाज में पेश किया। यह नृत्य राग पीलू व कलावती और आठ मात्रा के ताल में निबद्ध था। मयूरभंज छऊ शैली में चक्रव्यूह नृत्य रचना पेश की गई। इसक परिकल्पना गुरु सदाशिव प्रधान ने की थी। पुरुलिया शैली में दक्ष यज्ञ के प्रसंग को कलाकारों ने पेश किया। यह हेम सिंह महतो की नृत्य रचना थी।

समारोह स्थल पर केरल की नृत्य नाटिका मेडियेट्ट की प्रस्तुति खास रही। इस प्रस्तुति में नारद, शिव व इंद्र के संवाद और राक्षस धरिकान के वध प्रसंग का चित्रण था। इसमें देवी कालिका की विशेष शक्ति को दर्शाया गया। इसके लिए कलाकारों ने देवी काली के चित्र को जमीन पर उकेरा। इस चित्रण को कलम मयक्कल कहा जाता है। कलाकार इसे अपने हाथों से हल्दी, कुमकुम व चावल के आटे से बनाते हैं। यह नृत्य नाटिका सात दृश्यों में विभाजित थी।

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