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विवाद का पानी

एक-एक बाल्टी पानी के लिए लोग रात-रात भर जाग रहे हैं।

दिल्ली पिछले कई दिनों से गंभीर जल संकट से जूझ रही है। आलम यह है कि पानी पहुंचाने वाले टैंकरों को कड़ी सुरक्षा में चलाया जा रहा है, ताकि पानी को लेकर हिंसा की नौबत न आ जाए। यह चिंताजनक इसलिए है कि अगर ऐसे ही हालात बने रहे तो यह जल संकट कभी भी जल संघर्ष में बदल सकता है। यह तो अक्सर देखने में आता ही रहा है कि पानी को लेकर लोग एक दूसरे की जान तक लेने में भी नहीं हिचकते।

एक-एक बाल्टी पानी के लिए लोग रात-रात भर जाग रहे हैं। जहां पानी पहुंच रहा है वहां लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। जिनके पास पानी खरीदने को पैसे नहीं हैं, वे गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। जो खरीद सकते हैं, वे मुंहमांगा दाम दे रहे हैं। ऐसा नहीं कि ये हाल कुछेक इलाकों का है। आधी से ज्यादा दिल्ली पानी के लिए इसी तरह तरस रही है। यह हर साल का रोना है। लेकिन विडंबना यह है कि जल संकट के स्थायी समाधान के लिए क्या हो, इसकी फिक्र किसी को नहीं दिखती।

देश की राजधानी में ही अगर इतना गंभीर जल संकट खड़ा हो जाता है और वह भी हर साल, तो सरकारों पर सवाल उठना लाजिमी है। आखिर सरकारें कर क्या रही हैं? दिल्ली की अपनी सरकार है। केंद्र सरकार भी यहां है। देश की सर्वोच्च अदालत भी यहां बैठती है। सत्ता और शक्ति का केंद्र होने के बावजूद लाखों लोग अगर पानी के लिए तरसते हैं तो निश्चित ही इसे व्यवस्था की नाकामी का नतीजा माना जाना चाहिए।

मोटे तौर पर दिल्ली में पानी का संकट तब खड़ा होता है, जब यमुना में पानी कम हो जाता है। ताजा स्थिति यह है कि वजीराबाद बैराज पर यमुना नदी का जलस्तर सामान्य से छह फीट नीचे चला गया है। यहां पानी हरियाणा से आता है। कहा जा रहा है कि अब हरियाणा, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश ने दिल्ली को अतिरिक्त पानी देने से मना कर दिया है। हरियाणा तर्क यह दे रहा है कि पंजाब उसे उसके हिस्से का पानी नहीं दे रहा। यानी जब पंजाब हरियाणा को पानी देगा, तब वह दिल्ली को देगा। अगर वाकई ऐसा है तो यह बेहद गंभीर बात है। इससे तो यही लग रहा है कि पानी को लेकर सरकारें राजनीति कर रही हैं। गौरतलब है कि दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है, जबकि उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भाजपा की।

पानी को लेकर विवाद दूसरे राज्यों में भी होते रहते हैं। नदियों के पानी पर किसका और कितना हक हो, यह मुद्दा जटिल तो है ही, राज्यों की राजनीति ने इसे और पेचीदा बना डाला है। दिल्ली को अतिरिक्त पानी देने को लेकर उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के साथ चर्चा करीब तीन साल से चल रही है। हरियाणा सरकार के साथ भी लंबे समय से बात चल रही है। पर अब तीनों राज्यों ने अपनी मजबूरी जता दी है।

सभी इन राज्यों के अपने तकनीकी व अन्य कारण हैं। हो सकता है कि वे उचित भी हों, लेकिन जिस तरह का रवैया हरियाणा, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश दिखा रहे हैं, उसे शायद ही कोई जायज ठहराएगा। हालांकि देखा यह भी जाना चाहिए कि इन राज्यों के पास अपने लिए कितना पानी है। दिल्ली की अपनी भौगोलिक स्थिति और अन्य मजबूरियां ऐसी हैं कि बिना दूसरे राज्यों से पानी मिले उसका गुजारा चल नहीं सकता। सारे राज्य एक ही देश के हैं, पड़ोसी हैं, सभी के नागरिक भी एक ही हैं। ऐसे में कोई राज्य किसी जरूरतमंद राज्य को पानी नहीं देकर संकट खड़ा करता है, तो यह गंभीर बात है।

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