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कविता: वे सदी के महान कवि थे, पिता, और मैंने गढ़ा प्रेम

सांत्वना श्रीकांत की तीन लघु कविताएं

प्रतीकात्मक तस्वीर

-सांत्वना श्रीकांत
वे सदी के महान कवि थे

वो सब के सब
एक ही तरफ दौड़ रहे थे
एकदम एक दूसरे के पीछे,
कुछ धक्के मार रहे थे,
कुछ चाटुकारिता में व्यस्त थे
कुछ उनकी मदद कर रहे थे
तो कुछ इतिहास बदलने
के फेर में थे।
कुछ औंधे मुंह गिर पड़े
हालांकि-
कुछ का दिल धधकता था
लेकिन-
फेफड़ों के श्वांस के लिए
कविता दूषित हो चुकी थी।
वो दौर सदी के महान कवियों का था।

और मैंने गढ़ा प्रेम

मैंने नींद मांगी थी
तुमने बदल दिया इसे
स्याह रातों के खौफ में।
मैं प्रेम की नदी
बन कर बही
तुमने खड़ी कर दी
भूख की ऊंची दीवारें।
मैंने समर्पण कहा,
तुमने क्रांति कहा।
मैंने कहा-
सभ्यताओं को संवर्धित
करने के लिए क्यों न
रोप दूं प्रेम का बीज,
तुमने उलाहना दिया
हत्याओं का…….
आंखों से खून बहाया,
तुम सदी के महान कवि बने
और मैंने गढ़ा प्रेम।

पिता

पिता के माथे की झुर्रियां
दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी
बेटी के ब्याह की चिंता में।
कमतर होते पिता
झोंक देते थे खुद को
दहेज जुटाने में।
इस प्रक्रिया में
जुटा लिया था
अपने अकेलेपन का डर।
बेटी पैदा करने की पीड़ा
और तानों की चुभती टीस
एड़ियों में कांटे सी धंसी थी,
हालांकि दुनिया की सारी खुशियां
उलीचते रहे बेटी की तरफ,
फिर भी रोए
उसकी जली काया को
कंधा देते वक्त।

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