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व़क्त की नब्ज़ः क्यों चाहिए सबूत

उड़ी के बाद जो ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कराई गई, उसे पूरा समर्थन है इस देश के आम आदमी का, लेकिन जो खास आदमी बैठे हैं दिल्ली की सुरक्षित आलीशान कोठियों में, उनको यह सैनिक कार्रवाई अच्छी नहीं लगी, सो सबूत मांगते फिर रहे हैं। किसलिए जी?
Author October 16, 2016 01:35 am

शुरू में स्पष्ट कर दूं कि उन भारतवासियों में से नहीं हूं मैं, जो अपनी देशभक्ति को भगवा चोला बना कर घूमते हैं। फिर भी तकलीफ होती है, जब संकट के समय अपने ही लोग उनका साथ देने लगते हैं, जो भारत के दुश्मन हैं। पिछले हफ्ते बहुत तकलीफ हुई यह देख कर कि देश के जाने-माने बुद्धिजीवी और राजनीतिक पंडित भारत सरकार को कठघरे में खड़ा करके हाल में हुए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ पर बिलकुल वही सवाल पूछने लगे, जो पाकिस्तान के सैनिक शासक पूछ रहे हैं। सबूत पेश करो, सबूत पेश करो इतनी बार सुना पिछले दिनों कि कान पक गए और अजीब लगा बहुत कि उनसे सबूत पेश करने को नहीं कहा गया है एक बार भी, जो इस देश के खिलाफ अघोषित, कायर युद्ध चला रहे हैं दशकों से।

भारत की सेना का सम्मान दुनिया करती है, पाकिस्तानी सेना से कहीं ज्यादा, लेकिन अपने ही कुछ लोग हैं, जिनकी नजरों में हमारी सेना और पाकिस्तानी सेना में कोई फर्क नहीं है। वे नहीं देख पाते कि पाकिस्तानी सेना बदनाम हुई है कितना अपनी जिहादी विदेश नीति के कारण। नहीं देख पाते हैं ये लोग कि पाकिस्तानी सेना असली शासक रही है चुनावों के बावजूद। नहीं देख पाते हैं इतना भी कि जिहादी आतंकवाद का निर्यात जो होता रहा है सीमा पार से उसे कराया है पाकिस्तानी सेना ने। ऐसा क्या हमारी सेना ने कभी किया है? सो, भारतीय सेना की बातों पर विश्वास करना चाहिए या पाकिस्तानी सेना की बातों पर?
इस देश के आम आदमी से यह सवाल पूछा जाए तो बिना सोचे कहेगा कि उसको भारत की सेना पर पूरा विश्वास है और गर्व भी है, लेकिन कौन सुनता है आम आदमी की आवाज, जब उसकी आवाज से ऊंची रहती हैं हमेशा उन लोगों की आवाजें, जो भारत के विद्वान माने जाते हैं। भारतीय विचारों की दुनिया पर इन लोगों का बोलबाला रहा है इतने सालों से कि इनकी बातों को गंभीरता से लिए बिना काम नहीं चलता है। इसलिए इनसे पूछना जरूरी है कि उनको पाकिस्तानी सेना पर भरोसा क्यों है इतना? क्या जानते नहीं हैं कि पाकिस्तानी जरनैलों में आम सहमति है अगर किसी चीज पर तो वह है भारत से नफरत। मैं जब भी इन जरनैलों से मिली हूं लाहौर या इस्लामाबाद में तो उनकी बातें सुन कर हैरान रह गई हूं।

इसलिए कि उन्हें विश्वास है कि आज भी भारत ने पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया है। मैं जब उनसे कहती हूं कि न भारत के शासक और न भारत के लोग चाहते हैं कि पाकिस्तान टूट कर फिर से भारत का हिस्सा बन जाए, तो वे मेरी बातों पर शक करते हैं। पूछते हैं अक्सर अकड़ दिखा कर कि फिर क्यों इतने भारतीय अब भी अखंड भारत की बातें करते हैं। इनसे बहस करना मुश्किल है, क्योंकि इनकी सोच फौजियों की सोच होती है और फौजी लोग राजनीति को कम ही समझ पाते हैं। सो, पाकिस्तान के सैनिक शासक आज भी सपना देखते हैं भारत के टूटने का और इस मकसद को ध्यान में रख कर ही बनी है उनकी रणनीति।
पिछले हफ्ते पाकिस्तान के एक जिहादी सरगना ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कश्मीर को हासिल करने के लिए जिहाद हो रहा है और जब कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बन जाएगा तभी 1971 का दाग मिटेगा। बांग्लादेश बना इसलिए कि शेख मुजीबुर्रहमान जब जुल्फिकार अली भुट्टो से ज्यादा सीटें लेकर जीते आम चुनाव में, तो पाकिस्तानी सेना ने उनको पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने नहीं दिया। जब पूर्वी बंगाल में विद्रोह शुरू हुआ, तो सैनिक कार्रवाई इतनी बेरहमी से हुई कि माना जाता है कि लाखों की तादाद में लोग मारे गए।
भारत को हस्तक्षेप करना पड़ा, जब पश्चिम बंगाल में एक करोड़ शरणार्थी घुस आए। लेकिन ज्यादातर पाकिस्तानी मानते हैं कि भारत ने उनके देश को तोड़ा है, सो इसका बदला लेना जरूरी है। इस बदले की भावना से पैदा हुई है पाकिस्तान की जिहादी विदेश नीति, लेकिन ऐसा लगता है कि हमारे बुद्धिजीवी इसको समझे नहीं हैं अभी तक। सो, न सिर्फ सबूत मांग रहे हैं मोदी सरकार से हमारे जवानों को सीमा पार जाकर आतंकवादी अड््डों पर हमला करने का, साथ-साथ यह भी कहते फिर रहे हैं कि पाकिस्तान के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहिए फौरन।
ऐसा लगता है कि इन बुद्धिजीवियों ने इस बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है कि कितनी बार नरेंद्र मोदी ने बातचीत के प्रयास किए हैं। शुरुआत हुई थी नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में निमंत्रित करके। उनकी माताजी के लिए मोदी ने तोहफे भेजे और उसके बाद काबुल से दिल्ली लौटते समय लाहौर पहुंचे शरीफ परिवार की किसी शादी में भाग लेने।
इसके तकरीबन फौरन बाद हुआ गुरदासपुर के एक पुलिस थाने पर पाकिस्तानी जिहादियों का हमला। फिर हुआ पठानकोट में हमला और इसके बाद भी मोदी ने बातचीत की कोशिश जारी रखी, लेकिन उड़ी वाले हमले के बाद अगर कुछ न करते तो देशवासी उनको उन्हीं नजरों से देखते, जिनसे पूर्व प्रधानमंत्री को देखा करते थे। याद रखिए कि 26/11 वाले हमले के बाद जब भारत सरकार ने कुछ नहीं किया तो भारतवासियों की नजरों में सरकार की छवि कितनी गिर गई थी।
उड़ी के बाद जो ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कराई गई, उसे पूरा समर्थन है इस देश के आम आदमी का, लेकिन जो खास आदमी बैठे हैं दिल्ली की सुरक्षित आलीशान कोठियों में, उनको यह सैनिक कार्रवाई अच्छी नहीं लगी, सो सबूत मांगते फिर रहे हैं। किसलिए जी? क्या पाकिस्तान को अब भी सबूत देने की जरूरत है? क्या अपनी सेना पर विश्वास नहीं है हमें?

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  1. A
    Ajay Sharma
    Oct 16, 2016 at 10:39 am
    यार मुझे Apne Desh और सेना पे Garv है, लकिन में आपकी बातों से मत नै हु, आज Desh का कोई भी नागरिक इस बात पे सेना के साथ खड़ा है के surgical स्ट्राइक होना चाहिए पर Sarkar जब खेती है के हम ने करवाया सेना से उस पे आपत्ति है. देश की आम जनता( अप्प्रोक्स 90% ) ये भी जानना चाहती की सर्जिकल स्तरीय का सच सामने आये. मैं कोई Delhi की बड़ी kothi में नहीं रहता बीएस एक आम नागरिक हु Desh ka
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    Reply
    1. A
      Amit
      Oct 16, 2016 at 4:08 am
      Absolutely agree with Tavleen singh's this blog.
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      Reply
      1. Ahmad Hussain
        Oct 16, 2016 at 7:54 pm
        Jab admi ka viswas uth jata hai to aise hi swal uthte hain.
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        Reply