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दिल्ली मेरी दिल्ली: चालान की चाल

बेदिल को पूर्वी दिल्ली की एक जगह पर पुलिस के इस रवैये से पीड़ित सज्जन ने बताया कि वे अपनी गाड़ी से अक्षरधाम से नोएडा जा रहे थे, तभी मयूर विहार में अचानक बीच सड़क उनकी गाड़ी के आगे एक के बाद एक कई पुलिसकर्मी खड़े हो गए

Author September 24, 2018 3:52 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

चालान की चाल
यातायात पुलिस अपने आंकड़े पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। फिलहाल वह पेड़ की आड़ में छिपकर अचानक सड़क पर गाड़ी रोककर चालान काटने के लिए सुर्खियों में है। बेदिल को पूर्वी दिल्ली की एक जगह पर पुलिस के इस रवैये से पीड़ित सज्जन ने बताया कि वे अपनी गाड़ी से अक्षरधाम से नोएडा जा रहे थे, तभी मयूर विहार में अचानक बीच सड़क उनकी गाड़ी के आगे एक के बाद एक कई पुलिसकर्मी खड़े हो गए। उनकी गाड़ी तेज रफ्तार में थी लिहाजा दुर्घटना होते-होते बची, लेकिन पुलिसवालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने चालान काटा और फिर पेड़ की ओट में छिप गए। सज्जन का तर्क था कि पुलिसवालों के इस तरह छिपे होने और अचानक सामने आने का क्या तुक है? ऐसे में अगर अगर कोई हादसा हो जाए तो उसकी जिम्मेवारी किसकी होगी?

शोपीस बने टॉवर
मोबाइल सिग्नलों की कमी से जूझ रहे ग्रेटर नोएडा के लोगों की परेशानी आने वाले दिनों में और बढ़ने वाली है। इलाके के गांवों में लगे मोबाइल टॉवरों को वहां बिजली आपूर्ति करने वाली नोएडा पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एनपीसीएल) कनेक्शन देने को तैयार नहीं है। जबकि नोएडा की तरह ग्रेटर नोएडा के गांवों की आबादी भी काफी ज्यादा है। हाल ही में देश की एक नामी कंपनी ने एनपीसीएल से गांवों में लगे करीब दो दर्जन से ज्यादा मोबाइल टॉवरों के लिए बिजली कनेक्शन देने की मांग की थी। एनपीसीएल ने बिजली कनेक्शन देने के लिए प्राधिकरण से एनओसी लाने को कहा है, जबकि प्राधिकरण के पास गांवों के लिए एनओसी जारी करने का अधिकार नहीं है। इस खींचतान के चलते नए मोबाइल टॉवर शुरू नहीं हो पा रहे हैं और इसका खमियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

झोलाछाप से उम्मीद
शहर के एक स्वास्थ्य केंद्र में मरीज देखने का समय पहले से तय करना जरूरी कर दिया गया है। इससे मरीजों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। एक मरीज पेटदर्द की शिकायत लेकर वहां पहुंचा तो पहले से समय न लेने की वजह से ओपीडी में नहीं दिखा पाया। जैसे-तैसे मरीज एक डॉक्टर के पास पहुंचा और कहने लगा कि क्या करें डाक्टर साहब, पेटदर्द ने पहले से समय नहीं लिया था, अचानक ही शुरू हो गया तो क्या करते, अचानक ही आना पड़ा। इस पर डॉक्टर से कोई जवाब देते न बना। उन्होंने उसे इमरजंसी वार्ड में भेज दिया। लेकिन इमरजंसी वार्ड में हालत गंभीर होने पर ही देखे जाने की बात कह कर उसे फिर ओपीडी में भेज दिया गया। तंग आकर मरीज ने गली के झोलाछाप डॉक्टर के पास जाने में ही भलाई समझी।

जिम्मेदारी का सवाल
सांसद मनोज तिवारी ने सीलिंग का ताला क्या तोड़ा, और लोगों में भी हिम्मत आ गई। अब सीलिंग के खिलाफ वो लोग ज्यादा खड़े हो रहे हैं जो रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां तो चला रहे हैं, लेकिन पेनल्टी सहित शुल्क देने के जुगाड़ में हैं। उन्हें आस-पड़ोस के लोगों की दिक्कत से कोई मतलब नहीं है। यह बात किसी और ने नहीं, बल्कि निगम के एक आला अधिकारी ने कही। उनका तर्क है कि जब आप कानून के दायरे में हैं तो आपको कानून का पालन भी करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट के फरमान पर पूरी दिल्ली में सीलिंग हो रही है, लेकिन कुछ लोग इसे राजनीतिक रंग देकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। बेदिल ने जब पूछा कि यह तो आपने बिल्कुल सही कहा, लेकिन सवाल यह है कि आखिर सीलिंग की नौबत लाने का जिम्मेदार कौन है, तो अधिकारी बगलें झांकने लगे।

राग बदलती ढपली
दिल्ली में जारी सीलिंग को हर पार्टी मुद्दा बनाने को तैयार है, लेकिन अदालत में पुनर्विचार याचिका डालने को कोई तैयार नहीं है। हर कोई व्यापारियों का मसीहा बनने का दिखावा कर रहा है, लेकिन उनकी फिक्र किसी को नहीं है। दरअसल सारा खेल वोट बैंक का है, तभी तो एक मुद्दे पर सबकी अपनी ढपली अपना राग है। हद तो यह है कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल के लोग भी सरकार के पास जाने के बजाए विरोध में शामिल हो जाते हैं। हाल ही में एक दल के नेता ने सीलिंग तोड़कर कर हीरोगिरी दिखाई, लेकिन अब वे भी बैकफुट पर हैं। डर है कि कहीं जेल न चले जाएं। इसे देखकर बाकी दल भी अपनी रणनीति बदलने की जुगत में हैं। चर्चा है कि सीलिंग विरोध की ढपली फिर अपना राग बदलेगी।
-बेदिल

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