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खान-पानः घेवर की मिठास

सावन-भादों शुरू होते ही ब्रज क्षेत्र में घेवर की सुगंध पसरने लगती है। ब्रज में घेवर का चलन यों तो काफी पुराना है, उस पर ब्रजवासी का घेवर भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है।

Author July 31, 2016 2:08 AM

पवन गौतम

घेवर मुख्य रूप से राजस्थान की मिठाई है। जयपुर में घेवर को विभिन्न तरीकों से तैयार किया जाता है और सजाया जाता है। घेवर को एक गोल कढ़ाई में रिंगनुमा सांचों में खमीर उठाकर मैदा पतली धार के साथ गरम घी में डाला जाता है। गरम घी में मैदा एक रूप ले लेता है जिसको निकालकर पहले तो इस पर चीनी की चासनी चढ़ाई जाती है।

सावन-भादों शुरू होते ही ब्रज क्षेत्र में घेवर की सुगंध पसरने लगती है। ब्रज में घेवर का चलन यों तो काफी पुराना है, उस पर ब्रजवासी का घेवर भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। ब्रज क्षेत्र में हर तरफ खाने-पीने की दुकानें आपको दिख जाएंगी। इनमें कचौड़ी, जलेबी, चाट-पकौड़ी और दूसरी मिठाइयां होती हैं। यहां की खास बात यह भी है कि मौसम के हिसाब से मिठाइयां बनती हैं। गजक, रेवड़ी, इमरती, घेवर फैनी आदि। गजक, रेवड़ी सर्दियों में, इमरती केवल पितृपक्ष यानी सितंबर -अक्तूबर में तैयार होती हैं। घेवर फैनी सावन के महीने में बनाई जाती है। लेकिन सावन के महीने में बाजारों में तैयार होने वाली विशेष मिठाई घेवर की महक की बात ही कुछ और है।

इन दिनों शहर की हर मिठाई की दुकान पर घेवर मिल जाएगा। घेवर की बिक्री हरियाली तीज से रक्षाबंधन तक होती है, इसके लिए दुकानदार महीनों से सूखा घेवर बनाकर रखने लगे हैं। सीजन शुरू होते ही इनको गरम करके इस पर मलाई, खीज खोया, मेवा आदि लगाकर दुकानों पर सजा लेते हैं। घेवर मुख्य रूप से राजस्थान की मिठाई है। जयपुर में घेवर को विभिन्न तरीकों से तैयार किया जाता है और सजाया जाता है। घेवर को एक गोल कढ़ाई में रिंगनुमा सांचों में खमीर उठाकर मैदा पतली धार के साथ गरम घी में डाला जाता है। गरम घी में मैदा एक रूप ले लेता है जिसको निकालकर पहले तो इस पर चीनी की चासनी चढ़ाई जाती है। लेकिन अब इस मिठाई का भी रूप समय के अनुसार बदल गया है।
अब घेवर मलाई, खीज, खोया , मेवा से तैयार किया जाता है, जबकि फैनी भी मैदा से ही बनती है, जिसको खीच खींचकर रेशों में तैयार किया जाता है। मीठी फैनी और सादा फैनी बनती है। कुछ लोग मीठी फैनी खाते हैं तो कुछ दूध में फीकी फैनी डालकर ऊपर से मीठा डालकर खाते हैं। मैदा से निर्मित घेवर एक ऐसी मिठाई है, जो आमतौर पर सभी को पसंद है। पहले यह घेवर अधिक चासनी में बनती थी जो गांव के लोग खूब मजे से खाते थे।

अब हर कोई अपने स्वास्थ्य को लेकर सजग है, जिसके कारण अब वह चीनी वाला घेवर बाजार में दिखाई नहीं देता है। अब उसके खरीदार भी नही हैं। सब मलाई वाला घेवर ही लेना पसंद करते हैं। इसका सावन के महीने में विशेष महत्त्व है। सावन के महीने के बाद इस घेवर के मिठाई की दुकानों पर दर्शन भी नहीं होते हैं। इस महीने में पड़ने वाले त्योहार हरियाली तीज, रक्षाबंधन पर इसका चलन है। हरियाली तीज पर पति अपनी पत्नी के लिए घेवर खरीदकर ले जाते हैं। नवविवाहित युवक ससुराल जाते हैं तो वे घेवर लेकर जाते हैं। इसके बाद रक्षाबंधन पर बहन अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधने के बाद घेवर से ही उसका मुंह मीठा कराती हैं। इस सब के चलते घेवर की जमकर मांग रहती है। घेवर की मौसमी दुकानें भी इस समय सज जाती हैं।

दुकानदार भी घेवर का स्टाक करना शुरू कर देते हैं। घेवर की मिठाई मैदा से तैयार होती है। इसे विशेष प्रकार की कढ़ाई में तेल या घी में पकाया जाता है। इसके बाद इस पर चाशनी चढ़ाई जाती है और फिर विभिन्न प्रकार के खुशबू से सजा दिया जाता है। दुकानदार सावन भादों के महीने में बनने वाली मिठाई घेवर के लिए काफी व्यस्त हो जाते हैं।

हरियाली तीज और रक्षाबंधन तक दुकानदारों के सारे गोदाम खाली हो जाते हैं। शहर में प्रमुख मिठाई विक्रेताओं के अलावा चौक बाजार, होली गेट, मंडी रामदास, शहर के हर गली मोहल्ले में विशेष दुकानें सज जाती हैं। रक्षाबंधन का पर्व नजदीक आते ही शहर घेवर की सुगंध से महक उठता है। शहर में जगह-जगह देशी घी और वनस्पति घी से निर्मित घेवर तैयार किए जाते है। मिष्ठान विक्रेता कारीगरों से दिन और रात की शिफ्ट में घेवर तैयार कराते हैं। घेवर को तैयारकर स्टॉक भी किया जा रहा है। शहर की प्रमुख दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ घेवर खरीदने में जुटी हुई है। मिठाई के छोटे-बड़े सभी दुकानदार इन दिनों घेवर बनाने और बेचने में लगे हुए हैं। घेवर के सामने ग्राहक भी दूसरी मिठाइयों को नहीं पकड़ रहा है। ग्राहकों की आपूर्ति करने के लिए दुकानदारों ने घेवर बनाने के अधिक से अधिक कारीगर लगाए हैं।

अधिकतर दुकानों पर दो तरह का घेवर तैयार किया जा रहा है जिसमें एक रबड़ी वाला तो दूसरा सादा घेवर। रबड़ी वाले घेवर को दुकानदार -ताजा ले जाओ और ताजा खाओ- करके बेच रहे हैं। उनका मानना है कि गर्मी अधिक होने के कारण रबड़ी का घेवर खराब होने की आशंका ज्यादा रहती है जबकि सादा घेवर एक सप्ताह तक खराब नहीं होगा। कुछ दुकानदार पैसा कमाने के लिए खराब गुणवत्ता का घेवर भी बेच रहे हैं। इस दौरान मथुरा में देश के हर कोने से श्रद्धालु आते हैं। सावन के महीने के दो बड़े त्योहार रक्षा बंधन और कृष्ण जन्माष्टमी के चलते इसकी मांग बहुत है। ०

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