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जनसत्ता धर्म दीक्षा: पोएला बोइसाख यानी बंगाल का नववर्ष

Pohela Boishakh 2020 (Bengali New Year 2020): लक्ष्मी- गणेश की नई मूर्ति के सामने नए खाते को रख कर मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजा होती है। इस पूजा में मिठाई से लेकर, पंचामृत, पांच फल, कलश, आम का पत्ता, नारियल और वह तमाम सामग्री होती है जिसे संपूर्ण पूजा में आवश्यक माना जाता है।

बंगाल का नववर्ष।

विनय बिहारी सिंह
वैशाख का पहला दिन यानी बंगाल के नए वर्ष का प्रारंभ। पश्चिम बंगाल में एक दूसरे को शुभ नव वर्षों कहते हुए देखना और सुनना एक सुखद अनुभव है। उनके चेहरे की ताजगी, मुस्कुराहट और प्रेम अनायास ही सब कुछ कह देता है। नव वर्ष यानी प्रफुल्लता, उत्साह, आत्मीयता और आशा का पर्व। इस दिन रवींद्र नाथ टैगोर का प्रसिद्ध गीत- एशो हे बैसाख एशो, एशो (आओ हे वैशाख आओ आओ) किसी गायक की मीठी आवाज में कहीं भी बजते हुए सुना जा सकता है। इस बार 14 अप्रैल को मंगलवार के दिन पड़ रहा है पहला वैशाख। बांग्ला नव वर्ष 1427। आमतौर पर 14 या 15 अप्रैल को ही यह पड़ता है। पिछले साल 15 को पड़ा था। अगले साल भी 15 को ही पड़ेगा। तो नया साल कैसे तय होता है? जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तो बंगाल का नया वर्ष प्रारंभ हो जाता है। इसे ज्योतिष की भाषा में मेष संक्रांति कहा जाता है।

पोएला बैसाख (वै नहीं बै) का दिन बंगाल और बंगाली समुदाय के व्यापारियों और दुकानदारों के लिए नया खाता शुरू करने का दिन होता है। उनकी कोशिश रहती है कि पिछला सारा हिसाब-किताब अंतिम स्थिति में पहुंच जाए। बकाया इत्यादि ले लिया जाए और फिर नए खाते में नया हिसाब-किताब शुरू हो। लेकिन कई बार यह संभव नहीं हो पाता तो वे पुराने हिसाब को नए खाते में दर्ज कर लेते हैं। लेकिन इसके पहले नए खाते की पूजा होती है।

लक्ष्मी- गणेश की नई मूर्ति के सामने नए खाते को रख कर मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजा होती है। इस पूजा में मिठाई से लेकर, पंचामृत, पांच फल, कलश, आम का पत्ता, नारियल और वह तमाम सामग्री होती है जिसे संपूर्ण पूजा में आवश्यक माना जाता है। दुकानदार के परिजन और आमंत्रित चुने हुए ग्राहक सुंदर वस्त्रों में सजे इसमें उपस्थित रहते हैं। ग्राहक उस दिन कुछ खरीदते हैं और नए खाते में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। उस दिन बंगाल के बाजारों में यह रौनक देखने लायक होती है। लगभग सभी घरों में भी लक्ष्मी- गणेश का पूजन होता है और घर के लोग खुद तो स्वादिष्ट व्यंजन का आनंद लेत ही हैं, एक-दूसरे के घर भी भिजवाते हैं। मिठाइयों में रसगुल्ला और संदेश के अलावा रसमलाई, बेक्ड रसगुल्ला, खीरकदम, रबड़ी, दूध की मलाई से बनी मिठाइयां, चंद्रकला, चमचम और विशेष तौर पर बना लेंग्चा आदि प्रसाद के रूप में रखे जाते हैं।

इसके अलावा भी कई मिठाइयां। हां मिष्टी दोई यानी मीठी दही के बिना तो कोई भी आयोजन फीका ही माना जाता है। एक व्यंजन जो किसी भी उत्सव में जरूर उपस्थित रहता है, वह है- खीर, जिसे बांग्ला में पाएस कहा जाता है। मिठाइयां चाहे जितनी हों, खीर नहीं है तो भोजन तृप्तिकारी नहीं है। कई संस्थाएं नए साल के पहले दिन रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी करती हैं। कहीं संगीत, तो कहीं नाटक, कहीं काव्य आवृत्ति तो कहीं सुमधुर बाउल गान।

कोरोना ने कई चीजें बदल दी हैं। नए वर्ष के पांच दिन पहले तक सीमित समय के लिए दुकानें खुलती थीं। दुकानदार चुपचाप बैठे हैं, लेकिन बंगाली समुदाय मिठाई प्रेमी होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हो रहे हैं। सामूहिक उत्सव बंद है। यानी 2020 या कहें बंगाब्द 1427 सब अपने-अपने घरों में मना रहे हैं।

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