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संपादकीयः चिंता की दर

कांग्रेस ने एक बार फिर देश की अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को लेकर सरकार पर हमला बोला है।
Author October 13, 2017 01:51 am

कांग्रेस ने एक बार फिर देश की अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को लेकर सरकार पर हमला बोला है। फिर से इस मामले के तूल पकड़ने की वजह भारत की आर्थिक वृद्धि दर के बारे में विश्व बैंक का ताजा अनुमान है। विश्व बैंक के मुताबिक 2017 में भारत की वृद्धि दर सात फीसद रह सकती है, जो कि 2015 में 8.6 फीसद थी। वृद्धि दर में गिरावट आने के दो प्रमुख कारण विश्व बैंक ने बताए हैं। एक, नोटबंदी। और दूसरा, जीएसटी। यह अनुमान भला राजग सरकार के गले कैसे उतर सकता है, जबकि नोटबंदी और जीएसटी को वह अपनी शानदार उपलब्धियां और साहसिक कदम बताती रही है? इसलिए हैरानी की बात नहीं कि विश्व बैंक की तरफ से आए ताजा अनुमान को प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य डॉ राथिन राय ने सिरे से खारिज कर दिया है। लेकिन इस तरह नकारने से क्या मौजूदा और निकट भविष्य में उभरने वाली तस्वीर गायब हो जाएगी? पहले विश्व बैंक का अनुमान था कि 2017 में भारत की वृद्धि दर 7.2 फीसद रहेगी। अब उसने अपने पहले के अनुमान को घटा दिया है, तो यह अकारण नहीं होगा। यह भी गौरतलब है कि पहले के मुकाबले भारत की वृद्धि दर का कमतर अनुमान पेश करने में विश्व बैंक अकेला नहीं है।

इससे पहले चालू वित्तवर्ष के लिए भारत की वृद्धि दर का अपना अनुमान अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष भी घटा चुका है। इसी तरह एशियाई विकास बैंक ने भी भारत की बाबत अपने आकलन में कटौती की है। और तो और, पहले हमारे रिजर्व बैंक का अनुमान था कि चालू वित्तवर्ष में विकास दर 7.3 फीसद रहेगी, पर बाद में उसने इस अनुमान को घटा कर 6.7 फीसद कर दिया। क्या इतने सारे प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थानों के अनुमान को खारिज किया जा सकता है? इसलिए हकीकत को झुठलाने या उससे कतराने के बजाय सरकार को उसका सामना करने की तैयारी दिखानी चाहिए। वृद्धि दर में कमी आने के साथ ही दूसरी बड़ी चिंता रोजगार को लेकर उभरी है। अर्थव्यवस्था के कई प्रमुख क्षेत्रों में ठहराव ने रोजगार के मोर्चे पर हालत खस्ता कर दी है। नीति आयोग के सदस्य और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबराय का कहना है कि देश में रोजगार के बारे में कोई सटीक आंकड़ा नहीं है। पर यह किसी से छिपा नहीं है कि रोजगार के मोर्चे पर हालात चिंताजनक हैं। क्यों न हों, ज्यादा रोजगार मुहैया कराने वाले रीयलिटी सेक्टर से लेकर मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र तक, सब तरफ सुस्ती का आलम है। कृषिक्षेत्र तो बरसों से गहरे संकट में है ही।

विश्व बैंक ने कहा है कि जीएसटी के बाद मैन्युफैक्चरिंग और सेवाएं काफी बड़े स्तर पर प्रभावित हुई हैं और इनमें काफी कमी आई है। नोटबंदी के बाद हालात सामान्य होने के लिए प्रधानमंत्री ने पचास दिनों का वक्त मांगा था। पर सब जानते हैं कि हालात उसके बाद भी सामान्य नहीं हो पाए थे, और इसके चलते किसानों से लेकर छोटे-मझोले कारोबारियों तथा उनसे जुड़े मजदूरों को महीनों तक बहुत परेशानी उठानी पड़ी, उनका काम-धंधा मंदा पड़ गया। वे संभल भी नहीं पाए कि आधी-अधूरी तैयारियों के साथ तथा जटिल स्वरूप में जीएसटी लागू कर दिया गया। लिहाजा, जिस जीएसटी से आर्थिक वृद्धि में तेजी आने की उम्मीद की गई थी, वह फिलहाल ठहराव का सबब बना हुआ है। इसलिए सरकार अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकती।

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  1. s
    siraj_3636@yahoo.co.in
    Oct 13, 2017 at 12:09 pm
    Only BJP is correct 🤣🤣🤣🤣😂😂😂🤣🤣🤣
    (0)(0)
    Reply