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भाषा – काल और भाषा

मस्तिष्क में ‘काल’ की यह चार अवस्थाएं, एक-दूसरे से असंपृक्त होते हुए भी, कई ‘क्रिया-प्रणालियों’ में सहभागिता निभाती हैं। मस्तिष्क की चौथी घड़ी का काल-आकलन किसी हद तक प्रतिशुद्ध (प्रीसाइज) है और त्रुटि की गुंजाइश महज दो प्रतिशत मापी गई है।
Author February 11, 2018 02:57 am
मस्तिष्क में मौजूद जैविक घड़ियों को चार श्रेणियों में वगीकृत किया गया है।(प्रतीकात्मक तस्वीर)

पवन माथुर

भारतीय चिंतन में काल की अवधारणा कुछ मूल प्रश्नों में गुंथी हुई है, जैसे सत्ता, अस्तित्व और परिवर्तनगामिता, कारणत्व तथा परिणति, सृजन और संहार। न्याय-सूत्र से निसृत सैद्धांतिकी में ‘नित्य’ और ‘कदाचित’ के मध्य विच्छेद, ‘काल’ के उद्बोधन का मुख्य बिंदु है। काल नित्य है और ‘कदाचित’, ‘काल में सत्ता’ है, जो उत्पत्ति-परिवर्तन-विनाश का चक्र है। चूंकि ‘कदाचित’ कभी तो अस्तित्व में है, और हमेशा अस्तित्व में नहीं है, इसीलिए ‘कदाचित’ के जन्म और क्षय के पीछे ‘कारण’ है। न्याय-वैशेषिक सिद्धांत का मानना है कि ‘कारण’ और ‘परिणति’ में विभेद तो है, पर ‘कारण’ ही ‘परिणति की अस्तित्वहीनता’ पर विराम भी लगाता है। ‘परिणति’ एक नूतन प्रारंभ है और यही न्याय का ‘आरंभवाद’ है। इस सैद्धांतिकी के बरक्स ‘सांख्य’ का ‘सत्कार्यवाद’ है। यहां ‘परिणति’ कारण में प्रच्छन्नरूप से पूर्व विद्यमान है, तथा परिवर्तन ‘अव्यक्त’ की अभिव्यक्ति है। सांख्य का विचार है कि ‘परिणति’ काल के असीम मैदान पर होने वाला प्रसंग नहीं है, बल्कि ‘परिणति’ के प्रकाशित होने के विधान की ‘पूर्व प्रक्रिया’ ही ‘काल’ है।  वैयाकरण भर्तृहरि ने सनातन ‘वाक्’ में अंर्तभुक्त ‘काल-शक्ति’ की अवधारणा प्रस्तुत की, जो एक अ-क्रम महासत्ता को ‘असाधारण-क्रमवान-सत्ता’ में रूपांरित कर देती है। भारतीय चिंतन में वे शायद पहले विचारक हैं, जिन्होंने सनातन-वाक् और काल-शक्ति के एकत्व को प्रतिष्ठित किया। सनातन वाक् का प्रस्फुटन, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी में होता है। पश्यन्ती, पूर्वता और आगत के गुणों से मुक्त है, अविभाज्य तथा ‘क्रमहीन’ है और उसमें प्रत्ययों और पदार्थजगत को व्यक्त करने की प्रवृत्ति समाई रहती है। ‘क्रमहीनता’ से ‘क्रम’ की अभिव्यक्ति ‘मध्यमा’ में होती है। मध्यमा का संघटन और बोध अतींद्रिय है, वह आंतरिक मानसिक प्रक्रियाओं और ‘प्रज्ञात्मक-सिद्धांतों’ का केंद्र-बिंदु है। वैखरी तीसरा चरण है, यहां प्राण-वायु मुंह के भीतर अभिव्यक्ति के विभिन्न स्रोतों को छूकर निकलती है। अपनी असंख्य विविधता के साथ ‘वैखरी’ श्रोतेंद्रियों से ग्राह्य होती है।  भर्तृहरि का पश्यंती, मध्यमा और वैखरी के मध्य ‘काल-अंतराल’ की परोक्ष परिकल्पना, ‘मध्यमा’ का ‘बुद्धि-केंद्रित-प्रत्ययों का केंद्र होना तथा ‘काल-अनुक्रम’ की प्रस्तावना, आज भी मूल्यवान है।

‘काल-अंतराल’ तथा ‘काल-अनुक्रम’ आज के तंत्रिका-भाषा-विज्ञान के मूल प्रश्न बन रहे हैं। ‘वाक्-प्रवाह’ के दौरान ध्वनियों का रूप बड़ी तेजी से बदलता है, और उच्चरित स्वनिम, अक्षर, शब्दांश, दो सौ से लेकर चार सौ मिली-सेकेंड के मध्य लगातार उत्पन्न होते रहते हैं। ध्वनियों का काल-क्रम ‘कालावधि’ और अक्षरों के मध्य जो क्रमवार संयोजन है, वह अर्थ-प्रक्रिया के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ‘कालानुक्रम की सांकेतिकता’ पर आधारित श्रवण प्रणाली का उदाहरण ‘मौर्स-कोड’ है, जिससे वर्ण/ शब्द/ वाक्यार्थ, का ज्ञान होता है। यह ‘कोड’ एकल स्वराघात की अवधि, स्वराघातों के मध्य ‘अंतराल’, और उनके क्रमिक संयोजन के भेद पर आधारित है। माना जाता है कि ‘मानवीय वाक्’ मौर्स-कोड से भी जटिल ‘कालानुक्रम की सांकेतिकता’ की श्रवण प्रणाली पर आधारित है।
कंठ में स्थित उपजिह्वा वाक्-पथ को खुला या बंद रखने में समर्थ है, जिससे वाक् की उत्पत्ति प्रभावित होती है। जब प्राण-वायु संकुचित वाक्-पथ से गुजरती है, तब वाक्-परतें कंपित होती हैं, और स्वनिम उच्चरण के साथ-साथ एक गूंज (घर्षित-ध्वनि) भी सम्मिलत होती है। ऐसे स्वनिमों को ‘घोष-वान’ स्वनिम कहा गया है। पर जब प्राण-वायु खुले वाक्-पथ से गुजरती है, तब स्वनिम उच्चरण के दौरान कोई ‘गूंज’ सम्मिलित नहीं होती। इस कोटि के स्वनिमों को ‘अघोष’ या घोष-रहित कहा जाता है।

अंग्रेजी के शब्द ‘लैडर’ में आए घोषवान स्वनिम ‘डी’ की पहचान तभी संभव है जब ‘डी’ के उच्चरित होने और वाक्-परतों के कंपित होने के बीच, बहुत कम, यानि तीस मिली-सेकेंड से भी कम का अंतराल हो इसे ‘वायस-आॅन-सैट-टाइम’ भी कहा जाता है। इसलिए ‘कॉल-अवधि’, अघोष और घोषवान स्वनिमों की पहचान का रास्ता खोल देती है। एक अन्य अध्ययन में अंग्रेजी के व्यंजन ‘एस’ और स्वर ‘ए’ से बने शब्दांश ‘सा’ की प्राक-ध्वनि को रिकार्ड कर लिया गया। चूंकि स्वनिम ‘एस’ एक घोषवान स्वनिम है, अत: इसके उच्चरण के लगभग साथ-साथ वाक्-परतों के कंपन की ‘घर्षित-ध्वनि’ (फ्रीकेटिव-नॉयज) भी सम्मिलित होती है। अगर शब्दांश ‘एस’ की मूल ध्वनि से इस ‘घर्षित-ध्वनि’ को संपादित कर दिया जाए तब ‘बची हुई ध्वनि’, अंग्रेजी के शब्दांश ‘डा’ अथवा ‘टा’ की तरह सुनाई देने लगती है। इसलिए मस्तिष्क के लिए ‘घर्षित-ध्वनि’ भी एक संकेत है, जिससे शब्दांश ‘सा’ या ‘डॉ’/ ‘टा’ की पहचान की जाती है। अगर इसी ‘घर्षित-ध्वनि’ को संपादित कर के शब्दांश ‘सा’ की बची हुई ध्वनि को पचास मिली सेकेंड पहले बजा दिया जाए तब ‘बची हुई ध्वनि’ अंग्रेजी के स्वनिम ‘एस’, ‘टी’ और स्वर ‘ए’ के संयुक्ताक्षर ‘स्टा’ के रूप में सुनाई देती है। इसी प्रकार जब अंग्रेजी के वाक्याशं ‘प्लीज’ से शाप’ की ध्वनि को रिकार्ड करके ‘प्लीज से’ तथा ‘शॉप’ के मध्य तीस मिली-सेकेंड से ज्यादा का ‘अंतराल’ डाल दें, तब सुनने वालों को ‘शॉप’ के बजाए ‘चॉप’ सुनाई देने लगता है। इसलिए महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि ‘काल-अंतराल’ या ‘मौन’ की अवधि मस्तिष्क की ‘ध्वनि-तत्त्व’ पहचानने की ‘जैव-रासायनिक प्रणालियों’ के लिए संकेत रूप में काम आती है। मस्तिष्क में मौजूद जैविक घड़ियों को चार श्रेणियों में वगीकृत किया गया है। सबसे सूक्ष्म जैविक घड़ी, सेकेंड के दस लाखवें हिस्से में कार्यरत है (माइक्रोसेकेंड)। इस काल-खंड में मस्तिष्क ‘ध्वनि’ या प्रतिध्वनि को चिह्नित कर लेता है। इसके बाद दूसरी जैविक घड़ी सेकेंड के हजारवें हिस्सें में कार्यरत है (मिली सेकेंड), जहां जटिल काल- संरचना में छिपे श्रोत-संकेत, विसंकेतित (डी-कोड) होते हैं, वाक् की जनन, और शब्द की पहचान प्राप्त होती है। गति का नियंत्रण और उसका परिचलन संभव होता है। संगीत और नृत्य भी इसी सेकेंड के हजारवें हिस्से का उपयोग करते हैं। तीसरी जैविक घड़ी सेकेंड और मिनट के मध्य स्थित, काल-खंड का उपयोग करती है। यह घड़ी समय बीतने का सही आकलन, निर्णय लेने, बहु-क्रम प्रश्नों के उत्तर देने में, काम आती है। सोना और जागना, भूख लगना, ‘प्रजनन की रासायनिक प्रक्रियाओं के चक्र’ जिन्हें ‘सर्केडियन- रिद्म’ से भी रेखांकित किया जाता है, चौथी जैविक घड़ी है। मस्तिष्क घंटों/ दिनों के ‘कालखंड’ का इस्तेमाल करता है।

मस्तिष्क में ‘काल’ की यह चार अवस्थाएं, एक-दूसरे से असंपृक्त होते हुए भी, कई ‘क्रिया-प्रणालियों’ में सहभागिता निभाती हैं। मस्तिष्क की चौथी घड़ी का काल-आकलन किसी हद तक प्रतिशुद्ध (प्रीसाइज) है और त्रुटि की गुंजाइश महज दो प्रतिशत मापी गई है। इस प्रतिशुद्धता के एवज में यह कालघड़ी अपना लचीलापन खो बैठती है। मसलन, अगर हम भारत से अमेरिका की हवाई यात्रा करते हैं तब हम ‘बारह-घंटे’ समय में पीछे चले जाते हैं। हमारी जैविक घड़ी अमूमन हमें भारतीय समयानुसार, कुछ दिनों के लिए जागने-सोने पर मजबूर करती है, यानी इस जैविक घड़ी को अपनी मर्जी से ‘पुनर्चक्रित’ (री-सेट) नहीं किया जा सकता है। निष्कर्षत: यह कालघड़ी एक ‘वस्तुनिष्ठ-स्वायत-चक्राकार’ प्रक्रिया पर आधारित है, जो नियमों का अनुपालन करती है, और जहां ‘कारणत्व’ की प्रमुख भूमिका है। इसके विपरीत, दूसरी जैविक घड़ी, जो ‘सेकेंड के हजारवें हिस्से’ में कार्य करती है, काफी लचीली है, और इसे अभ्यास/ प्रशिक्षिण द्वारा ‘पुर्नचक्रित’ क्रिया जा सकता है। यह घड़ी काल का आकलन न करके, काल में हो रहे परिवर्तन बिंदुओं के ‘अंतराल’ का आकलन करती है। सांख्य दर्शन की ‘अव्यक्त’ तथा ‘व्यक्त’ के बीच के अंतराल की ‘काल’ अवधारण और दूसरी जैविक घड़ी जहां ‘अंतराल’ विसंकेतित होता हो, अगर एक न भी हों, फिर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि वे इतिहास के पन्ने पर दर्ज समांतर लकीरें हैं।

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