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द लास्ट कोच: तुझको चलना होगा

स्त्री नदी की तरह होती है। वह चलती है तो कई जिंदगियां चलती हैं। वह हंसती हैं तो फूल झरते हैं। उसकी मुस्कान से यह दुनिया सुंदर हैं। आज उसने जमीन से लेकर आसमान तक अपनी दुनिया बनाई है। वह रसोई से लेकर सरहद तक मुस्तैद है। उसकी भावनाओं में उदासी कम, खुशियां ज्यादा है। इसलिए वह पुरुषों से अधिक संवेदनशील और शक्तिशाली है। पति के असमय गुजर जाने पर वह परिवार की परवरिश में खुद को समर्पित कर देती है। वह सबको साथ लेकर चलना जानती है। एक साथ कई रिश्ते निभाती जाती है। चाहे कितनी बाधाएं आएं, वह बहती जाती है नदी की तरह.........। पढ़िए संजय स्वतंत्र की द लास्ट कोच शृंखला की नई कहानी।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

किशोरावस्था पार करते ही प्रिया भी नदी की तरह बह चली। आसमान की ओर हाथ फैलाए आंखों में अनगिनत सपने लिए। पूरे आवेग के साथ अपनी मंजिल की ओर। स्कूल के अनुशासन में ढली प्रिया कॉलेज पहुंची तो उसने अपनी रचनात्मकता से सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। एक तरफ वह कविता रचती, तो दूसरी ओर अपनी मधुर गायिकी से समां बांध देती। पढ़ाई में अव्वल तो थी ही। पाश्चात्य परिधान में प्रिया आधुनिक युवती नजर आती, तो पारंपरिक साड़ी में उसका दिव्य सौंदर्य झलकता। वह प्रथम वर्ष में ही कॉलेज की चर्चित छात्रा बन गई।

प्रिया अंगरेजी साहित्य की छात्रा जरूर थी, लेकिन उसकी हिंदी भी कम विशिष्ट न थी। बोलचाल में शामिल अंग्रेजी शब्दों को लेकर वह स्मार्ट हिंदी गढ़ लेती थी। उसे सुन कर सभी मुग्ध हो जाते। कॉलेज के विभिन्न आयोजनों में वह शामिल होती। अपनी रचनात्मक गतिविधियों के बावजूद वह अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान केंद्रित करती। उसका एक ही सपना था कि वह अंगेरजी साहित्य में टॉप करे। पढ़ते-पढ़ते थक जाती, तो कविताएं लिखने बैठ जाती। या फिर गिटार की धुन पर कोई गीत गुनगुनाने लगती। यह उसका शौक नहीं, फूलों का वह गुलदस्ता था जिससे इस समाज को वह सुंदर बनाना चाहती थी।

………. यह तीसरा वर्ष था। यानी बीए ऑनर्स का अंतिम साल। यह भी पूरा होने को आया। फरवरी का महीना। अंतिम कक्षाएं चल रही थीं। प्रिया एक सुबह कॉलेज पहुंची तो कॉरिडोर में सहेलियों ने उसे घेर लिया। वहीं पता चला कि अंगरेजी विभाग में कोई नए सर आए हैं। नए सर यानी अस्टिटेंट प्रोफेसर डॉ मुकुल। अंगरेजी साहित्य में उन्होंने टॉप किया था। सपना था आइएएस अफसर बनने का, मगर परिवार के दबाव और आर्थिक कारणों से वे कालेज की प्रोफेसरी करने चले आए।

नौजवान प्रोफेसर जब क्लासरूम में आया तो सबसे आगे बैठने वाली प्रिया से उसका पहली बार सामना हुआ। क्लास की सबसे मेधावी छात्रा ने उनसे एक के बाद एक कई सवाल किए। वह साहित्य के हर पहलुओं को छूने लगी। उसने कवियों और साहित्यकारों के कथन को इस तरह उद्धृत किया कि प्रोफेसर मुकुल उसकी विद्वता के कायल हो गए।

परीक्षाओं की तारीख घोषित हो गई थी। पाठ्यक्रम के गूढ़ सवालों पर चर्चा के लिए प्रिया अकसर कॉलेज के स्टाफरूम में चली जाती। जहां वह साहित्य चर्चा कर अपनी जिज्ञासा दूर करती। प्रो. मुकुल उसके हर सवाल का इतनी सहजता से जवाब देते कि प्रिया के स्मृति पटल पर वह अंकित हो जाता। इस बार वह परीक्षाओं में सवालों के सर्वश्रेष्ठ जवाब लिखने के
लिए खुद को तैयार कर रही थी।

……. इन मुलाकातों के साथ प्रिया का संकोच दूर हो गया था। वह पढ़ाई-लिखाई के साथ घर-परिवार की बातें भी मुकुलजी से साझा कर लेती। उधर, परीक्षाएं शुरू हो गर्इं। प्रिया का कॉलेज आना-जाना कम हो गया। मुकुल फोन कर उसकी शंकाओं का समाधान कर देते। उससे हमेशा यही कहते कि समय बर्बाद मत करो। खूब पढ़ो। प्रिया के मन में उनके लिए सम्मान बढ़ गया था। इसके साथ ही कहीं न कहीं स्नेह के बीज भी पड़ गए। क्या यह प्रेम बन कर पल्लवित होगा? कौन जाने?

प्रिया प्रश्नपत्र के हर सवाल का ठोस जवाब देती। अकाट्य तर्क रखती। तमाम साहित्य आलोचकों के कथनों को उद्धृत करती। परीक्षा कक्ष से निकलने के बाद वह स्टाफरूम की ओर बढ़ जाती। जहां प्रो. मुकुल किताब पढ़ते हुए दिख जाते। उनकी नजर जब प्रिया पर पड़ती तो वे खिल उठते। स्नेह का बीज इधर भी पल्लवित हो रहा था। 22 साल की प्रिया के चेहरे पर उनकी निगाह ठिठक जाती। उसके लंबे लहराते बालों में उनका मन उलझ कर रह जाता। 30 साल का यह युवा प्रोफेसर अपने पद की गरिमा के कारण कभी अपनी मन की बात उससे नहीं कह पाया। परीक्षाएं खत्म हो गई थीं। प्रिया ने घर वालों ने कह दिया था कि अब वह एमए करेगी इसके बाद पीएचडी भी। लेकिन माता-पिता इसके लिए तैयार न थे। क्योंकि उनको लगता था कि वह और आगे पढ़ेगी तो बाकी बेटियों को भी उच्च शिक्षा के लिए इनकार नहीं कर पाएंगे। फिर इसके लिए पैसा भी चाहिए। कहां से आएगा? वे बस इतना ही चाहते थे कि बेटियां ग्रेजुएट कर लें तो अपनी जाति का लड़का देख कर उनका ब्याह कर दें। मगर प्रिया इसके लिए हरगिज तैयार न थी। उसने एक न सुनी। वह आगे की पढ़ाई के लिए जुट गई।

एक दिन मुकुल सर लाइब्रेरी में ही मिल गए। वे सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए कोई संदर्भ पुस्तक लेने आए थे। उन्हें देख कर प्रिया खिल उठी। वह अपनी किताबें समेट कर उनके सामने जा खड़ी हुई। अरे तुम? कहां थी इतने दिनों से? उन्होंने उसे देख कर पूछा तो उसने कहा-पढ़ने आई थी। और आप सर छुट्टियों में भी कॉलेज आ रहे हैं? प्रोफेसर ने जवाब दिया-हां प्रिया। तुम्हें पता है न, आइएएस परीक्षा की तैयारी कर रहा हूं। जून पेपर है। इसलिए रोज यहीं आकर पढ़ लेता हूं। ………तुम चाय पियोगी? मुकुलजी ने अचानक पूछा। इस पेशकश पर प्रिया ने कहा, कैंटीन में नहीं सर, कॉलेज के पीछे कमलानगर मार्केट चलते हैं।

वे कॉलेज के लंबे-चौड़े कॉरिडोर को पार करते हुए वे पिछले गेट से कमलानगर की ओर निकल गए। बाजार में चहल-पहल है। दुकानदारों ने सामान फैला कर सड़क को इस कदर घेर लिया है कि यहां चलना मुश्किल है। कारें रेंग रही हैं। प्रिया और मुकुल चाय की दुकान की ओर बढ़ रहे हैं। तभी पीछे से आ रही एक कार प्रिया को टक्कर मारती, इससे पहले ही मुकुल ने उसे एकदम से उसे अपनी ओर खींच लिया। उन्होंने कार चलाने वाले को जा पकड़ा। और लगे उसे डांटने। वह कम उम्र का लड़का था। बिदक गया प्रोफेसर की नसीहत सुन कर। झल्ला कर वह बोला, ये क्या आपकी बीवी लगती है? इस पर मुकुल गुस्से में बोले, यस शी इन माई वाइफ।

यह सब देख सुन कर प्रिया सकपका गई। उधर, वह लड़का हाथ जोड़ कर बोला, सर गलती हो गई। माफ कीजिए। इन्हें कोई चोट नहीं लगी। बस हल्का सा धक्का लगा है। बात न बढ़े इसलिए प्रिया ने भी कहा, जाने दीजिए। मुझे कुछ नहीं हुआ। इससे उलझने का क्या फायदा। …….. कुछ ही देर में दोनों चाय की दुकान पर थे। प्रिया सिमटी-शर्माई सी खड़ी हो गई। उसके कानों में बार-बार यह आवाज गूंज रही थी- यस, शी इज माई वाइफ। …… क्या प्रोफेसर मुकुल मुझे इतना चाहते हैं। प्रिया ने सोचा। उसके दिल में स्नेह का बीज प्रेम बन कर अंकुरित होने लगा। वह मुकुल की सौम्य छवि अपनी पलकों में समेटने लगी।

……. लो चाय पियो। मुकुल जी का स्वर सुन कर प्रिया कल्पना लोक से उतर आई। उन्होंने जैसे ही कप पकड़ाया, उसकी अंगुलियां प्रोफेसर के हाथों से छू गई। उस प्रथम छुअन से ऐसा लगा कि मानो उसकी धमनियों में सदियों से जमी बर्फ पिघल गई हो। दोनों बिना कुछ कहे चाय पीते रहे। मगर इस मौन के बीच प्रिया बह रही थी एक नदी की तरह। दोनों एक दूसरे के मन की यात्रा करते हुए बहुत दूर निकल गए, जहां से वे अब एक दूसरे का साथ छोड़ नहीं सकते थे। मगर क्या पता यह साथ कभी छूट जाए? यह आशंका प्रिया को एक पल के लिए डरा गई। चाय पीने के बाद मुकुल ने कमलानगर से कुछ किताबें खरींदीं। फिर दोनों लौट चले। ……. कला संकाय में खुली जगह टहलते हुए मुकुल ने सहसा सवाल किया-मुझसे शादी करोगी? यह सुन कर प्रिया को ऐसा लगा जैसे मंदिर की कई घंटियां एक साथ उसके कानों में बज उठी हों। चलते-चलते एक पल के लिए वह ठिठक गई। मुकुल जी ने उसके कंधे पर हाथ धरते हुए मुस्कुरा कर कहा, चाहो तो इनकार कर सकती हो। यह सुन कर प्रिया अंतस तक पिघल गई। उसने मुकुल को अपलक निहारते हुए अपनी पलकें एक पल के लिए झुका कर इस रिशते पर मुहर लगा दी। उसके गाल और गुलाबी हो उठे हैं।

प्रिया और मुकुल के लिए यह रिश्ता सहज था। मगर उनके बीच सबसे बड़ी अड़चन जाति थी। जाति से बाहर के लड़के से शादी करने के लिए प्रिया के पिता बिल्कुल तैयार न थे। इस गुपचुप प्रेम से बिफर पड़े। मगर बेटी ने इस बार भी उनकी एक न सुनी। उसने मुकुल जी से कोर्ट मौरिज कर ली। उधर, ससुरालवालों ने भी दिल से स्वागत नहीं किया बहू का। वह दोनों तरफ के रिश्ते में खाली हाथ थी। ……. प्रिया ने विवाह के बाद एमए लिटरेचर में दाखिला ले लिया।

……..मुकुल जी रोज कॉलेज निकल जाते। फिर घंटों सिविल सेवा परीक्षा के लिए पढ़ते रहते। प्रिया भी एमए में अव्वल आने के लिए दिन-रात मेहनत करती। हालांकि समय निकाल कर मुकुल की पसंद का खाना बनाती। घर की देखभाल भी करती। छोटी सी गृहस्थी में प्यार का रंग तब घुलता, जब मुकुल उसे बांहों में लेकर दिन भर की थकान दूर कर देते। उसकी तमाम शिकवे-शिकायतें सुनते। मुकुल की देह की भीनी महक वह अपनी सांसों में भर कर खो जाती…..कौन कहता है कि सिर्फ स्त्रियों की देह में ही मादकता होती है। सुबह चादर की सलवटों को ठीक करते हुए मुस्कुरा देती। गृहस्थी की गाड़ी चलती रही……। दो साल कब निकल गए, पता ही नहीं चला। स्नातकोत्तर (अंगरेजी) के परिणाम में प्रिया पूरे विश्वविद्यालय में अवल्ल आई थी। मुकुल को उसके साथी प्रोफेसर ने सुबह ही खुशखबरी दे दी थी। कॉलेज से रिजल्ट लेकर पहुंचते ही उसने प्रिया को गोद में उठा लिया। अरे, अरे उतारिए मुझे। मैं गिर जाऊंगी। मुकुल ने उसका चुंबन लेते हुए कहा, कांग्रेचुलेशंंस माई स्वीट लेडी। प्रिया ने हाथ छुड़ाते हुए कहा, बस-बस, बहुत हो गया रोमांस। चलिए आज आप कॉफी बनाइए। बहुत थक गई हूं। मैं चेंज कर के आती हूं। जो हुकुम माई क्वीन, यह कहते हुए मुकुल किचन में चले गए। सचमुच यह खुशी भरा पल था।

उस रात दोनों भविष्य के सपने बुनते रहे। प्रिया ने कहा, मुकुलजी….. मैं मां अभी मां नहीं बनना चाहती। न तो आपका सपना पूरा हुआ है और न मेरा। मुझे समय चाहिए अभी। हां, प्रिया मैं समझता हूं। दोनों के सपने पूरे हो जाएं, तो नए मेहमान का स्वागत करेंगे। मुकुल ने उसके गालों को सहलाते हुए कहा। एक बात कहूं। आप पति से ज्यादा अच्छे दोस्त हैं। इसलिए मेरी भावनाओं का इतना खयाल करते हैं। यह कहते हुए प्रिया उसी तरह खो गई जैसे समंदर में नदी। वह अक्सर प्रेम की आंच में वाष्पीकृत होकर अपने मन के नीले आसमान में इंद्रधनुष रचाती। दोनों के परिवारों की उपेक्षा के बीच आपसी विश्वास ही था जो उनको जोड़े हुए था। कालक्रम के साथ कब दो साल गुजर गए, पता ही नहीं चला। एमफिल के बाद प्रिया पीएचडी कर रही थी। उधर, प्रोफेसर मुकुल ने सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली। इंटरव्यू का नतीजा भी आ गया। ट्रेनिंग के लिए देहरादून जाने से पहले उस रात मुकुल की आंखें नम थीं। वे उसकी छातियों के बीच शिशु की तरह दुबक गए। प्रिया ने उन्हें हमेशा के लिए सहेज लिया। उसने उन्मुक्त हो कर उस पल को जिया। मगर उसे क्या था कि मुकुल के साथ यह उसकी आखिरी सुनहरी रात थी। चांद उदास होकर आसमान के किसी कोने में टंग गया था।

…….. मुकुल ट्रेनिंग के लिए चले गए। वह अकेली रह गई। इस बीच एक कॉलेज से आॅफर लेटर आ गया। कुछ दिनों बाद प्रिया ने नेट परीक्षा पास कर ली। इन दिनों सब कुछ तेजी से घट रहा था। उसे लग रहा था कि जिंदगी अब अपनी रफ्तार से चल देगी। मगर नियति ने तो कुछ और ही तय कर लिया था। अभी महीना भर ही तो हुआ था मुकुल को गए। एक सुबह प्रिया उठी तो उसे चक्कर आने लगे। वॉश बेसिन के सामने खड़ी हुई तो इसे मिचली आ गई। रात का खाया-पिया सब बाहर आ गया। फ्लैट में कोई नहीं था। उसने मायके फोन किया तो किसी ने उठाया नहीं। ससुराल वाले पहले ही नापसंद करते थे। पड़ोस में रहने वाली लेडी डॉक्टर के पास गई तो उसने जांच करने के बाद बधाई देते हुए कहा- तुम मां बनने वाली हो। …….यह सुन कर प्रिया एक पल के लिए असहज हो गई। उसे तो अभी बहुत कुछ करना है। मां बन गई तो इसी में उलझ जाऊंगी। नौकरी करते हुए बच्चे को अकेले कैसे संभालूंगी। शाम को मुकुल को फोन लगाया तो वह खुशी के मारे उछल पड़ा। प्रिया ने अपनी चिंता जाहिर की तो उसने कहा-फिक्र मत करो। घर में मां-बाबूजी को बता देता हूं। मेरा भाई आकर तुम्हें ले जाएगा। अपना सामान लेकर चली जाना। मां देखभाल करेगी। तुम कॉलेज जाती रहना।

…….. दो दिनों बाद ही देवर आ गया था लेने। प्रिया पहली बार ससुराल पहुंची तो सभी ने उसका स्वागत किया, लेकिन अपनापा महसूस नहीं हुआ। देवर जब-तब उसके कमरे में आ जाता। उसे पढ़ते देख कर चला जाता। कॉलेज की नौकरी जारी थी। पांचवां महीना लग गया तो टोकाटाकी शुरू हो गई। सब पीछे पड़ गए। क्या जरूरत है नौकरी की। पति आइएएस है। छोड़ दो नौकरी। इस तनाव के बीच छठा महीना लग गया। सास ध्यान रखती, मगर ताने देने से वह भी नहीं चूकती। प्रिया कॉलेज जाती रही। उसने तय कर लिया था कि आखिरी दिनों में वह मेटरनिटी लीव पर चली जाएगी। उसके लिए अब यह ‘सर्वाइवल आफ फिटेस्ट’ का सवाल था। अपने अस्तित्व अपनी गरिमा को बचाना था। सभी बाधाओं को पार करते हुए अपने करियर को बनाए रखना था। ऐसी हालत में भी मां-पापा ने खैर-खबर नहीं ली। सोचा न था कि बहनें भी उसे भूल जाएंगी।

…….आंखों से अश्रुधारा बह चली। वह काली रात भुलाए नहीं भूलती। जब मुकुल के बारे में बुरी खबर मिली। देहरादून से फोन करने वाले अफसर ने बताया कि मुकुल स्वीमिंग पूल में डूब गए। उन्हें बचाया नहीं जा सका। सदमे आई प्रिया अगली ही सुबह देहरादून पहुंच गई। वहां पहले ही सब कुछ खत्म हो चुका था। अंतिम बार मुकुल का चेहरा देखते हुए वह फूट-फूट कर रोई। मेरे प्यार में कौन सी कमी रह गई थी मुकुल, जो मुझे छोड़ कर चले गए। अब किसके सहारे जिऊंगी।

…….सब सपने बिखर गए। हर रिश्तेदार नसीहत देने लगा। तंज अलग से किए जाते। तनाव-बेबसी के बीच नौवां महीना लग गया। बेटे का जन्म हुआ तो ससुरजी अस्पताल पहुंच गए। उन्हें लगा कि मुकुल फिर से लौट आया है। प्रिया को लगा कि जैसे उसे जीवन जीने का आधार मिल गया है। उसने पति की असमय मृत्यु पर शोक मनाने के बजाए खुद को संभाला और उसके सपने को पूरा करने के लिए फिर से उठ खड़ी हुई। प्रिया फिर बह चली नदी की तरह।

महीने-साल पंख लगा कर उड़ने लगे। प्रथम तीन साल का हो गया तो प्रिया ने उसे नर्सरी में भेज दिया। वह सुबह कॉलेज चली जाती और दोपहर तक लौट आती। उधर, देवर का अधिकार भाव कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगा। कॉलेज से आते-जाते हर वक्त टोकाटोकी। उसकी यह आदत बढ़ती चली गई। वह ‘पति’ बनने की कोशिश करने लगा। जब-तब वह उसका हाथ पकड़ लेता। अकेला पाकर उसकी कमर में हाथ डाल देता। एक दिन उसने अंतिम सीमा पार करने की कोशिश की, तो प्रिया ने तमाचा जड़ दिया। देवर की ओछी हरकतों से उसका दिल टूट गया। फिर सास-ससुर के लाख मनाने पर भी नहीं रुकी उस घर में। एक हफ्ते बाद ही उसे पास ही किराए का घर मिल गया। इतना सब कुछ होने के बाद आखिरकार मां आई मिलने। उस शाम वह उनकी गोद में सिर रख कर खूब रोई। यह तो कॉलेज की नौकरी थी कि अकेले होने के बावजूद किसी के आगे हाथ नहीं पसारने पड़े।

प्रिया ने स्कूटी खरीद ली। उसी से प्रथम को स्कूल छोड़ कर कॉलेज चली जाती। स्कूल में डे-बोर्डिंग था। दोपहर बाद वह प्रथम को साथ लेते हुए घर लौट जाती। बेटा धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। थोड़ा समझदार हुआ तो एक दिन साहस बटोर कर बता दिया कि उसके पापा हमेशा के लिए हमें छोड़ कर चले गए हैं। अब उनका अधूरा काम उसे पूरा करना है। आइएएस बन कर समाज के लिए कुछ करना है। छुट्टियों में प्रथम को घुमाने के लिए अकसर प्रिया स्कूटी लेकर निकल जाती। साथ में होता उसका डीएसएलआर कैमरा। जिससे वह प्रथम के बचपन को तस्वीरों में उतार लेती। प्रिया उसे कभी इंडिया गेट ले जाती तो कभी रेल संग्रहालय। उस दिन उसे कुतुब मीनार घुमाने का फैसला किया। मगर इतनी दूर जाने लिए उसने मेट्रो से सफर करना ही उचित समझा।

…….प्रिया अरसे बाद पहली बार मुझे दिखी मेट्रो स्टेश्न के बाहर। वह अपनी स्कूटी पार्किंग में लगाने जा रही थी। वह इतनी रफ्तार में थी कि आॅटो से उतरते समय मैं उससे टकराते-टकराते बचा। उसने तुरंत ब्रेक लगाई। वह मेरे सामने थी। पीले कोर वाली साड़ी और गुलाबी ब्लाउज में वही सुंदर-सौम्य प्रिया। उसका चेहरा पूरी तरह तब दिखा, जब उसने हेलमेट उतारते हुए कहा-सॉरी। आपको चोट तो नहीं लगी। स्कूटी पर पीछे बैठा प्रथम उतर कर खड़ा हो गया। प्रिया को सामने देख कर अचरज में हूं। उसके व्यक्तित्व में आज भी गजब का सम्मोहन है। वही तेज-तर्रार लड़की जो कॉलेज में मेरी जूनियर थी। उसने मुझे पहचान लिया- अरे आप। मैंने कहा, इतने सालों बाद तुम मिली। अब तक कहां थी तुम? उसने कहा, सब बताती हूं। अंकल को नमस्ते करो प्रथम। ……. प्रिया मेट्रो की पार्किंग में स्कूटी खड़ी कर मेरे साथ स्टेशन की ओर चल पड़ी।

……. वह लास्ट कोच में मेरे साथ सफर कर रही है। मैंने प्रिया को राजीव चौक स्टेशन पर कॉफी पीने के लिए मना लिया है। रास्ते में प्रथम ने मासूमियत के साथ पूछा-मुझे पिज्जा खिलाएंगे अंकल। मैंने कहा, पक्का खिलाएंगे। बर्गर भी खिलाएंगे। फिर उसने पूछा- और आइसक्रीम? मैंने जवाब दिया- हां, वो भी। अगर मिल गई तो जरूर। ……उधर, प्रिया कॉलेज के दिनों से लेकर शादी तक की बातें बताती रही। उसकी बेसबब मुस्कुराहट को देख कर तनिक भी नहीं लगा कि वह जीवन की दुखद स्मृतियां पीठ पर लादे ढो रही है। यकायक उसने अपने बैग से डीएसएलआर कैमरा निकालते हुए कहा, लाइए इस मुलाकात को एक तस्वीर में संजो लेती हूं। आजकल मैं जीवन के हर रंग को कैनवस पर उतारती रहती हूं। चलिए मुस्कुराइए कि आप लास्ट कोच में हैं और सफर कर रहे हैं अपनी पुरानी मित्र प्रिया के साथ।

……..बातों-बातों में राजीव चौक स्टेशन आ गया है। उद्घोषणा हो रही है- नेक्स्ट स्टेशन इज राजीव चौक। हम प्लेटफार्म पर आ गए हैं। ऊपरी तल पर हम कॉफी शॉप में बैठे तो प्रथम ने कोने की सीट पर कब्जा जमाते हुए कहा-हम यहीं पर खाएंगे पिज्जा। प्रिया मेरे सामने बैठ गई है। प्रथम ने अपनी पसंद की चीजें मंगा ली है। …….. तो प्रिया कैसी चल रही है जिंदगी? मुकुल जी कैसे हैं? मेरे इस सवाल को सुन कर प्रिया ने नजरें झुका ली है। उसकी पलकें भीग गई हैं। अश्रुधारा बह चली है। वह फफक पड़ी है। समझ नही आ रहा कि मैं उससे क्या कहूं?

कुछ पलों के बाद वह सहज हो गई। शादी के बाद जो हुआ, वह बताती चली गई- ‘……मुकुल के बिना जीवन सूना हो गया। प्रथम का जन्म हुआ तो मैंने जीवन में रंग भरना शुरू किया। कॉलेज में पक्की मौकरी मिल गई है। प्रथम को पढ़-लिखा कर काबिल इनसान बनाना चाहती हूं। छुट्टी के दिनों में एक स्वयंसेवी संगठन में काम करती हूं। खास तौर से उन महिलाओं के लिए जिनके पति असमय इस दुनिया से चले गए। और जो फिर से अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं। घर-परिवार में मुस्कान लाना चाहती हैं……।’

प्रिया पूरे आत्मविश्वास से बोले जा रही है। उसे देख कर कोई नहीं कह सकता कि वह पति को खो चुकी है। गौरवर्ण की प्रिया का आज भी वही रूप-लावण्य बरकरार है, जो बरसों पहले था। साड़ी में वही उसका दिव्य रूप झलक रहा है। माथे पर उसने आज भी लाल बिंदी लगाई है। उसके लिए मुकुल कहीं नहीं गए। वह हमेशा साथ हैं। कुछ रिश्ते वाकई कभी नहीं मरते। आज उसने मन की गठरी खोल दी है। वह कॉलेज में कविताएं लिखते हुए मेरी अच्छी दोस्त बन गई थी। आज फिर उसी आत्मीयता से वह मिल रही है। प्रिया उन औरतों में से नहीं जो पति की मौत पर आंसू बहाती है। आज उसके जीवन का उद्देश्य ही नहीं, लक्ष्य भी तय है। वह नदी है। वह बहेगी। अपनी दिशा खुद तय करेगी।  हमने कॉफी पी ली है। प्रथम ने पिज्जा और बर्गर बड़े चाव से खाया है। मगर अफसोस कि उसे आइसक्रीम नहीं मिली है। मैंने प्रिया से कहा, ‘तो अब चला जाए। मुझे भी दफ्तर निकलना है।’ इस पर वह मुस्कुराई। उसने आग्रह किया कि मैं भी कुतुब मीनार चलूं। मैने उसे समझाया कि ऐसे अचानक दफ्तर नहीं जाऊंगा तो ठीक नहीं होगा। फिर किसी दिन जरूर चलेंगे। हमने एक दूसरे का नंबर ले लिया है। ‘फिर जरूर मिलिएगा। आज तो आप जल्दी में हैं। मैं इसे घुमा लाती हूं।’ उसने बेटे के बालों को सहलाते हुए कहा। प्रथम ने कहा- ‘नमस्ते अंकल।’ ………..प्रिया बेटे की अंगुली पकड़ कर प्लेटफार्म नंबर एक की ओर जा रही है। मैं उसे जाते हुए देख रहा हूं। स्त्री सचमुच नदी के समान होती है। वह अनवरत चलती रहती है। अगर वह ठहर गई तो खत्म हो जााएगी। जीवन का कितना लंबा रास्ता हो, कितनी ही लंबी रात हो, उसे बहते जाना है। चलते जाना है।

……… प्लेटफार्म नंबर तीन से मुझे नोएडा सिटी सेंटर की मेट्रो मिल गई है। सोच रहा हूं कि भारतीय स्त्रियों का जीवन कितना जटिल है। इसे सामाजिक कुरीतियों ने सचमुच चुनौतीपूर्ण बना दिया है। पति के न रहने पर उसका यह संघर्ष और बढ़ जाता है। मगर आज की पीढ़ी विधवा होने को अभिशाप नहीं मानती। नियति बेशक उनकी मांग से सिंदूर पोंछ ले, लेकिन वे अपने जीवन को परिवार के लिए वरदान बना देती हैं। प्रिया उनमें से एक है। जिस राह पर वह चल पड़ी है, वहां से हमेशा आगे बढ़ती रहेगी। प्रिया का आत्मविश्वास से भरा चेहरा भूल नहीं पा रहा हूं। सचमुच यह जीवन उसके लिए तपस्या है। इस समय मैं आंखें बंद कर यह गीत सुन रहा हूं-

जो राह चुनी तूने,
उस राह पे राही चलते जाना रे,
हो कितनी भी लंबी रात,
दिया बन जलते जाना रे……..।

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