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तब फैसले का आधार बना एड्स संक्रमण का मुद्दा

साथ ही बलात्कार की परिभाषा की जिन कमियों को अनुच्छेद 377 पूरा करती थी, उन कमियों को भी निर्भया मामले के बाद अब दूर किया जा चुका है। याचिकाकर्ताओं का सबसे बड़ा तर्क था कि यह अनुच्छेद संविधान के 15 और 21 का उल्लंघन करती है।

अंजलि गोपालन

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सहमति से दो वयस्कों के बीच बने समलैंगिक यौन संबंध को एक मत से अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की अनुच्छेद 377 के एक हिस्से को, जो सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध को अपराध बताता है, तर्कहीन, बचाव नहीं करने वाला और मनमाना करार दिया। अनुच्छेद 377 पर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था समलैंगिकता कोई मानसिक विकार नहीं। अनुच्छेद 377 की संवैधानिकता को पहली बार 2001 में चुनौती दी गई थी।

दिल्ली की एक संस्था है ‘नाज फाउंडेशन’। यह संस्था काफी समय से एड्स की रोकथाम और इसके प्रति जागरूकता का काम कर रही है। 2001 में इसी संस्था ने दिल्ली हाई कोर्ट से अनुच्छेद 377 को गैर-संवैधानिक घोषित करने की मांग की थी। इसके बारे में संस्था की संस्थापक अंजलि गोपालन का कहना था, ‘समलैंगिक संबंध बनाने वाले पुरुष एड्स होने पर भी सामने नहीं आते। उन्हें डर होता है कि अनुच्छेद 377 के तहत उन्हें सजा न हो जाए। ऐसे में एड्स की रोकथाम तो क्या संक्रमित लोगों की पहचान भी नहीं हो पाती। पुलिस अधिकारियों द्वारा समलैंगिक लोगों के उत्पीड़न के भी कई मामले हुए हैं। ऐसे में वे लोग सुरक्षित यौन संबंध बनाने के लिए चिकित्सकीय सामग्री खरीदते वक्त भी घबराते थे।’

इन्हीं कारणों को लेकर यह संस्था दिल्ली हाई कोर्ट पहुंची। फाउंडेशन की ओर से दाखिल की गई याचिका में कहा गया कि धारा 377 कई लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रही है। अदालत को यह तय करना था कि क्या अनुच्छेद 377 संविधान के 21, 14 और 15 का अतिक्रमण करती है? यह फैसला करने में न्यायालय ने लगभग नौ साल का समय लिया। इस बीच अनुच्छेद 377 के हर पहलू और उसकी संवैधानिक मान्यता पर बहस हुई। नाज फाउंडेशन ने अपनी याचिका में यह तर्क दिया कि विधि आयोग भी अपनी 172वीं रिपोर्ट में अनुच्छेद 377 को हटाने की संस्तुति कर चुका है। दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा।

केंद्र की तरफ से दो विरोधाभासी जवाब दाखिल किए गए। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने शपथपत्र दाखिल करते हुए कहा कि यह धारा एड्स की रोकथाम में बाधा उत्पन्न करती है, लिहाजा इसे हट जाना चाहिए। दूसरी तरफ गृह मंत्रालय ने इसे बनाए रखने की बात कही। गृह मंत्रालय ने अपने शपथपत्र में कहा कि अनुच्छेद 377 बच्चों पर होने वाले अपराध एवं बलात्कार संबंधी कानून की कमियों को भरने का काम करती है। हालांकि केंद्र सरकार के इस तर्क का आज कोई महत्त्व नहीं रह गया है। बच्चों के लिए 2012 में अलग से ‘बच्चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम, 2012’ बन चुका है।

साथ ही बलात्कार की परिभाषा की जिन कमियों को अनुच्छेद 377 पूरा करती थी, उन कमियों को भी निर्भया मामले के बाद अब दूर किया जा चुका है। याचिकाकर्ताओं का सबसे बड़ा तर्क था कि यह अनुच्छेद संविधान के 15 और 21 का उल्लंघन करती है। अनुच्छेद 15 के अनुसार किसी भी व्यक्ति से उसके यौन रुझान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। 21 के अनुसार हर व्यक्ति को जीने का अधिकार है। इस अधिकार में सम्मान से जीवन जीना और गोपनीयता/ एकांतता का अधिकार भी शामिल है। इसी अनुच्छेद का सहारा लेते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा कि दो वयस्क व्यक्ति अपनी इच्छा से एकांत में जो भी करते हैं उसका उन्हें पूरा अधिकार है।

दो जुलाई, 2009 को दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला याचिकाकर्ता के पक्ष में दे दिया। इसके विरोध में कई धार्मिक संगठन और राजनीतिक दल अदालत पहुंचे। समलैंगिकता के मुद्दे पर अब सुप्रीम कोर्ट में बहस शुरू हुई। हाई कोर्ट के 105 पन्नों के फैसले को पलटते हुए दिसंबर, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने भी लगभग 100 पन्नों का फैसला दिया। 11 दिसंबर, 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया। बाद में केंद्र सरकार द्वारा दाखिल पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला दिया।

अनुच्छेद 377 में क्या था
धारा 377 के तहत समलैंगिकता अपराध की श्रेणी में था। इसमें 10 साल या फिर जिंदगी भर जेल की सजा का भी प्रावधान था, वो भी गैर-जमानती।
समलैंगिकता की इस श्रेणी को एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीअर) कहा जा रहा है। इसी समुदायों के लोग लंबे समय से इस धारा में बदलाव की मांग कर रहे थे।

किन मामलों में अब भी लागू
अगर दो लोग बालिग हैं और उनके बीच यौन संबंध को लेकर सहमति नहीं है। अगर बच्चों के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाया जाता है। अगर कोई शख्स जानवरों के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाते पाया जाता है। इन मामलों में 10 साल जेल की सजा का प्रावधान है। ये गैर-जमानती मामले हैं।

अनुच्छेद 377 की शुरुआत
इस एक्ट की शुरुआत लॉर्ड मैकाले ने 1861 में इंडियन पीनल कोड (आइपीसी) ड्राफ्ट करते वक्त की। आपसी सहमति के बावजूद दो पुरुषों या दो महिलाओं के बीच सेक्स, पुरुष या महिला का आपसी सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध, पुरुष या महिला का जानवरों के साथ यौन संबंध या अप्राकृतिक हरकतों को इस श्रेणी में रखा गया है। धारा-377 इस देश में अंग्रेजों ने 1862 में लागू की थी।

इन देशों में अपराध नहीं समलैंगिकता
ऑस्ट्रेलिया, माल्टा, जर्मनी, फिनलैंड, कोलंबिया, आयरलैंड, अमेरिका, ग्रीनलैंड, स्कॉटलैंड, लक्जमबर्ग, इंग्लैंड और वेल्स, ब्राजील, फ्रांस, न्यूजीलैंड, उरुग्वे, डेनमार्क, अर्जेंटीना, पुर्तगाल, आइसलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, कनाडा, बेल्जियम, नीदरलैंड जैसे 26 देशों में समलैंगिकता अपराध नहीं है।

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