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विकल्प की व्यथा

2014 में वाराणसी संसदीय सीट से प्रधानमंत्री पद के मजबूत दावेदार के खिलाफ आम आदमी पार्टी के अगुआ अरविंद केजरीवाल खड़े हुए थे। तब जबकि भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ नहीं आई थी और देश में विकल्प-राग नहीं उठा था केजरीवाल ने प्रतिरोध की अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। पांच साल बाद 2019 में महागठबंधन एक साधारण उम्मीदवार को प्रधानमंत्री के सामने खड़ा कर देता है। तभी उसे सोशल मीडिया पर वायरल हुए सेना से बर्खास्त जवान तेज बहादुर के प्रतिरोध की आवाज सुनाई पड़ती है और वायरल बुखार की पीड़ा में तेजबहादुर यादव को अपना टिकट देता है। मायावती, मुलायम, प्रियंका जैसे चेहरों के बीच विपक्ष तेज बहादुर का सहारा क्यों लेता है? तेज बहादुर तो अपने प्रतिरोध की आवाज उठाने में कामयाब रहे लेकिन विपक्ष के रवैए ने जो विकल्प-वध किया है उस पर बेबाक बोल।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए सेना से बर्खास्त जवान तेज बहादुर।

बुतखाना नया है न खुदाखाना नया है
जज्बा है अकीदत का जो रोजाना नया है…
काशी का मुसलमां है ‘नजीर’ उससे भी मिलिये
उसका भी इक अंदाज फकीराना नया है…

एक बार किसी ने सवाल पूछा कि हिंदुस्तान में ज्यादातर वित्त मंत्री अंग्रेजी में बजट पेश करते हैं लेकिन बीच में उर्दू शायरी क्यों सुनाते हैं। ज्यादातर जज अपना फैसला अंग्रेजी में लिखते हैं लेकिन फैसला सुनाते वक्त उर्दू के शेर पर क्यों आते हैं। और अगर हम इश्क में हों तो फिर हमारी जुबां पर उर्दू और शेरो-शायरी क्यों उतर जाती है। चुनावी पाठ में हाल-ए-बनारस देखने के बाद समझ आया कि उर्दू के अशआर में वह कूबत है कि चंद लाइनों में फलसफा समा जाता है। जमीनी सच जब खौफनाक दिखता है तो आप पर रुहानी इश्क तारी हो जाता है। हम देखेंगे वो दिन की जिसका वादा था कहने वालों ने ऐसी वादाखिलाफी की कि लौह-ए-अजल आने पर उम्मीदों का पहाड़ रुई के फाहों की तरह उड़ गया। उत्तर प्रदेश और वाराणसी वह जगह है जिसने 2014 में इतिहास रचा था। उस इतिहास के बाद से ही एक जंग शुरू हुई, जिसका खूबसूरत सा नाम विकल्प दिया गया। अब जिस सीट पर प्रधानमंत्री का पर्चा भरा जाना तय था, वहां इन विकल्प वालों की तैयारी क्या थी? एक चेहरा तो पांच साल से तय था और विपक्ष के एक चेहरे को इंदिरा गांधी द्वितीय का खिताब पहना कर उतारा गया था। वहां पर उस नए चेहरे की उम्मीदवारी की हवा भी बनाई गई। विकल्प के उम्मीद वालों ने ताली भी बजाई। लेकिन यह वैसी ताली साबित हुई जो अपने ही हाथों में चोट और कानों में शोर करे। प्रियंका गांधी वाड्रा को वाराणसी सीट से नहीं उतारा गया। चलिए, कांग्रेस की मजबूरी समझी जा सकती है कि वह अपने तुरुप के पत्ते को इस तरह जाया नहीं कर सकती थी। लेकिन विकल्प के लिए टक्कर देने वाले महागठबंधन का क्या रवैया रहा?

वाराणसी की सीट पर महागठबंधन की तरफ से शालिनी यादव के नाम का एलान होता है। यह कोई बहुत मजबूत और जमीनी नाम नहीं था, और इस नाम के साथ ही समझ आ गया कि जंग-ए-विकल्प का जज्बा कैसा है। तभी सेना से बर्खास्त जवान तेज बहादुर की आवाज सुनाई देती है जिसने वाराणसी से पर्चा भरा था। यह उनके प्रतिरोध का तरीका था और जनता उनके जज्बे को सराह भी रही थी। आम चुनावों में पहले भी ऐसा होता रहा है कि सत्ता के सामने प्रतिरोध की शक्ति ने आवाज बुलंद की। तभी महागठबंधन ने शालिनी यादव को पीछे कर तेज बहादुर यादव को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। नामांकन दस्तावेजों में तकनीकी गलतियां बताकर तेज बहादुर यादव का नामांकन रद्द कर दिया गया। मुद्दा तेज बहादुर के नामांकन रद्द होने का नहीं, विपक्ष की नीयत का है। आखिर लोकसभा चुनाव में किसको, किस आधार पर टिकट दिया जाए। तेज बहादुर ने सेना के भ्रष्टाचार पर आरोप लगाए और लोकप्रिय हुए। इसके अलावा उनकी राज और समाज की समझ कितनी है यह उनकी फेसबुक की पुरानी पोस्ट से समझा ही जा सकता है। उनका बनारस की जमीन और वहां की जनता से कोई नाता भी नहीं था। वे प्रतिरोध दर्ज करने के मकसद से चुनावी मैदान में उतरे और इसमें कामयाब भी हुए। तेज बहादुर तो कामयाब रहे लेकिन महागठबंधन फेल हो गया। सबसे मजबूत सीट का प्रत्याशी सोशल मीडिया पर वायरल मुद्दों से नहीं चुना जाता। विपक्ष का यह कदम प्रधानमंत्री के कद के आगे उसका समर्पण ही था। ऐसा कर न सिर्फ उसने तेज बहादुर के प्रतिरोध की बल्कि विकल्प के उम्मीद की भ्रूण-हत्या कर दी।

देश के राजनीतिक नक्शे पर केंद्रीय स्तर पर महागठबंधन जैसी कोई चीज संभव दिख भी नहीं रही थी। और, इस सच्चाई को स्वीकारना बहुत मुश्किल नहीं था। भाजपा और कांग्रेस को छोड़ दें तो अब कुछ ही दल वैसे हैं जो अखिल भारतीय स्तर पर चुनाव लड़ने की ताकत रखते हैं। बसपा और वामपंथी दलों के अलावा ज्यादातर अपने क्षेत्र में सिमटे हैं। इसलिए इनके बीच राष्टÑीय स्तर पर गठबंधन की उम्मीद ही बेमानी थी। चूंकि मुख्य ताकत के तौर पर कांग्रेस और भाजपा दो ही दल हैं तो दूसरा विकल्प यही था कि अपने-अपने स्तर पर क्षेत्रीय गठबंधनों की जिम्मेदारी ये दोनों लें। कांग्रेस के पास इतनी ताकत नहीं थी कि प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के साथ वह कोई राजनीतिक समझौता कर सके। खासकर तब जब हर क्षेत्रीय क्षत्रप का यही सपना है कि वह भी प्रधानमंत्री बन सकता है। कांग्रेस ने कर्नाटक मॉडल लागू कर समर्पण भी कर दिया था। कर्नाटक विधानसभा चुनाव तक कांग्रेस का यही संकेत था कि हम 2024 के लिए लड़ रहे हैं। 2014 में भाजपा को भी अंदाजा नहीं था कि उसे ऐसा प्रचंड बहुमत मिलेगा कि वह अपने दम पर केंद्र की सरकार बना लेगी। इतनी मजबूत स्थिति में रहने के बाद भी भाजपा ने अपने गठबंधन के दलों के सामने थोड़ा झुकने से परहेज नहीं किया। जब सामने लक्ष्य बड़ा था तो छोटे लाभ का मोह छोड़ दिया।
एक मजबूत सरकार को लेकर विपक्ष की रणनीति क्या रही। उसकी भाषा रही इसका विरोध या उसे हटाओ। रोजी-रोटी की समस्या पर तो विपक्ष भी बगलें ही झांक रहा था। अगर सरकार जमीनी योजनाओं पर नाकाम है और लोग गुस्से में हैं तो क्या विपक्ष उस गुस्से के साथ हो पाया? विपक्ष इतनी मेहनत नहीं कर पाया कि यह गुस्सा विकल्प की शक्ल बनता। विपक्ष ने जनता के गुस्से को नहीं बल्कि सत्ता में अपने हिस्से को प्राथमिकता दी। सीटों को लेकर विपक्ष की मारामारी देखने के बाद ही भाजपा इस बात पर हमलावर है कि आपके पास हमारे विरोध के अलावा है भी क्या। क्या सिर्फ इसी के आधार पर उसे सत्ता से हटाया जा सकता है कि ‘विकल्प’ को सत्ता पाना है।

कांग्रेस भाजपा के विकल्प के रूप में छवि पेश कर ही वापसी कर सकती थी। लेकिन क्षेत्रीय दलों के साथ वह उसी रूप में अपना चेहरा लेकर नहीं जा सकती थी। नतीजतन उत्तर प्रदेश और बंगाल जहां वो भाजपा को टक्कर दे सकती थी वहां वो गठबंधन से बाहर थी क्योंकि वहां प्रधानमंत्री पद के दावेदार पहले से हैं। एक सिर्फ बिहार ऐसी जगह बची थी जहां राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर स्वीकारने की बात हो रही थी। दक्षिण भारत में भी कांग्रेस ने सीटें बढ़ाने का ही समीकरण रख माकपा के साथ रिश्ते खट्टे कर लिए। इसके पीछे सोच यही है कि राज्य में अगर माकपा जीत भी जाएगी तो क्या, केंद्र में उसकी सरकार तो नहीं ही बननी है। केंद्र में सरकार बनाने के लिए अधिकतम प्राप्ति के मोह में विपक्ष का राष्टÑीय स्तर पर गठबंधन नहीं हो सका। हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में जीत के बाद जो जमीन बनी उस पर कांग्रेस को अपने जीवित होने की उम्मीद की बेल चढ़ती दिखी और उसने कर्नाटक मॉडल को विदा कर अपने अधिकतम की गिनती शुरू कर दी। यहां तक कि दिल्ली में भी वो आम आदमी पार्टी के खिलाफ सातों सीटों पर खड़ी है और केजरीवाल की भाषा में ‘वोटकटवा’ का खिताब पा रही है। वाराणसी से लेकर पूरे राष्टÑ के स्तर तक ये ‘वोटकटवा’ उस विकल्प की उम्मीद के भ्रूण हत्यारे हैं जो 2014 में दिखाई गई थी। अब सारी लड़ाई सत्ता और जनता के बीच है। इन दोनों की लड़ाई में जो खोया या पाया होगा वह विशुद्ध जनता का होगा, चाहे सत्ता का संकल्प या विपक्ष का विकल्प।

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