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सेहत – भूलने की समस्या

सोई का काम खत्म करने के बाद बार-बार जाकर देखना कि गैस बंद है या नहीं, बातचीत करने के दौरान भूल जाना कि किस विषय पर बात हो रही थी, लोगों के नाम भूल जाना और रोजमर्रा होने वाली छोटी-मोटी बातें भी याद न आना आदि वे समस्याएं हैं जो भूलने की बीमारी यानी डिमेंशिया के अंतर्गत आती हैं। यह जरूरी नहीं कि भूलने की बीमारी बुजुर्गों में होती है, बल्कि यह युवाओं में भी देखने को मिल रही है।

Author February 11, 2018 03:38 am

भूलने की बीमारी के पीछे कई कारण हैं, जिसमें तनाव और आधुनिक उपकरण प्रमुख कारण हैं। मसलन, आज हम जिस तरह से तकनीक पर आश्रित हो गए हैं उससे हम पंगु बन गए हैं। हमें छोटी-छोटी बातों के लिए गूगल पर जाना होता है। इस वजह से हम चीजों को याद रखने की कोशिश भी नहीं करते हैं। धीरे-धीरे छोटी-छोटी बातों को भूलने की आदत कब बीमारी बन जाती है, हमें खुद ही नहीं मालूम होता। अधिक धूम्रपान या मादक पदार्थों का सेवन भी भूलने की बीमारी का कारण बनता है। अगर आपको भी ऐसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो तुरंत डॉक्टर से मिलिए। अल्जाइमर और डिमेंशिया के पीछे कोई एक कारण नहीं है। बल्कि भूलने की बीमारी को कई कारक प्रभावित करते हैं।

मादक पदार्थों का अधिक सेवन
आपने अक्सर देखा होगा कि जो व्यक्ति शराब, सिगरेट जैसे मादक पदार्थों का सेवन अधिक करता है उसकी याददाश्त कमजोर होती जाती है। दरअसल, जो व्यक्ति मादक पदार्थों का सेवन अधिक करता है वह किसी मुद्दे पर ध्यान केंद्रित होकर बात को सुन नहीं पाता जिस वजह से वह भूलने लगता है।

सोशल मीडिया का इस्तेमाल
वर्तमान समय में भूलने की बीमारी का एक प्रमुख है सोशल मीडिया का अधिक इस्तेमाल। हम आज वाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि जैसे माध्यमों के बिना एक पल भी नहीं रह सकते। अगर हम कोई गंभीर काम भी कर रहे हैं तो बार-बार फोन देखते हैं। इस वजह से हम जो गंभीर काम कर रहे हैं उस पर पूरा ध्यान नहीं लगा पाते। और हमारे फोकस में कमी आने लगती है। यह आदत केवल युवाओं में ही नहीं बुजुर्गों में भी है।

अनियमित नींद
आज जिस तरह से जीवनशैली बदली है। उससे दिनचर्या में भी बदलाव आया है। कई अध्ययनों से यह सामने आया है कि युवाओं में नींद की अनियमितता याददाश्त को कमजोर करती है। देर रात तक मोबाइल का इस्तेमाल नींद में बाधा डालता है। चिकित्सकों का मानना है कि सोने से आधे घंटे पहले मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ज्यादा समय स्क्रीन पर निकालना आंखों को तो नुकसान देता ही है, साथ ही याददाश्त भी कमजोर करता है।

अवसाद
अक्सर देखने में आया है कि जब व्यक्ति की इच्छाएं बढ़ जाती हैं तो वह कुछ बड़ा करना चाहता है और जब वह इन सभी को पूरा नहीं कर पाता तो वह अवसाद में चला जाता है। जो लोग समाज से कटे या अकेले रहते हैं उनमें ये लक्षण ज्यादा देखने को मिलते हैं। विटामिन बी-12 की कमी भी डिमेंशिया का प्रमुख कारण है। इस विटामिन की कमी मस्तिष्क के स्थायी नुकसान का कारण बन सकती है। यह विटामिन हमारे न्यूरोसेंस और सेंसर मोटर को सुरक्षित रखता है।

बचाव
भूलने की बीमारी का इलाज डॉक्टर दवाओं के जरिए नहीं करते हैं। बावजूद इसके अगर बीमारी की पहचान देर में हो तो इसे न्यूरोलॉजिकल टेस्ट और दवाओं से ही नियंत्रित किया जाता है। हालांकि कुछ आधुनिक इलाज में रेडिएशन युक्त जांच से भी इलाज किया जाता है। इस बीमारी की दवा के लिए चिकित्सक पीड़ित के परिवार के बारे में सारी जानकारी लेते हैं। फिर याददाश्त के विभिन्न क्रिया पद्धतियों को जानने के लिए कई न्यूरोसाइकोलॉजिकल जांच की जाती हैं। इसके बाद कुछ और मेडिकल जांच, जैसे इलेक्ट्रोइनसेफालोग्राफी, एमआरआइ या सीटी स्कैन किए जाते हैं। हालांकि अन्य उपायों से अगर बीमारी दूर नहीं होती, तो डॉक्टर दवाओं का इस्तेमाल करते हैं।बेहतर याददाश्त के लिए दिमागी कसरत करना जरूरी है, जिसमें आप दिमाग को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए सुडोकू, क्रॉस वर्ड या पजल जैसे खेल खेल सकते हैं। इन खेलों को खेलने से याददाश्त बढ़ती है।

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