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बेबाक बोलः संकट में शक्तिमान

पूरे देश में जब कांग्रेस के खिलाफ सुनामी आई थी तब देवभूमि कहे जानेवाले हिमाचल प्रदेश में पार्टी की डगमगाती कश्ती के खेवनहार बने हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अब गहरे संकट में हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने हाल ही में उनकी आठ करोड़ की संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया है। दूसरे कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत अपनी सरकार बचाने के लिए बहुमत साबित करने की जंग में जुटे हैं। अगले महीने चुनाव के बाद असम में कांग्रेस की सत्ता वापसी के फिलहाल संकेत नहीं मिल रहे हैं। महज आठ राज्यों में सत्ता में बची कांग्रेस का भविष्य बेहतर नहीं दिख रहा। दो पहाड़ी राज्यों में सत्ता बचाने के साथ उसके सामने अन्य राज्यों में फिर से पांव जमाने की चुनौतियां भी हैं। कांग्रेस के कमजोर होते हाथ पर पढ़ें बेबाक बोल।

Author नई दिल्ली | Published on: March 26, 2016 2:57 AM
हिमाचल के सीएम वीरभद्र और उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत

पिछले लोकसभा चुनावों में जब भाजपा ने कांग्रेसमुक्त भारत का नारा दिया था तो देश पर सबसे ज्यादा समय तक एकछत्र राज करने वाली पार्टी ने इसे हलके में लिया था। लेकिन लोकसभा चुनावों के नतीजे ने भाजपा के सपने को सच किया तो कांग्रेस के अच्छे दिनों की वापसी को एक सपना बना दिया। और कांग्रेस के बुरे दिनों की सूची के बेहद करीब आ चुका है उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश का नाम। दो पहाड़ी राज्यों में अगर कांग्रेस अपना चेहरा नहीं बचा पाई तो आने वाला समय उसके लिए चुनौतियों का पहाड़ बन जाएगा।
पांच दशक से भी ज्यादा अंतराल में फैले अपने राजनीतिक जीवन की संभवत: आखिरी पारी खेल रहे राजशाही की निशानी व देवभूमि प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह इस समय अहम सियासी संकट के दौर से गुजर रहे हैं। इक्यासी की आयु में वीरभद्र इस समय सीबीआइ, आयकर व प्रवर्तन निदेशालय की ओर से चल रही जांच में घिरे हैं। देश की राजनीति का आजकल कुछ ऐसा ही दौर है। आप राज्य में सत्ता में हैं और केंद्र में कोई दूसरी सरकार है या राज्य में आप से इतर किसी दूसरी पार्टी की सरकार है तो आप को छलनी में से निकलना ही होगा। राजनीति संभल कर न की और अपने पैसे का सही इंतजाम न किया तो जांच के लिए तैयार ही रहना पड़ता है। अपने कार्यालय पर सीबीआइ के छापे का ‘शेर आया, शेर आया’ की तर्ज पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का बवाल अगर भूल जाएं तो वीरभद्र ऐसे पहले और एकमात्र मुख्यमंत्री हैं जिन पर उनके मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान रहते हुए ही सीबीआइ का छापा पड़ा। जांच की आंच मुख्यमंत्री की सांसद पत्नी प्रतिभा सिंह, पुत्र विक्रमादित्य सिंह और बेटी अपराजिता सिंह पर भी है। परिवार के इन सदस्यों के अलावा वीरभद्र का एलआइसी एजंट आनंद चौहान भी संदेह के घेरे में है।
हिमाचल प्रदेश में वीरभद्र सिंह सबसे कद्दावर नेता हैं। वे छठी बार प्रदेश की सत्ता पर काबिज हैं। पांच बार सांसद रहे हैं। रुतबा ऐसा कि कांग्रेस आलाकमान चाह कर भी उन्हें छठी बार कमान देने से पीछे न हट सका। प्रतिद्वंद्वी पार्टी नेता उन पर इतने निर्भर थे कि चाह कर भी खुला विरोध नहीं कर पाए और पार्टी के अंदर जो विरोध करने को जाने जाते थे, उन्हें फिर से पछाड़ना राजा के लिए चुटकियों का काम रहा। जो लोग राजा के पीछे उनके बारे में दबी जुबान से उनकी वरिष्ठता का रोना रोते और अपने भविष्य पर प्रलाप करते हैं, राजा के सामने उनका यशगान करते हैं।
लिहाजा कांग्रेस आलाकमान, जो हरियाणा की तर्ज पर हिमाचल में भी किसी युवा को लाने के बारे में सोच भी रहा था तो राजा की कमजोर मुखालफत ने इसे मनमसोस कर ही रह जाने दिया। हरियाणा में 2005 में कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के नाम पर चुनाव लड़ा। पूरे चुनाव में यही रहा कि पार्टी जीती तो भजनलाल मुख्यमंत्री बनेंगे। खुद भजनलाल ने अपनी ढलती उम्र का वास्ता देकर एक आखिरी मौका चाहा। लेकिन पार्टी ने उम्र के कारण भजन को घर बिठा कर भूपिंदर सिंह हुड्डा को प्रदेश की कमान सौंप दी। नतीजा यह है कि भजन के बेटे कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस को अलविदा कह अपनी पार्टी बना ली और जैसे-तैसे एक चुनाव अपने नाम कर लेने के बाद अब पार्टी सत्ता से बाहर है और पहली बार हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है।
जिस तरह से कांग्रेस का केंद्र में हाल है और जैसे पंजाब, हरियाणा व चंडीगढ़ में स्थिति है, वीरभद्र सहज ही संकट में दिखाई दे रहे हैं। उनके करीबी इस समय यही देख रहे हैं कि जितना समय रहते लाभ और शुद्ध लाभ हो जाए वही फायदे की बात है वरना पासा कब पलट जाए कुछ पता नहीं। इस समय तो पार्टी आलाकमान शायद ही कुछ हौसला कर पाए क्योंकि खुद पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी व उपाध्यक्ष राहुल गांधी नेशनल हेरल्ड मामले में भ्रष्टाचार के आरोपों में उलझे हैं। लेकिन राजा के विरोधी अपने अथक प्रयासों में लगे हैं, जिसके लिए कभी प्रदेश में तो कभी दिल्ली में मुलाकातों का दौर चलता ही रहता है। अब देखना यह है कि हिमाचल में वीरभद्र के साथ कांग्रेस अपना चेहरा कैसे बचा पाती है।
केंद्र में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की लड़ाई चरम पर है। रोहित वेमुला के बाद कन्हैया मुद्दे को लपक कर कद्दावर मंत्री स्मृति ईरानी के खिलाफ हल्ला बोल का माहौल है। गौमांस से छिड़ी लड़ाई राष्टÑवाद के पाठ तक पहुंच गई है। भाजपा इस सच का सामना कर चुकी है कि अगर अभी एकछत्र राज कायम नहीं हुआ तो दूसरा मौका बहुत दूर होगा। सच तो यह है कि शतरंज का खेल जब एक बार शुरू हो जाता है तो लड़ाई में सभी छोटे-बड़े मोहरों का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए भाजपा उत्तराखंड और हिमाचल में अपने सिपाहियों के जरिए दोनों वजीर को मात देने की कोशिश में है। दोनों जगह वह कांग्रेस की अंदरूनी कलह का फायदा उठा कर अपना राज लाना चाहती है।
हिमाचल में वीरभद्र को अपने मंत्रियों कौल सिंह ठाकुर व जीएस बाली का मुखर विरोध झेलना पड़ता है। इनके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम का परिवार तो उनका धुर विरोधी है ही। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू की भी राजा से कुछ खास पटती नहीं है। यह माना जा रहा है कि वीरभद्र विरोधियों की कुछ हालिया मुलाकातें सुक्खू के सानिध्य में ही हुई हैं। भाजपा ने तो वीरभद्र के खिलाफ मोर्चा खोल ही रखा है। ऐसे में वीरभद्र के खिलाफ सुलग रही यह चिनगारी कब ज्वाला बन जाए, पता नहीं। राजा की चिंता का विषय यह भी है कि यह चिनगारी अगर ज्वाला बनी तो इसकी चपेट में आने वाले वे अकेले नहीं होंगे बल्कि उनके परिवार के वे दोनों सदस्य भी होंगे जो उनके सहज ही उत्तराधिकारी हो सकते हैं।
कांग्रेस के अंदरूनी विरोध के साथ वीरभद्र को भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का भी मुखर विरोध झेलना पड़ता है। भाजपा इस समय केंद्र में सत्तारूढ़ है। ऐसे में जाहिर है कि धूमल इस समय का भरपूर लाभ उठा कर राजा के खिलाफ हर तरह का राजनीतिक संकट खड़ा करने का प्रयास करेंगे और यह पार्टी आलाकमान पर वीरभद्र के खिलाफ माहौल बना कर ही होगा। धूमल के सांसद बेटे अनुराग ठाकुर भी वीरभद्र से परेशान रहे हैं। धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम को लेकर उन पर भी कम संकट नहीं खड़े किए गए थे और फिर क्रिकेट बनाम जवानों की शहादत का मामला उठा कर वीरभद्र ने उन्हें कम परेशान नहीं किया। कुल मिला कर बुशैहर स्टेट के इस राजा के सामने इस समय जो संकट है वह अस्तित्व के संकट से कम नहीं है।
अस्तित्व बचाने का यह संघर्ष उत्तराखंड में हरीश रावत के सामने भी है। यहां तो बागी कांग्रेसी विधायक ही तय करेंगे कि राज्य में ‘शक्तिमान’ कौन होगा। अगर सोमवार को रावत बहुमत साबित नहीं कर पाए तो कांग्रेस का एक मजबूत पैर टूट जाएगा और उसके लिए खड़ा होना मुश्किल होगा। हरीश रावत जनता के दरबार में कह रहे हैं कि केंद्र की हुकूमत कांग्रेस को खत्म करना चाहती है। वह किसी भी तरह के विरोध को बलपूर्वक दबा देना चाहती है, ताकि कोई विरोधी आवाज न उठ सके। हरीश रावत ने रोहित वेमुला का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कोई दलित नौजवान अपनी आवाज उठाता है तो उसे मरने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। केंद्र को कोसने के साथ रावत दल-बदल कानून और मंत्रिपद के लालच के जरिए अपनी सरकार को बचाने की कोशिश में जुटे हैं। हालांकि अभी तक तो रावत अपनी मजबूत छवि बनाए रखने में सफल रहे थे, लेकिन विरोधियों की अनसुनी करना उनके लिए भारी पड़ा।
विरोधियों को अनसुनी करने की गलती सिर्फ हरीश रावत ने नहीं की है बल्कि कांग्रेस आलाकमान यह गलती बार-बार दुहराता है। उत्तराखंड में सरकार गिरेगी या बचेगी यह तो वक्त की बात है लेकिन अब तो कांग्रेस के पास अपनी गलती सुधारने का भी वक्त नहीं है। वहीं अगले महीने असम में चुनाव होंगे और अभी तक तो आकलन यह है कि ईवीएम से कांग्रेस के लिए खुशखबरी निकलना मुश्किल है।
यह सच है कि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को अलग-थलग करने की भाजपा की रणनीति सफल रही और देश की सबसे गौरवशाली पार्टी का इतिहास रखने वाली कांग्रेस का वर्तमान यह रहा कि वह गरिमामय विपक्ष के दर्जे से भी हाथ धो बैठी। लेकिन सियासत के शतरंज पर एक ही रणनीति से हर बार मात नहीं दी जा सकती है, और बिहार में यही रणनीति भाजपा के खिलाफ रही। हिंदुत्व के मुद्दे पर धु्रवीकरण का जवाब विपक्ष ने असहिष्णुता पर गोलबंदी से दिया। लेकिन यह सच है कि बिहार में कांग्रेस अगुआ की भूमिका में नहीं थी।
कांग्रेस अगर उत्तराखंड की सरकार बचा भी लेती है तो फिलहाल आने वाले चुनावों में उसके लिए करो या मरो वाली स्थिति ही रहने वाली है। भाजपा को भी यह सच मालूम है कि अगर अभी कांग्रेस को पस्त नहीं किया तो उसके सूरज को भी अस्त होते देर नहीं लगेगी। चुनावी जंग के बाद हाशिए पर पहुंची कांग्रेस की चुनौती का पहाड़ बड़ा है और देखना यह है कि वह अपना अस्तित्व कैसे बचाएगी।

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