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किताब : मौजूदा दौर की धड़कनें

अदब में बार्इं पसली किसी नारे या स्त्री विमर्श के एकतरफा नजरिए को लेकर आपके सामने नहीं रखी गई है, बल्कि मौजूदा दौर से उसे जोड़ दिया है।

Author June 8, 2018 4:24 AM
नासिरा शर्मा ने अरबी, फारसी, उर्दू, दरी, हिब्रू आदि भाषाओं की कविताओं, कहानियों, नाटकों आदि का हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है

हिंदी में जब भी विदेशी साहित्य परोसने का जतन किया जाता है, तो आमतौर पर ध्यान अंगरेजी, रूसी, चीनी, जर्मन, फ्रेंच, स्पेनी और कुछ हद तक उर्दू की तरफ जाता है। इस तरह कई भाषाओं का साहित्य हम तक पहुंचने से रह जाता है। नासिरा शर्मा ने इस कमी को काफी हद तक दूर करने का प्रयास किया है। उन्होंने अरबी, फारसी, उर्दू, दरी, हिब्रू आदि भाषाओं की कविताओं, कहानियों, नाटकों आदि का हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है, जिसका उन्होंने नाम दिया है- ‘अदब में बार्इं पसली’। यह थोड़ा चौंकाने वाला शीर्षक है। इसके बारे में नासिरा शर्मा कहती हैं- ‘इस पुस्तक का नाम मैंने अदब में बार्इं पसली रखा, जिसका साफ मतलब था कि दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि पूरक हैं। रचनाकार चाहे स्त्री हो या पुरुष, दोनों अपने लेखन में एक-दूसरे को किस दृष्टिकोण से पेश करते हैं? उनकी अभिव्यक्तियों द्वारा उनकी सोच और संवेदना का इजहार हो जाता है कि वह अपने हमशक्ल दूसरे इंसान को किस तरह देख और समझ रहे हैं। उसे दुनिया और परिवार में क्या मकाम देना चाहते हैं।’

इस तरह छह खंडों में संकलित विभिन्न भाषाओं की इन रचनाओं के माध्यम से नासिरा शर्मा एक रूप में प्रचलित विमर्शों के बरक्स एक नया विमर्श भी रचती हैं। उनका हिंदी के अलावा अंगरेजी, उर्दू, पश्तो और फारसी भाषाओं पर समान अधिकार है। वे अफगानिस्तान, ईरान, इराक आदि देशों की सियासत और अदब की दुनिया पर लगातार नजर रखती रही हैं। उनके एफ्रो-एशियाई देशों के बुद्धिजीवियों से गहरे ताल्लुकात रहे हैं। इस तरह न सिर्फ उन्होंने इन देशों के साहित्य को बहुत गहराई से पढ़ा और उनके समाजों को नजदीक से देखा-जाना है, बल्कि वे वहां की समस्याओं से लगातार टकराती भी रही हैं।

‘अदब की बार्इं पसली’ में न सिर्फ उन्होंने इन देशों के ख्यातनाम साहित्यकारों की प्रतिनिधि रचनाओं को शामिल किया है, बल्कि वहां के पूरे साहित्यिक परिदृश्य के बारे में बताते हुए उनके बुद्धिजीवियों से विभिन्न मुद्दों पर बातचीत भी की है, जो अनेक अनछुए पहलुओं से हमें वाकिफ कराती है। हालांकि इन खंडों में संकलित रचनाओं के चयन के पीछे एक सैद्धांतिक पक्ष भी है, पर वह किसी एक पक्ष- स्त्री या पुरुष को केंद्र में रख कर नहीं है। नासिरा शर्मा कहती हैं- ‘अदब में बार्इं पसली किसी नारे या स्त्री विमर्श के एकतरफा नजरिए को लेकर आपके सामने नहीं रखी गई है, बल्कि मौजूदा दौर से उसे जोड़ दिया है। यह तलाश है एक-दूसरे में अपने को तलाश करने की और साथ ही उस परिवेश को समझने की, जिसे खुद इंसान ने इंसान के लिए दुश्वार बना दिया है। दुश्मन कोई और है और दुश्मनी हम कहीं और निभाते हैं।’ इस तरह इन खंडों में संकलित रचनाएं समन्वय, सौहार्द और सहअस्तित्व को पोसने का काम करती हैं।

अदब में बार्इं पसली : नासिरा शर्मा; लोकभारती प्रकाशन, पहली मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद।

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