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यूरोप का ये देश क्यों बदलना चाहता है अपना नाम?

लगभग 21 लाख की आबादी वाले इस छोटे से देश को लगता है कि नाम बदलने से उसके लिए समृद्धि और सुरक्षा के नए रास्ते खुलेंगे।

आज तक ग्रीस ने मैसेडोनिया को एक अलग देश के तौर पर मान्यता नहीं दी है।(AP Photo)

नाम में क्या रखा है? आपने भी विलियम शेक्सपियर का यह जुमला न जाने कितनी बार कहा और सुना होगा। लेकिन नाम में ही तो सब कुछ है। इसीलिए पूर्वी यूरोप का देश मैसेडोनिया अपना नाम बदलने की तैयारी में है। लगभग 21 लाख की आबादी वाले इस छोटे से देश को लगता है कि नाम बदलने से उसके लिए समृद्धि और सुरक्षा के नए रास्ते खुलेंगे। इसी मुद्दे पर रविवार को वहां जनमत संग्रह होने वाला है और सरकार चाहती है कि लोग मैसेडोनिया का नाम बदल कर नॉर्थ मैसेडोनिया करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दें। लेकिन सवाल यह है कि नाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? मैसेडोनिया के एक पड़ोसी को उसके नाम पर सख्त एतराज है।

यह पड़ोसी है ग्रीस, जिसके एक इलाके का नाम भी मैसेडोनिया है। आज तक ग्रीस ने मैसेडोनिया को एक अलग देश के तौर पर मान्यता नहीं दी है। उसे लगता है कि मैसेडोनिया नाम होने की वजह से उसका पड़ोसी देश ग्रीक इलाके पर अपना दावा जता सकता है। इसी वजह से ग्रीस ने आज तक मैसेडोनिया को ना तो पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो में शामिल होने दिया है और ना ही यूरोपीय संघ में। वैसे इस विवाद के बीज दो हजार साल से भी पुराने अतीत में छिपे हैं। मैसेडोनिया नाम के ये दोनों इलाके रोमन साम्राज्य के मैसेडोनिया प्रांत के हिस्से थे। इसीलिए ग्रीस और मैसेडोनिया के बीच विश्व विजेता रोमन सम्राट सिकंदर की विरासत को लेकर भी झगड़ा रहा है। दोनों देश इस विरासत पर अपना हक जताते हैं। सिकंदर का जन्म मौजूदा ग्रीस के मैसेडोनिया इलाके में हुआ। लेकिन रोमन साम्राज्य का अहम हिस्सा होने के नाते मैसेडोनिया के लोगों के लिए आज भी यह बेहद भावुक मुद्दा है। नाटो और ईयू का हिस्सा बनने की राह में ग्रीस की तरफ से डाले जाने वाले अडंगों का मैसेडोनिया ने कुछ अलग ही अंदाज में जवाब दिया। उसने अपनी राजधानी स्कॉपिए में सिकंदर जैसे ग्रीक नायकों की कांसे और पत्थर की कई प्रतिमाएं खड़ी कर दीं। इससे शहर की सुंदरता में तो इजाफा हुआ, लेकिन पड़ोसी ग्रीस के साथ संबंधों में तनातनी बनी रही।

दशकों तक एक दूसरे से झगड़ने और खरी खोटी सुनाने के बाद ग्रीस और मैसेडोनिया के प्रधानमंत्रियों के बीच एक समझौते पर सहमति बनी। इसके मुताबिक अगर मैसेडोनिया अपना नाम बदल कर ‘नॉर्थ मैसेडोनिया’ रख ले तो ग्रीस नाटो और यूरोपीय संघ का हिस्सा बनने की मैसेडोनिया की कोशिशों पर वीटो नहीं करेगा। प्रधानमंत्री जोरान जाएव की सरकार रविवार को जनमत संग्रह में लोगों से यही पूछ रही है कि क्या वे ग्रीस और मैसेडोनिया के बीच हुई डील को स्वीकार करते हुए यूरोपीय संघ और नाटो की सदस्यता के हक में हैं?
दूसरी तरफ, इस डील के आलोचकों की कमी नहीं है। ग्रीस और मैसेडोनिया, दोनों ही देशों में आलोचकों को लगता है कि उनकी सरकार पड़ोसी देश की सरकार के सामने कुछ ज्यादा ही झुक रही है। ग्रीक आलोचक कहते हैं कि नाम भले ही बदल ले लेकिन मैसेडोनिया उनके इलाके पर अपना दावा इतनी आसानी से नहीं छोड़ेगा। वहीं, मैसेडोनिया में कुछ लोग देश का नाम बदलने को ‘राष्ट्रीय अपमान’ समझते हैं।

जाहिर है ग्रीस और मैसेडोनिया के लोगों के लिए यह एक अहम मुद्दा है, लेकिन इसमें दिलचस्पी दुनिया की बड़ी ताकतें भी ले रही हैं। जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल, नाटो के महासचिव येंस स्टॉल्टेनबर्ग और अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने हाल के हफ्तों में मैसेडोनिया का दौरा किया और वहां के लोगों से नाम बदलने के पक्ष में वोट देने को कहा। वहीं रूस को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आ रही है कि एक और देश नाटो का हिस्सा बन जाए, वह भी यूरोप के उस हिस्से से, जहां लंबे समय तक उसका प्रभाव रहा है। 1991 में मैसेडोनिया सोवियत संघ से अलग होकर ही एक अलग देश बना था। अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने कहा कि इस बात में ‘कोई संदेह नहीं’ कि रूस मैसेडोनिया में नाम बदलने के खिलाफ मुहिम चलाने वाले ग्रुपों की फंडिंग कर रहा है।

प्रधानमंत्री जोरान जाएव के समर्थकों का कहना है कि अगर जनमत संग्रह में देश का नाम बदलने को मंजूरी मिल जाती है तो इससे बाल्कन इलाके में बसे इस छोटे से देश के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों में जाने का रास्ता साफ होगा। जाएव ने कहा कि नाटो और यूरोपीय संघ में शामिल होने के अलावा मैसेडोनिया के पास कोई और विकल्प नहीं है। लेकिन देश के राष्ट्रपति जॉर्गे इफानोव की राय इसके विपरीत है। उन्होंने कहा है कि वह जनमत संग्रह में हिस्सा नहीं लेंगे और दूसरे लोगों से भी वह ऐसा ही करने को कह रहे हैं। 70 से ज्यादा संगठन और राजनीतिक पार्टियां ग्रीस और मैसेडोनिया के बीच हुई डील का विरोध कर रहे हैं। कुल मिलाकर नाम बदलने के मुद्दे पर मैसेडोनिया बंटा हुआ है। सर्वे बता रहे हैं कि फैसला डील के हक में आ सकता है। प्रधानमंत्री जाएव पूरा जोर लगा रहे हैं कि जनमत संग्रह का फैसला ‘हां’ में आए। उनका कहना है कि उनके लिए नाम से ज्यादा देश का भविष्य मायने रखता है। खास कर युवाओं के लिए यह बात बहुत अहम है, जो बेरोजगारी और मुश्किल आर्थिक हालात झेलने को मजबूर हैं। बेशक ब्रेक्जिट और अंदरूनी झगड़ों के बाजवूद यूरोपीय संघ आज भी बेहतर भविष्य की उम्मीदों का प्रतीक है। पूर्वी यूरोप के जो देश 28 सदस्यों वाले इस संघ का हिस्सा नहीं है, वे दशकों से इसमें आने का सपना देख रहे हैं। इसी सपने को हकीकत में बदलने की उम्मीद के साथ मैसेडोनिया रविवार को जनमत संग्रह करा रहा है।

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