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समाज – संवेदनहीन होते किशोर

आज बच्चों की मनोवृत्ति बदल रही है। उनकी हिंसक प्रवृत्ति में इजाफा हो रहा है। वे छोटी-छोटी बात पर उत्तेजित होकर उद्दंड, मारपीट करने और आक्रामक होने लगे हैं। हमारी पीढ़ी जिस पारिवारिक और सामाजिक ढांचे में पली-बढ़ी है, वह ढांचा निश्चित ही खंडित हुआ है।

Author February 11, 2018 03:26 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कविता भाटिया

सभ्यता के विकासक्रम में बढ़ती भौतिकतावादी प्रवृत्ति और दिन-प्रतिदिन रफ्तार पकड़ती जिंदगी में आज कितना कुछ पीछे छूट रहा है या हम किस मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं, यह एक चिंतनीय प्रश्न है। आज विश्व के अधिकांश देशों में विकसित देशों की तर्ज पर हो रहा सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव हावी है। यह बदलाव भौतिकता के बढ़ते साधनों, जीवन शैली, पारिवारिक और सामाजिक वातावरण में तेजी से परिवर्तन, संचार के अत्याधुनिक माध्यमों का प्रसार और नैतिक मूल्यों के ह्रास के रूप में देखा जा सकता है। चिंताजनक विषय यह है कि इस कारण हमारी किशोर और युवा होती पीढ़ी गुमराह हो रही है। हाल की घटनाएं इसका प्रमाण हैं। पहले अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों में छात्रों द्वारा हिंसक घटनाओं को हम सुनते-पढ़ते थे, पर अब यह प्रवृत्ति हमारे यहां भी घुसपैठ कर चुकी है, जिसके मूल में क्रोध, प्रतिरोध और प्रतिशोध की भावना रहती है।

आज बच्चों की मनोवृत्ति बदल रही है। उनकी हिंसक प्रवृत्ति में इजाफा हो रहा है। वे छोटी-छोटी बात पर उत्तेजित होकर उद्दंड, मारपीट करने और आक्रामक होने लगे हैं। हमारी पीढ़ी जिस पारिवारिक और सामाजिक ढांचे में पली-बढ़ी है, वह ढांचा निश्चित ही खंडित हुआ है। संयुक्त परिवार में रह कर जो मूल्य और संस्कार बच्चों में पनपते और विकसित होते हैं, उनके स्थान पर आज का बच्चा एकल परिवारों के सन्नाटे, कुंठा, घुटन, अकेलापन और उपेक्षा के बीच बड़ा हो रहा है। समाजशास्त्रीय विश्लेषणों से पता चलता है कि सामाजिकता के अभाव और संयुक्त परिवारों के टूटने से भी बच्चों में अकेलापन और मानसिक तनाव बढ़ रहा है। तभी तो वे भावनात्मक संबल की खोज में सोशल साइटों की आभासी दुनिया में जीने लगते हैं, जो उसे वास्तविक दुनिया से दूर एक तिलिस्मी, मायालोक में ले जाती है। यहां उसे भावनात्मक संबल तो नहीं मिलता, पर वह भटकाव की फिसलन भरी दुनिया में अवश्य पहुंच जाता है। आज के बच्चे जिस तरह ताकत का प्रदर्शन कर रहे हैं, वास्तव में वह उनकी कमजोर होती सहनशक्ति का परिचायक है। वर्तमान उपभोक्तावादी दौर में बच्चे आदर्श और नैतिकता को हास्यास्पद मान अपने को ‘स्वयंसि़द्ध’ मानते और अपने शस्त्र खुद चुनते हैं। यहां प्रदर्शन है, दिखावा, आडंबर, झूठ, असंयम और असंतोष है।
वीडियो गेम्स आज दुनिया के अधिकांश हिस्सों में मनोरंजन का एक लोकप्रिय रूप और आधुनिक संस्कृति का हिस्सा बन गए हैं। वीडियो गेम्स में जीटीए और कांउटर स्ट्राइक शृंखला के खेलों में बंदूक चलाना, गाड़ी जलाना और बम फोड़ने जैसे आक्रामक निर्देश और मिशन दिए जाते हैं, जहां दूसरी टीम के खिलाड़ियों को खत्म करने का जुनून हावी रहता है और गेम में इसी आधार पर खिलाड़ियों के अंक बढ़ते हैं। मोबाइल गेम्स में मिनी मलेशिया गेम में भी इसी तरह के दुस्साहसिक कार्य करने को दिए जाते हैं। अभी कुछ दिनों पहले ब्लू वेल नामक घातक गेम ने किशोरों को सम्मोहित कर अपनी ही जान लेने को विवश कर दिया था।’ यही नहीं, इधर हिंसा, अपराध और मारधाड़ से भरे टीवी धारावाहिक और हिंसा प्रधान फिल्मों का भी काफी इजाफा हुआ है। इनमें दिखाई जाने वाली घटनाओं और अपराधों से कितना सावधान और सचेत बन पाते हैं या किशोर गलत राह पर भटक रहे हैं- यह भी सोचना होगा। यहां प्रदर्शित आक्रामकता, हिंसा, आपराधिक प्रवृत्तियां यौन व्यवहार किशोर पीढ़ी को संवेदनहीन बना कर उसकी सोच को बदल देते हैं। इसी कारण उनमें रिश्तों के प्रति उदासीनता, अकेलापन और तनाव जैसे मानसिक विकार भी जन्म ले रहे हैं। स्मार्टफोन और तकनीक के विकास ने सेक्स संबंधी सामग्री को भी तेजी से बढ़ावा देने में मदद की है।

इसके अलावा पाठ्यक्रमों का बढ़ता बोझ और अत्यधिक स्पर्धा ने भी बच्चों में विचलन पैदा किया है। बच्चों को लेकर अभिभावकों की भी उच्च इच्छाएं, आकांक्षाएं भोले मनोमस्तिष्क को अवसाद का शिकार बना रही हैं। इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में धैर्य और संयम से दूर केवल अंधी होड़ लगी है। नए संचार माध्यमों ने बच्चों के कल्पनालोक और उनके यथार्थ में घालमेल करते हुए हिंसा और आक्रोश को क्रेंद्र में लाकर उसे लक्ष्य प्राप्ति का सुगम साधन बना दिया है। मीडिया में दिखाई जाने वाली हिंसा को अमेरिका में ‘पब्लिक हेल्थ रिस्क’ कहा जाता है। उदार आर्थिक व्यवस्था वाले अमेरिका के अधिकांश राज्यों में बचपन से ही रिवाल्वर रखने वाले किशोरों की संख्या बढ़ने के साथ स्कूलों में अपने साथियों और शिक्षकों की हत्या की घटनाएं हाल के कुछ वर्षों में बढ़ी हैं। चरमराते पारिवारिक और सामाजिक ढांचे के वातावरण में हिंसक और संवेदनहीन होते बचपन की यह स्थिति भविष्य के लिए चिंताजनक है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक किशोरों द्वारा किए जाने वाले अपराधों में इजाफा हो रहा है, इसमें हत्या ही नहीं, बलात्कार के मामले भी बढ़े हैं। हिंसा और अपराधों की चपेट में आता बचपन अनेक तरह के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सवालों की ओर इशारा करता है।

आज के बच्चे सोशल मीडिया के लती बनते जा रहे हैं। इसके ज्यादा इस्तेमाल से उनमें मनोवैज्ञानिक प्रभाव स्पष्ट देखे जा सकते है। ब्रिटेन में हुए ‘सोशल मीडिया यूज ऐंड चिल्ड्रन्स वेल बीइंग’ नामक एक अध्ययन के दौरान पाया गया कि जो बच्चे सोशल मीडिया पर जितना समय बिताते हैं, उसी अनुपात में वे अपने घर-परिवार, स्कूल और जीवन के प्रति असंतुष्ट भी हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार छह से अठारह वर्ष के 83.5 प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, जो उनके आत्मविश्वास और व्यक्तित्व को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। नए माध्यम एक ओर युवाओं और बच्चों को समग्र विश्व से जोड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर उन्हें अपने ही परिवार और समाज से दूर भी कर रहे हैं। इसके प्रति बढ़ती आसक्ति से उनमें आक्रामकता, चिड़चिड़ापन, स्वार्थपरता और व्यक्तिवादिता जैसी प्रवृत्तियां पनप रही हैं। किशोरावस्था में व्यक्तित्व के निर्माण और व्यवहार के निर्धारण में वातावरण बहुत हद तक उत्तरदायी होता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि असुरक्षा की भावना से ग्रस्त मनुष्य या तो कुंठित होकर किसी हीन मनोग्रंथि का शिकार हो जाएगा या मानसिक संघर्ष करते हुए स्वयं को समर्थ और सशक्त दर्शाने के लिए अनुचित और अनैतिक कार्यों में लिप्त हो जाएगा।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) के तहत पंजीकृत किशोर अपराधों में सैंतालीस फीसद की वृद्धि हुई है। 2010 में जहां नाबालिगों द्वारा अपराधों की संख्या बाईस हजार सात सौ नब्बे थी, वहीं 2014 में तैंतीस हजार पांच सौ छब्बीस हो गई। इस तरह नाबालिग अपराधों में बढ़ोतरी का ग्राफ निरंतर चढ़ रहा है। किशोर अपराधों को एक महत्त्वपूर्ण कानूनी, सामाजिक, नैतिक और मनोवैज्ञानिक समस्या के रूप में देखा जाने लगा है। ऐसे में बच्चों को बाल अपराध की प्रवृत्ति से उबारने और उनके विकास के लिए आवश्यक है कि उन्हें विद्यालय और परिवार में समुचित ढंग से भावनात्मक पोषण मिले। आज बच्चों और माता-पिता के बीच फ्रेंडली तालमेल, उनके मोटिवेशन की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है, जिससे घर में बच्चों को तनावमुक्त माहौल और स्वस्थ वातावरण मिल सके। विद्यालयों में भी प्रेरणादायी कार्यक्रम होने चाहिए, जिससे बच्चों की दशा और दिशा बदले और वे स्वस्थ लक्ष्य की ओर अग्रसर होकर आदर्श नागरिक बन सकें। वीडियो गेम्स या कंप्यूटर गेम्स बच्चों में ध्यान क्रेंद्रित करने, मनोबल बढ़ाने, तार्किक प्रश्नों के समाधान आदि सकारात्मक पहलुओं को भी बढ़ावा देते हैं। पर इनको एक सीमा तक ही देखा जाना उचित है। साथ ही पारिवारिक परिवेश और सामाजिक सद्भाव मजबूत किए बिना किशोरों की हिंसक मानसिकता पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता।

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